ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਏਕੋ ਹੈ ਜਾਤਾ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੧੩॥
गुरमुखि गिआनु एको है जाता अनदिनु नामु रवीजै हे ॥१३॥
गुरु का ज्ञान एकमात्र परमेश्वर को ही जानता है और वह रात-दिन नाम में ही लीन रहता है॥ १३॥
ਬੇਦ ਪੜਹਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ॥
बेद पड़हि हरि नामु न बूझहि ॥
जीव वेदों का पाठ करता है परन्तु हरि-नाम के रहस्य को नहीं बूझता।
ਮਾਇਆ ਕਾਰਣਿ ਪੜਿ ਪੜਿ ਲੂਝਹਿ ॥
माइआ कारणि पड़ि पड़ि लूझहि ॥
पाठ-पठन कर वह माया के कारण उलझता रहता है।
ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧਾ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਜੈ ਹੇ ॥੧੪॥
अंतरि मैलु अगिआनी अंधा किउ करि दुतरु तरीजै हे ॥१४॥
मन में मैल होने के कारण अज्ञानी एवं अंधा क्योंकर दुस्तर संसार-सागर से पार हो सकता है॥१४॥
ਬੇਦ ਬਾਦ ਸਭਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣਹਿ ॥
बेद बाद सभि आखि वखाणहि ॥
पण्डित लोग वेदों के वाद-विवाद कहकर उसकी व्याख्या करते हैं,”
ਨ ਅੰਤਰੁ ਭੀਜੈ ਨ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਹਿ ॥
न अंतरु भीजै न सबदु पछाणहि ॥
परन्तु इससे न ही उनका मन भीगता है और न ही उन्हें शब्द की पहचान होती है।
ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਸਭੁ ਬੇਦਿ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ਹੇ ॥੧੫॥
पुंनु पापु सभु बेदि द्रिड़ाइआ गुरमुखि अम्रितु पीजै हे ॥१५॥
समस्त वेदों ने यही दृढ़ करवाया है कि पाप-पुण्य क्या है परन्तु गुरुमुख नामामृत का ही पान करता है॥ १५॥
ਆਪੇ ਸਾਚਾ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
आपे साचा एको सोई ॥
एक ईश्वर ही सत्य है,
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ਸਚੋ ਸਚੁ ਰਵੀਜੈ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥
नानक नामि रते मनु साचा सचो सचु रवीजै हे ॥१६॥६॥
हे नानक ! जो मनुष्य नाम में लीन हो गए हैं, उनका ही मन सच्चा है और वे एक सत्य का ही चिंतन करते हैं॥ १६॥ ६॥
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
मारू महला ३ ॥
मारू महला ३॥
ਸਚੈ ਸਚਾ ਤਖਤੁ ਰਚਾਇਆ ॥
सचै सचा तखतु रचाइआ ॥
सच्चे परमेश्वर ने (सृष्टि को) अपना सच्चा सिंहासन बनाया है,”
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਿਆ ਤਿਥੈ ਮੋਹੁ ਨ ਮਾਇਆ ॥
निज घरि वसिआ तिथै मोहु न माइआ ॥
वह अपने निजघर (दसम द्वार) में बस गया है और वहाँ मोह-माया का कोई प्रभाव नहीं।
ਸਦ ਹੀ ਸਾਚੁ ਵਸਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਹੇ ॥੧॥
सद ही साचु वसिआ घट अंतरि गुरमुखि करणी सारी हे ॥१॥
जिसके हृदय में सदैव सत्य बसा रहता है, उस गुरुमुख का आचरण भी श्रेष्ठ है॥ १॥
ਸਚਾ ਸਉਦਾ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ॥
सचा सउदा सचु वापारा ॥
जब (नाम रूपी) सच्चा सौदा और सच्चा व्यापार किया जाता है,”
ਨ ਤਿਥੈ ਭਰਮੁ ਨ ਦੂਜਾ ਪਸਾਰਾ ॥
न तिथै भरमु न दूजा पसारा ॥
तब वहाँ कोई भृम एवं द्वैतभाव का प्रसार नहीं होता।
ਸਚਾ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਕਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੨॥
सचा धनु खटिआ कदे तोटि न आवै बूझै को वीचारी हे ॥२॥
सच्चे धन का लाभ प्राप्त करने से कोई कमी नहीं आती, कोई विरला विचारवान ही इस तथ्य को बूझता है॥ २॥
ਸਚੈ ਲਾਏ ਸੇ ਜਨ ਲਾਗੇ ॥
सचै लाए से जन लागे ॥
सच्चे प्रभु ने जिन्हें इस व्यापार में लगाया है, वही इस में लग गए हैं।
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਮਸਤਕਿ ਵਡਭਾਗੇ ॥
अंतरि सबदु मसतकि वडभागे ॥
जिनके मस्तक पर उत्तम भाग्य होता है, उनके मन में शब्द का निवास होता है।
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੩॥
सचै सबदि सदा गुण गावहि सबदि रते वीचारी हे ॥३॥
सच्चे शब्द द्वारा वे परमात्मा का ही गुणगान करते हैं और ऐसे विवेकशील पुरुष शब्द में लीन रहते हैं।॥ ३॥
ਸਚੋ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
सचो सचा सचु सालाही ॥
मैं परम-सत्य परमेश्वर की ही स्तुति करता हूँ, जो सदैव शाश्वत है।
ਏਕੋ ਵੇਖਾ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ॥
एको वेखा दूजा नाही ॥
उस एक को ही देखता हूँ और उसके बिना दूसरा कोई नहीं।
ਗੁਰਮਤਿ ਊਚੋ ਊਚੀ ਪਉੜੀ ਗਿਆਨਿ ਰਤਨਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ਹੇ ॥੪॥
गुरमति ऊचो ऊची पउड़ी गिआनि रतनि हउमै मारी हे ॥४॥
गुरु का उपदेश ही सर्वश्रेष्ठ सीढ़ी है, जिससे सत्य तक पहुँचा जा सकता है और ज्ञान रत्न से अहम् को मिटाया जा सकता है॥ ४॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇਆ ॥
माइआ मोहु सबदि जलाइआ ॥
ब्रह्म-शब्द ने मोह-माया को जलाया है।
ਸਚੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਇਆ ॥
सचु मनि वसिआ जा तुधु भाइआ ॥
हे ईश्वर ! जब तुझे भाया तो मन में सत्य अवस्थित हो गया।
ਸਚੇ ਕੀ ਸਭ ਸਚੀ ਕਰਣੀ ਹਉਮੈ ਤਿਖਾ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੫॥
सचे की सभ सची करणी हउमै तिखा निवारी हे ॥५॥
सच्चे प्रभु का किया हुआ सब कुछ सत्य है और नेक आचरण अपनाने से अहंकार एवं तृष्णा को दूर किया जा सकता है॥ ५॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਆਪੇ ਕੀਨਾ ॥
माइआ मोहु सभु आपे कीना ॥
माया-मोह सब परमात्मा ने ही बनाया है और
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨ ਹੀ ਚੀਨਾ ॥
गुरमुखि विरलै किन ही चीना ॥
किसी विरले गुरुमुख ने इस तथ्य की पहचान की है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਸਾਚੀ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਹੇ ॥੬॥
गुरमुखि होवै सु सचु कमावै साची करणी सारी हे ॥६॥
जो गुरुमुख बन जाता है, वह नेक आचरण अपनाता है और सच्ची करनी ही उसका श्रेष्ठ कर्म है॥६॥
ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਜੋ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਈ ॥
कार कमाई जो मेरे प्रभ भाई ॥
उसने वही कार्य किया है, जो मेरे प्रभु को भाया है और
ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ॥
हउमै त्रिसना सबदि बुझाई ॥
शब्द द्वारा अहम् एवं तृष्णाग्नि बुझा ली है।
ਗੁਰਮਤਿ ਸਦ ਹੀ ਅੰਤਰੁ ਸੀਤਲੁ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਨਿਵਾਰੀ ਹੇ ॥੭॥
गुरमति सद ही अंतरु सीतलु हउमै मारि निवारी हे ॥७॥
गुरु की शिक्षा द्वारा मन सदैव शीतल रहता है और अभिमान को मारकर मन से दूर कर दिया है॥ ७॥
ਸਚਿ ਲਗੇ ਤਿਨ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਭਾਵੈ ॥
सचि लगे तिन सभु किछु भावै ॥
जो सत्य में लीन हो गए हैं, उन्हें सब कुछ अच्छा लगता है।
ਸਚੈ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
सचै सबदे सचि सुहावै ॥
वे सच्चे शब्द में ही मग्न रहते हैं और सत्य से ही शोभा प्राप्त करते हैं।
ਐਥੈ ਸਾਚੇ ਸੇ ਦਰਿ ਸਾਚੇ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਸਵਾਰੀ ਹੇ ॥੮॥
ऐथै साचे से दरि साचे नदरी नदरि सवारी हे ॥८॥
जो इहलोक में सत्यशील होते हैं, वे प्रभु के दरबार में भी सत्यशील माने जाते हैं और कृपानिधान प्रभु ने अपनी कृपादृष्टि से उन्हें संवार दिया है ॥८॥
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਜੋ ਦੂਜੈ ਲਾਇਆ ॥
बिनु साचे जो दूजै लाइआ ॥
सत्य के बिना जो द्वैतभाव में चित लगाता है,”
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਦੁਖ ਸਬਾਇਆ ॥
माइआ मोह दुख सबाइआ ॥
उसे माया-मोह के दुख लगे रहते हैं।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਜਾਪੈ ਨਾਹੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ਹੇ ॥੯॥
बिनु गुर दुखु सुखु जापै नाही माइआ मोह दुखु भारी हे ॥९॥
गुरु के बिना उसे यह मालूम नहीं होता कि दुख सुख क्या है? मोह-माया का दुख बहुत भारी है॥ ९॥
ਸਾਚਾ ਸਬਦੁ ਜਿਨਾ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
साचा सबदु जिना मनि भाइआ ॥
जिनके मन को सच्चा शब्द भा गया है,
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨੀ ਕਮਾਇਆ ॥
पूरबि लिखिआ तिनी कमाइआ ॥
उन्होंने पूर्व कर्मालेख का फल पा लिया है।
ਸਚੋ ਸੇਵਹਿ ਸਚੁ ਧਿਆਵਹਿ ਸਚਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਹੇ ॥੧੦॥
सचो सेवहि सचु धिआवहि सचि रते वीचारी हे ॥१०॥
वे विवेकशील पुरुष सत्य की उपासना करते हैं, सत्य का मनन करते हैं और सत्य में ही लीन रहते हैं।॥ १०॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਮੀਠੀ ਲਾਗੀ ॥
गुर की सेवा मीठी लागी ॥
उन्हें गुरु की सेवा ही मीठी लगी है और
ਅਨਦਿਨੁ ਸੂਖ ਸਹਜ ਸਮਾਧੀ ॥
अनदिनु सूख सहज समाधी ॥
रात दिन सहज-समाधि लगाकर सुखी रहते हैं।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਤਿਆ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਆ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵ ਪਿਆਰੀ ਹੇ ॥੧੧॥
हरि हरि करतिआ मनु निरमलु होआ गुर की सेव पिआरी हे ॥११॥
परमात्मा का नाम जपते हुए उनका मन निर्मल हुआ है और उन्हें गुरु की सेवा ही प्यारी लगी है॥ ११॥
ਸੇ ਜਨ ਸੁਖੀਏ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਚੇ ਲਾਏ ॥
से जन सुखीए सतिगुरि सचे लाए ॥
वही भक्तजन सुखी हैं, जिन्हे सतगुरु ने प्रभु की भक्ति में लगा दिया है।
ਆਪੇ ਭਾਣੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
आपे भाणे आपि मिलाए ॥
परमात्मा ने अपनी मर्जी से स्वयं ही मिला लिया है।
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਜਨ ਉਬਰੇ ਹੋਰ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਖੁਆਰੀ ਹੇ ॥੧੨॥
सतिगुरि राखे से जन उबरे होर माइआ मोह खुआरी हे ॥१२॥
जिनकी सतगुरु ने रक्षा की है, वे उबर गए हैं लेकिन अन्य माया-मोह में ही ख्वार हुए हैं।॥१२॥