ਅੰਤਰ ਕਾ ਅਭਿਮਾਨੁ ਜੋਰੁ ਤੂ ਕਿਛੁ ਕਿਛੁ ਕਿਛੁ ਜਾਨਤਾ ਇਹੁ ਦੂਰਿ ਕਰਹੁ ਆਪਨ ਗਹੁ ਰੇ ॥
अंतर का अभिमानु जोरु तू किछु किछु किछु जानता इहु दूरि करहु आपन गहु रे ॥
मन का अभिमान जो कुछ तू जानता है, इसे दूर करो और अपने आप को नियंत्रण में रखो।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਦਇਆਲ ਹੋਹੁ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਸੰਤਨ ਕੀ ਧੂਰਿ ਕਰਿ ਹਰੇ ॥੨॥੧॥੨॥
जन नानक कउ हरि दइआल होहु सुआमी हरि संतन की धूरि करि हरे ॥२॥१॥२॥
नानक विनती करते हैं कि हे स्वामी ! दयालु होकर हमें संतजनों की चरण-धूल बना॥२॥१॥२॥
ਕੇਦਾਰਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨
केदारा महला ५ घरु २
केदारा महला ५ घरु २
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
ਮਾਈ ਸੰਤਸੰਗਿ ਜਾਗੀ ॥
माई संतसंगि जागी ॥
हे माँ ! संतों के संग जागृति प्राप्त हुई है,”
ਪ੍ਰਿਅ ਰੰਗ ਦੇਖੈ ਜਪਤੀ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
प्रिअ रंग देखै जपती नामु निधानी ॥ रहाउ ॥
प्रिय के रंग देखती सुखनिधि हरिनाम को ही जपती हूँ॥ रहाउ॥
ਦਰਸਨ ਪਿਆਸ ਲੋਚਨ ਤਾਰ ਲਾਗੀ ॥
दरसन पिआस लोचन तार लागी ॥
प्रभु -दर्शन की लालसा में ऑखें उधर ही लगी हैं एवं
ਬਿਸਰੀ ਤਿਆਸ ਬਿਡਾਨੀ ॥੧॥
बिसरी तिआस बिडानी ॥१॥
इसने अन्य चीजों की चाह छोड़ दी है॥१॥
ਅਬ ਗੁਰੁ ਪਾਇਓ ਹੈ ਸਹਜ ਸੁਖਦਾਇਕ ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਮਨੁ ਲਪਟਾਨੀ ॥
अब गुरु पाइओ है सहज सुखदाइक दरसनु पेखत मनु लपटानी ॥
अब गुरु पा लिया है, जो परम सुख प्रदान करने वाला है, उसके दर्शन करते ही मन उसमें लीन हो चुका है।
ਦੇਖਿ ਦਮੋਦਰ ਰਹਸੁ ਮਨਿ ਉਪਜਿਓ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਿਅ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਨੀ ॥੨॥੧॥
देखि दमोदर रहसु मनि उपजिओ नानक प्रिअ अम्रित बानी ॥२॥१॥
नानक का कथन है कि प्रभु को देखकर मन में आनंद ही आनंद उत्पन्न हो गया है और उस प्रेिय की अमृत-वाणी ने विभोर कर दिया है॥ २॥ १॥
ਕੇਦਾਰਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੩
केदारा महला ५ घरु ३
केदारा महला ५ घरु ३
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
ਦੀਨ ਬਿਨਉ ਸੁਨੁ ਦਇਆਲ ॥
दीन बिनउ सुनु दइआल ॥
हे दयासागर ! इस दीन की विनती सुनो;
ਪੰਚ ਦਾਸ ਤੀਨਿ ਦੋਖੀ ਏਕ ਮਨੁ ਅਨਾਥ ਨਾਥ ॥
पंच दास तीनि दोखी एक मनु अनाथ नाथ ॥
हे अनाथों के नाथ ! मन केवल एक ही है, मगर पाँच (कामादिक) दास एवं तीन (गुण रूपी) दोषी पीड़ा दे रहे हैं,”
ਰਾਖੁ ਹੋ ਕਿਰਪਾਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥
राखु हो किरपाल ॥ रहाउ ॥
हे कृपानिधि ! इनसे मुझे बचा लो॥ रहाउ॥
ਅਨਿਕ ਜਤਨ ਗਵਨੁ ਕਰਉ ॥
अनिक जतन गवनु करउ ॥
तीर्थ-यात्रा के मैं अनेक यत्न करता हूँ,”
ਖਟੁ ਕਰਮ ਜੁਗਤਿ ਧਿਆਨੁ ਧਰਉ ॥
खटु करम जुगति धिआनु धरउ ॥
छः कर्मों की युक्ति में ध्यान लगाता हूँ,”
ਉਪਾਵ ਸਗਲ ਕਰਿ ਹਾਰਿਓ ਨਹ ਨਹ ਹੁਟਹਿ ਬਿਕਰਾਲ ॥੧॥
उपाव सगल करि हारिओ नह नह हुटहि बिकराल ॥१॥
सब उपाय कर हार चुका हूँ, मगर विकराल विकार नहीं छूटते॥१॥
ਸਰਣਿ ਬੰਦਨ ਕਰੁਣਾ ਪਤੇ ॥
सरणि बंदन करुणा पते ॥
हे करुणामय ! तेरी शरण में आया हूँ, तेरी वंदना करता हूँ।
ਭਵ ਹਰਣ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰੇ ॥
भव हरण हरि हरि हरि हरे ॥
हे श्रीहरि ! सृष्टि के जन्म-मरण के बन्धन तू ही काटनेवाला है,”
ਏਕ ਤੂਹੀ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ॥
एक तूही दीन दइआल ॥
केवल तू ही दीनों पर दया करने वाला है।
ਪ੍ਰਭ ਚਰਨ ਨਾਨਕ ਆਸਰੋ ॥
प्रभ चरन नानक आसरो ॥
नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तेरे चरणों का ही आसरा है।
ਉਧਰੇ ਭ੍ਰਮ ਮੋਹ ਸਾਗਰ ॥
उधरे भ्रम मोह सागर ॥
मेरा भ्रम-मोह के समन्दर से उद्धार
ਲਗਿ ਸੰਤਨਾ ਪਗ ਪਾਲ ॥੨॥੧॥੨॥
लगि संतना पग पाल ॥२॥१॥२॥
संतजनों के चरणों में लग कर हो पाया है॥२॥१॥२॥
ਕੇਦਾਰਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੪
केदारा महला ५ घरु ४
केदारा महला ५ घरु ४
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
ਸਰਨੀ ਆਇਓ ਨਾਥ ਨਿਧਾਨ ॥
सरनी आइओ नाथ निधान ॥
हे सुखनिधान, स्वामी ! मैं तेरी शरण में आया हूँ।
ਨਾਮ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਗੀ ਮਨ ਭੀਤਰਿ ਮਾਗਨ ਕਉ ਹਰਿ ਦਾਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नाम प्रीति लागी मन भीतरि मागन कउ हरि दान ॥१॥ रहाउ ॥
मन में तेरे नाम से प्रीति लग चुकी है, तुझसे हरिनाम दान मांगता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
ਸੁਖਦਾਈ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖਹੁ ਮਾਨ ॥
सुखदाई पूरन परमेसुर करि किरपा राखहु मान ॥
हे सुखदाता, परिपूर्ण परमेश्वर ! कृपा कर मेरा मान रखो,”
ਦੇਹੁ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਗੁਨ ਰਸਨ ਬਖਾਨ ॥੧॥
देहु प्रीति साधू संगि सुआमी हरि गुन रसन बखान ॥१॥
हे स्वामी ! साधुजनों के संग प्रीति प्रदान करो, ताकि जिव्हा से मैं तेरे गुणों का बखान करता रहूँ॥१॥
ਗੋਪਾਲ ਦਇਆਲ ਗੋਬਿਦ ਦਮੋਦਰ ਨਿਰਮਲ ਕਥਾ ਗਿਆਨ ॥
गोपाल दइआल गोबिद दमोदर निरमल कथा गिआन ॥
हे गोविन्द, गोपाल, दयालु परमेश्वर ! तेरी ज्ञान कथा अति पावन है।
ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰਾਗਹੁ ਚਰਨ ਕਮਲ ਸੰਗਿ ਧਿਆਨ ॥੨॥੧॥੩॥
नानक कउ हरि कै रंगि रागहु चरन कमल संगि धिआन ॥२॥१॥३॥
नानक को हरि के रंग में रंग दो ताकि उसका ध्यान तेरे चरण-कमल में लवलीन रहे॥ २॥ १॥ ३॥
ਕੇਦਾਰਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
केदारा महला ५ ॥
केदारा महला ५॥
ਹਰਿ ਕੇ ਦਰਸਨ ਕੋ ਮਨਿ ਚਾਉ ॥
हरि के दरसन को मनि चाउ ॥
मेरे मन में परमात्मा के दर्शन का चाव है,”
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਵਹੁ ਤੁਮ ਦੇਵਹੁ ਅਪਨੋ ਨਾਉ ॥ ਰਹਾਉ ॥
करि किरपा सतसंगि मिलावहु तुम देवहु अपनो नाउ ॥ रहाउ ॥
हे परमेश्वर ! कृपा कर सत्संग में मिला दो और तुम अपना नाम दे दो॥ रहाउ॥
ਕਰਉ ਸੇਵਾ ਸਤ ਪੁਰਖ ਪਿਆਰੇ ਜਤ ਸੁਨੀਐ ਤਤ ਮਨਿ ਰਹਸਾਉ ॥
करउ सेवा सत पुरख पिआरे जत सुनीऐ तत मनि रहसाउ ॥
मैं प्यारे सत्पुरुष की सेवा में तल्लीन रहता हूँ, जब उसका यश सुनता हूँ तो मन में भरपूर आनंद उत्पन्न हो जाता है।