ਮਃ ੧ ॥
मः १ ॥
महला १॥
ਮਨਹੁ ਜਿ ਅੰਧੇ ਕੂਪ ਕਹਿਆ ਬਿਰਦੁ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ॥
मनहु जि अंधे कूप कहिआ बिरदु न जाणन्ही ॥
मन से अज्ञानांध लोग कुएं के समान हैं, वे अपने वचन का पालन नहीं करते।
ਮਨਿ ਅੰਧੈ ਊਂਧੈ ਕਵਲਿ ਦਿਸਨੑਿ ਖਰੇ ਕਰੂਪ ॥
मनि अंधै ऊंधै कवलि दिसन्हि खरे करूप ॥
मन से अज्ञानांध लोगों का हृदय-कमल उलटा ही होता है और वे खड़े कुरुप ही दिखाई देते हैं।
ਇਕਿ ਕਹਿ ਜਾਣਹਿ ਕਹਿਆ ਬੁਝਹਿ ਤੇ ਨਰ ਸੁਘੜ ਸਰੂਪ ॥
इकि कहि जाणहि कहिआ बुझहि ते नर सुघड़ सरूप ॥
कुछ लोगों को बातचीत करने का तरीका होता है, वे कहे हुए वचन का भेद समझते हैं, दरअसल ऐसे मनुष्य ही बुद्धिमान एवं सुन्दर होते हैं।
ਇਕਨਾ ਨਾਦ ਨ ਬੇਦ ਨ ਗੀਅ ਰਸੁ ਰਸ ਕਸ ਨ ਜਾਣੰਤਿ ॥
इकना नाद न बेद न गीअ रसु रस कस न जाणंति ॥
किसी को गीत-संगीत एवं वेदों का कोई ज्ञान नहीं और न ही भले-बुरे को जानते हैं।
ਇਕਨਾ ਸੁਧਿ ਨ ਬੁਧਿ ਨ ਅਕਲਿ ਸਰ ਅਖਰ ਕਾ ਭੇਉ ਨ ਲਹੰਤਿ ॥
इकना सुधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥
किसी को कोई होश नहीं होती, न बुद्धि होती है, न ही अक्ल होती है और तो और अक्षर-ज्ञान का भेद भी नहीं जानते।
ਨਾਨਕ ਸੇ ਨਰ ਅਸਲਿ ਖਰ ਜਿ ਬਿਨੁ ਗੁਣ ਗਰਬੁ ਕਰੰਤਿ ॥੨॥
नानक से नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंति ॥२॥
गुरु नानक फुरमाते हैं कि जो बिना गुणों के भी अहंकार करते हैं, ऐसे व्यक्ति असल में गधे ही हैं ॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਭ ਪਵਿਤੁ ਹੈ ਧਨੁ ਸੰਪੈ ਮਾਇਆ ॥
गुरमुखि सभ पवितु है धनु स्मपै माइआ ॥
गुरुमुखों के लिए धन, सम्पति, माया इत्यादि सब पवित्र हैं,
ਹਰਿ ਅਰਥਿ ਜੋ ਖਰਚਦੇ ਦੇਂਦੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
हरि अरथि जो खरचदे देंदे सुखु पाइआ ॥
जो प्रभु-सेवा में खर्च करते हैं, उन्हें देते हुए सुख ही मिलता है।
ਜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦੇ ਤਿਨ ਤੋਟਿ ਨ ਆਇਆ ॥
जो हरि नामु धिआइदे तिन तोटि न आइआ ॥
हरि-नाम का ध्यान करने वालों को कोई कमी नहीं आती।
ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਨਦਰੀ ਆਵਦਾ ਮਾਇਆ ਸੁਟਿ ਪਾਇਆ ॥
गुरमुखां नदरी आवदा माइआ सुटि पाइआ ॥
गुरुमुखों को सब ओर ईश्वर ही दिखाई देता है, अतः माया को वे दूर फेंक देते हैं।
ਨਾਨਕ ਭਗਤਾਂ ਹੋਰੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵਈ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥੨੨॥
नानक भगतां होरु चिति न आवई हरि नामि समाइआ ॥२२॥
हे नानक ! भक्तों को अन्य कुछ याद नहीं आता, वे तो हरि-नाम चिंतन में लीन रहते हैं।॥ २२ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
सलोक मः ४ ॥
श्लोक महला ४ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥
सतगुरु की सेवा करने वाले भाग्यशाली हैं,
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਜਿਨੑਾ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
सचै सबदि जिन्हा एक लिव लागी ॥
जिनकी सच्चे शब्द गान में लगन लगी रहती है।
ਗਿਰਹ ਕੁਟੰਬ ਮਹਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਧੀ ॥
गिरह कुट्मब महि सहजि समाधी ॥
वे अपनी गृहस्थी परिवार में प्रभु के ध्यान में आनंद-मग्न रहते हैं।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੇ ਸਚੇ ਬੈਰਾਗੀ ॥੧॥
नानक नामि रते से सचे बैरागी ॥१॥
हे नानक ! हरि-नाम में निमग्न रहने वाले ही सच्चे वैराग्यवान हैं।॥१॥
ਮਃ ੪ ॥
मः ४ ॥
महला ४ ॥
ਗਣਤੈ ਸੇਵ ਨ ਹੋਵਈ ਕੀਤਾ ਥਾਇ ਨ ਪਾਇ ॥
गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥
लाभ का हिसाब लगाकर की गई सेवा सफल नहीं होती, सब निष्फल हो जाता है।
ਸਬਦੈ ਸਾਦੁ ਨ ਆਇਓ ਸਚਿ ਨ ਲਗੋ ਭਾਉ ॥
सबदै सादु न आइओ सचि न लगो भाउ ॥
इससे शब्दगान का आनंद नहीं आता और न ही सत्य से प्रेम होता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਿਆਰਾ ਨ ਲਗਈ ਮਨਹਠਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
सतिगुरु पिआरा न लगई मनहठि आवै जाइ ॥
उसका सच्चे गुरु से प्रेम नहीं होता, वह मन के हठ से कार्य करके आता जाता रहता है।
ਜੇ ਇਕ ਵਿਖ ਅਗਾਹਾ ਭਰੇ ਤਾਂ ਦਸ ਵਿਖਾਂ ਪਿਛਾਹਾ ਜਾਇ ॥
जे इक विख अगाहा भरे तां दस विखां पिछाहा जाइ ॥
यदि वह एक कदम आगे उठाता है तो दस कंदम पीछे चला जाता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਚਾਕਰੀ ਜੇ ਚਲਹਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
सतिगुर की सेवा चाकरी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
सतगुरु की सेवा वही सफल एवं फलदायक है, अगर गुरु की रज़ा में सेवा की जाए।
ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੋ ਮਿਲੈ ਸਹਜੇ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
आपु गवाइ सतिगुरू नो मिलै सहजे रहै समाइ ॥
अहम्-भावना को छोड़कर सतगुरु से मिलने वाला सुख-शान्ति में लीन रहता है।
ਨਾਨਕ ਤਿਨੑਾ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਚੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇ ॥੨॥
नानक तिन्हा नामु न वीसरै सचे मेलि मिलाइ ॥२॥
हे नानक ! ऐसे व्यक्ति को परमात्मा का नाम हरगिज नहीं भूलता और वह सच्चे प्रभु से मिला रहता है।॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਖਾਨ ਮਲੂਕ ਕਹਾਇਦੇ ਕੋ ਰਹਣੁ ਨ ਪਾਈ ॥
खान मलूक कहाइदे को रहणु न पाई ॥
बड़े-बड़े बादशाह एवं खान कहलाने वाले भी सदा नहीं रह पाते।
ਗੜ੍ਹ੍ਹ ਮੰਦਰ ਗਚ ਗੀਰੀਆ ਕਿਛੁ ਸਾਥਿ ਨ ਜਾਈ ॥
गड़्ह मंदर गच गीरीआ किछु साथि न जाई ॥
भव्य महल और घर इत्यादि कुछ भी साथ नहीं जाता।
ਸੋਇਨ ਸਾਖਤਿ ਪਉਣ ਵੇਗ ਧ੍ਰਿਗੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
सोइन साखति पउण वेग ध्रिगु ध्रिगु चतुराई ॥
अगर कोई सोने की काठी डालकर पवन की रफ्तार की तरह घोड़े को दौड़ाता है, तो इसकी चतुराई पर धिक्कार है।
ਛਤੀਹ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪਰਕਾਰ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਮੈਲੁ ਵਧਾਈ ॥
छतीह अम्रित परकार करहि बहु मैलु वधाई ॥
छत्तीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खाने वाला मनुष्य अपनी मैल में और भी वृद्धि करता है।
ਨਾਨਕ ਜੋ ਦੇਵੈ ਤਿਸਹਿ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ਮਨਮੁਖਿ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ॥੨੩॥
नानक जो देवै तिसहि न जाणन्ही मनमुखि दुखु पाई ॥२३॥
हे नानक ! जो दे रहा है, उस परमात्मा को मानता नहीं, ऐसा स्वेच्छाचारी दुख ही पाता है॥ २३ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੩ ॥
सलोक मः ३ ॥
श्लोक महला ३ ॥
ਪੜ੍ਹ੍ਹਿ ਪੜ੍ਹ੍ਹਿ ਪੰਡਿਤ ਮੋੁਨੀ ਥਕੇ ਦੇਸੰਤਰ ਭਵਿ ਥਕੇ ਭੇਖਧਾਰੀ ॥
पड़्हि पड़्हि पंडित मोनी थके देसंतर भवि थके भेखधारी ॥
वेद-शास्त्रों का पाठ-पठन कर पण्डित एवं मौन रहकर मौनी थक गए हैं, देश-देशान्तर भ्रमण करके वेषधारी साधु भी थक गए हैं।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਨਾਉ ਕਦੇ ਨ ਪਾਇਨਿ ਦੁਖੁ ਲਾਗਾ ਅਤਿ ਭਾਰੀ ॥
दूजै भाइ नाउ कदे न पाइनि दुखु लागा अति भारी ॥
द्वैतभाव में नाम कभी प्राप्त नहीं होता और भारी दुख ही लगे रहते हैं।
ਮੂਰਖ ਅੰਧੇ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਸੇਵਹਿ ਮਾਇਆ ਕੈ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥
मूरख अंधे त्रै गुण सेवहि माइआ कै बिउहारी ॥
माया के व्यापारी मूर्ख एवं अन्धे हैं, जो तीन गुणों में लीन रहते हैं।
ਅੰਦਰਿ ਕਪਟੁ ਉਦਰੁ ਭਰਣ ਕੈ ਤਾਈ ਪਾਠ ਪੜਹਿ ਗਾਵਾਰੀ ॥
अंदरि कपटु उदरु भरण कै ताई पाठ पड़हि गावारी ॥
इनके मन में कपट होता है, ऐसे गंवार अपना पेट भरने के लिए पाठ-पूजा करते हैं।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਜਿਨ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਮਾਰੀ ॥
सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए जिन हउमै विचहु मारी ॥
जो अहम् को त्यागकर सतिगुरु की सेवा करते हैं, वही सुख प्राप्त करते हैं।
ਨਾਨਕ ਪੜਣਾ ਗੁਨਣਾ ਇਕੁ ਨਾਉ ਹੈ ਬੂਝੈ ਕੋ ਬੀਚਾਰੀ ॥੧॥
नानक पड़णा गुनणा इकु नाउ है बूझै को बीचारी ॥१॥
हे नानक ! कोई मननशील इस तथ्य को समझता है कि केवल हरिनाम का पठन एवं गुणानुवाद ही सफल है॥१॥
ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥
ਨਾਂਗੇ ਆਵਣਾ ਨਾਂਗੇ ਜਾਣਾ ਹਰਿ ਹੁਕਮੁ ਪਾਇਆ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥
नांगे आवणा नांगे जाणा हरि हुकमु पाइआ किआ कीजै ॥
दुनिया में खाली आना और खाली ही चले जाना है, यह विधाता का विधान है तो फिर भला आपत्ति कैसे की जा सकती है।
ਜਿਸ ਕੀ ਵਸਤੁ ਸੋਈ ਲੈ ਜਾਇਗਾ ਰੋਸੁ ਕਿਸੈ ਸਿਉ ਕੀਜੈ ॥
जिस की वसतु सोई लै जाइगा रोसु किसै सिउ कीजै ॥
(अपने की मृत्यु पर) किसी से गुस्सा करना ठीक नहीं, क्योंकि जिस (प्रभु) की वस्तु होती है, वही ले जाता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਭਾਣਾ ਮੰਨੇ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਜੈ ॥
गुरमुखि होवै सु भाणा मंने सहजे हरि रसु पीजै ॥
जो गुरमुख होता है, वह परमात्मा की रज़ा को मानता है और स्वाभाविक ही हरि-नाम का पान करता है।
ਨਾਨਕ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸਦਾ ਸਲਾਹਿਹੁ ਰਸਨਾ ਰਾਮੁ ਰਵੀਜੈ ॥੨॥
नानक सुखदाता सदा सलाहिहु रसना रामु रवीजै ॥२॥
हे नानक ! सदा सुखदाता की स्तुतिं करो, रसना से प्रभु भजन में निमग्न रहो ॥२॥