ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਬਖਸਿਆ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰਾ ॥੨॥
जन नानक कउ हरि बखसिआ हरि भगति भंडारा ॥२॥
हे हरि ! नानक को भी तूने अपनी भक्ति का भण्डार प्रदान किया है॥ २॥
ਹਮ ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਵਿਥਰਹ ਸੁਆਮੀ ਤੂੰ ਅਪਰ ਅਪਾਰੋ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
हम किआ गुण तेरे विथरह सुआमी तूं अपर अपारो राम राजे ॥
हे स्वामी ! हम तेरे कौन-से गुणों का वर्णन कर सकते हैं ? हे राजन प्रभु ! तू तो अपरंपार है।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਾਲਾਹਹ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਏਹਾ ਆਸ ਆਧਾਰੋ ॥
हरि नामु सालाहह दिनु राति एहा आस आधारो ॥
मैं रात-दिन हरि-नाम की सराहना करता हूँ केवल यही मेरी आशा एवं आधार है।
ਹਮ ਮੂਰਖ ਕਿਛੂਅ ਨ ਜਾਣਹਾ ਕਿਵ ਪਾਵਹ ਪਾਰੋ ॥
हम मूरख किछूअ न जाणहा किव पावह पारो ॥
हे प्रभु! हम मूर्ख हैं और कुछ भी नहीं जानते। हम तुम्हारा अन्त किस तरह पा सकते हैं ?
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕਾ ਦਾਸੁ ਹੈ ਹਰਿ ਦਾਸ ਪਨਿਹਾਰੋ ॥੩॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि दास पनिहारो ॥३॥
नानक हरि का दास है, वास्तव में हरि के दासों का पनिहार है॥ ३॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਿ ਲੈ ਹਮ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭ ਆਏ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिउ भावै तिउ राखि लै हम सरणि प्रभ आए राम राजे ॥
हे प्रभु ! जैसे तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही हमें बचा लीजिए। हम तेरी शरण में आए हैं।
ਹਮ ਭੂਲਿ ਵਿਗਾੜਹ ਦਿਨਸੁ ਰਾਤਿ ਹਰਿ ਲਾਜ ਰਖਾਏ ॥
हम भूलि विगाड़ह दिनसु राति हरि लाज रखाए ॥
हम दिन-रात जीवन-पथ से भ्रष्ट होकर अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। हे हरि ! हमारी मान प्रतिष्ठा रखें।
ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤੂੰ ਗੁਰੁ ਪਿਤਾ ਹੈ ਦੇ ਮਤਿ ਸਮਝਾਏ ॥
हम बारिक तूं गुरु पिता है दे मति समझाए ॥
हम तेरी संतान हैं तुम हमारे गुरु एवं पिता हो, हमें सुमति देकर सन्मार्ग लगाओ।
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਦਾਸੁ ਹਰਿ ਕਾਂਢਿਆ ਹਰਿ ਪੈਜ ਰਖਾਏ ॥੪॥੧੦॥੧੭॥
जनु नानकु दासु हरि कांढिआ हरि पैज रखाए ॥४॥१०॥१७॥
हे प्रभु ! नानक हरि का दास कहलाता है, इसलिए उसकी मान-प्रतिष्ठा रखो ॥ ४ ॥ १० ॥ १७ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसा महला ४ ॥
आसा महला ४ ॥
ਜਿਨ ਮਸਤਕਿ ਧੁਰਿ ਹਰਿ ਲਿਖਿਆ ਤਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिन मसतकि धुरि हरि लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ राम राजे ॥
जिन लोगों के मस्तक पर प्रारम्भ से ही हरि ने लेख लिखा है, उन्हें सच्चा गुरु मिल गया है।
ਅਗਿਆਨੁ ਅੰਧੇਰਾ ਕਟਿਆ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਘਟਿ ਬਲਿਆ ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु घटि बलिआ ॥
गुरु ने उनके अज्ञान के अन्धेरे को मिटा दिया है और उनके अन्तर्मन में गुरु, ज्ञान का दीपक प्रज्वलित हो गया है।
ਹਰਿ ਲਧਾ ਰਤਨੁ ਪਦਾਰਥੋ ਫਿਰਿ ਬਹੁੜਿ ਨ ਚਲਿਆ ॥
हरि लधा रतनु पदारथो फिरि बहुड़ि न चलिआ ॥
उन्होंने हरि-नाम रूपी रत्न ढूंढ लिया है और वे दोबारा जन्म-मरण के चक्र में नहीं भटकते।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਆਰਾਧਿਆ ਆਰਾਧਿ ਹਰਿ ਮਿਲਿਆ ॥੧॥
जन नानक नामु आराधिआ आराधि हरि मिलिआ ॥१॥
नानक ने नाम की आराधना की है और आराधना द्वारा वह हरि-प्रभु से मिल गया है ॥ १॥
ਜਿਨੀ ਐਸਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਿਓ ਸੇ ਕਾਹੇ ਜਗਿ ਆਏ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिनी ऐसा हरि नामु न चेतिओ से काहे जगि आए राम राजे ॥
जिन्होंने ऐसे हरि के नाम को याद नहीं किया, वे इस जगत में क्यों आए हैं ?
ਇਹੁ ਮਾਣਸ ਜਨਮੁ ਦੁਲੰਭੁ ਹੈ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਬਿਰਥਾ ਸਭੁ ਜਾਏ ॥
इहु माणस जनमु दुल्मभु है नाम बिना बिरथा सभु जाए ॥
यह मानव-जन्म बड़ा दुर्लभ है और प्रभु-नाम के बिना यह व्यर्थ ही चला जाता है।
ਹੁਣਿ ਵਤੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਬੀਜਿਓ ਅਗੈ ਭੁਖਾ ਕਿਆ ਖਾਏ ॥
हुणि वतै हरि नामु न बीजिओ अगै भुखा किआ खाए ॥
अब जीवन रूपी योग्य ऋतु में मनुष्य हरि का नाम नहीं बोता तदुपरांत आगे (परलोक में) भूखा क्या खाएगा ?
ਮਨਮੁਖਾ ਨੋ ਫਿਰਿ ਜਨਮੁ ਹੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਾਏ ॥੨॥
मनमुखा नो फिरि जनमु है नानक हरि भाए ॥२॥
मनमुख मनुष्य बार-बार जन्म लेते हैं, हे नानक ! परमात्मा को यही मंजूर है ॥ २॥
ਤੂੰ ਹਰਿ ਤੇਰਾ ਸਭੁ ਕੋ ਸਭਿ ਤੁਧੁ ਉਪਾਏ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
तूं हरि तेरा सभु को सभि तुधु उपाए राम राजे ॥
हे हरि ! तू समस्त जीवों का स्वामी है और यह सब कुछ तेरा ही है। तूने ही सब को पैदा किया है।
ਕਿਛੁ ਹਾਥਿ ਕਿਸੈ ਦੈ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਸਭਿ ਚਲਹਿ ਚਲਾਏ ॥
किछु हाथि किसै दै किछु नाही सभि चलहि चलाए ॥
जीवों के वश में कुछ भी नहीं, जैसे तुम चलाते हो वैसे ही वे जीवन-आचरण करते हैं।
ਜਿਨੑ ਤੂੰ ਮੇਲਹਿ ਪਿਆਰੇ ਸੇ ਤੁਧੁ ਮਿਲਹਿ ਜੋ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਏ ॥
जिन्ह तूं मेलहि पिआरे से तुधु मिलहि जो हरि मनि भाए ॥
हे मेरे प्रिय प्रभु ! वही जीव तुझसे मिलते हैं, जिन्हें तुम स्वयं मिलाते हो और जो तेरे मन को अच्छे लगते हैं।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਤਰਾਏ ॥੩॥
जन नानक सतिगुरु भेटिआ हरि नामि तराए ॥३॥
नानक की सतिगुरु से भेंट हो गई है, जिसने हरि के नाम द्वारा उसे भवसागर से पार कर दिया है॥ ३॥
ਕੋਈ ਗਾਵੈ ਰਾਗੀ ਨਾਦੀ ਬੇਦੀ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ਕਰਿ ਨਹੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਭੀਜੈ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
कोई गावै रागी नादी बेदी बहु भाति करि नही हरि हरि भीजै राम राजे ॥
कुछ लोग अनेक प्रकार से राग गाकर, शंख बजाकर एवं वेदों के अध्ययन द्वारा भगवान का गुणगान करते हैं लेकिन इन विधियों से परमात्मा प्रसन्न नहीं होता।
ਜਿਨਾ ਅੰਤਰਿ ਕਪਟੁ ਵਿਕਾਰੁ ਹੈ ਤਿਨਾ ਰੋਇ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥
जिना अंतरि कपटु विकारु है तिना रोइ किआ कीजै ॥
जिनके मन में छल-कपट एवं विकार हैं, उनके विलाप करने का क्या अभिप्राय है ?
ਹਰਿ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਸਿਰਿ ਰੋਗ ਹਥੁ ਦੀਜੈ ॥
हरि करता सभु किछु जाणदा सिरि रोग हथु दीजै ॥
विश्व का रचयिता परमात्मा सब कुछ जानता है चाहे मनुष्य अपने पाप छिपाने का कितना ही प्रयास करता रहे।
ਜਿਨਾ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਿਰਦਾ ਸੁਧੁ ਹੈ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਲੀਜੈ ॥੪॥੧੧॥੧੮॥
जिना नानक गुरमुखि हिरदा सुधु है हरि भगति हरि लीजै ॥४॥११॥१८॥
हे नानक ! जिन गुरुमुखों का हृदय शुद्ध है, वे हरि-भक्ति करके हरि को पा लेते हैं॥ ४ ॥ ११ ॥ १८ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसा महला ४ ॥
आसा महला ४ ॥
ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹੈ ਤੇ ਜਨ ਸੁਘੜ ਸਿਆਣੇ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥
जिनके मन में भगवान का प्यार है, वे लोग सुघड़ एवं बुद्धिमान हैं।
ਜੇ ਬਾਹਰਹੁ ਭੁਲਿ ਚੁਕਿ ਬੋਲਦੇ ਭੀ ਖਰੇ ਹਰਿ ਭਾਣੇ ॥
जे बाहरहु भुलि चुकि बोलदे भी खरे हरि भाणे ॥
यदि वे बाहर से बोलने में भूल चूक भी करते हैं तो भी वे भगवान को बहुत अच्छे लगते हैं।
ਹਰਿ ਸੰਤਾ ਨੋ ਹੋਰੁ ਥਾਉ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਮਾਣੁ ਨਿਮਾਣੇ ॥
हरि संता नो होरु थाउ नाही हरि माणु निमाणे ॥
भगवान के संतजनों का उसके सिवाय दूसरा कोई स्थान नहीं। प्रभु ही मानविहीन लोगों का सम्मान है।
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਦੀਬਾਣੁ ਹੈ ਹਰਿ ਤਾਣੁ ਸਤਾਣੇ ॥੧॥
जन नानक नामु दीबाणु है हरि ताणु सताणे ॥१॥
हे नानक ! हरि का नाम ही संतों भक्तों का सहारा है और उसका बल ही उन्हें बलवान बनाता है॥ १॥
ਜਿਥੈ ਜਾਇ ਬਹੈ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੋ ਥਾਨੁ ਸੁਹਾਵਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरू सो थानु सुहावा राम राजे ॥
जहाँ भी जाकर मेरा सच्चा गुरु विराजमान होता है, वह स्थान अति सुन्दर है।
ਗੁਰਸਿਖੀਂ ਸੋ ਥਾਨੁ ਭਾਲਿਆ ਲੈ ਧੂਰਿ ਮੁਖਿ ਲਾਵਾ ॥
गुरसिखीं सो थानु भालिआ लै धूरि मुखि लावा ॥
गुरु-सिक्ख उस स्थान को ढूंढ लेते हैं और उसकी धूलि लेकर अपने माथे पर लगाते हैं।
ਗੁਰਸਿਖਾ ਕੀ ਘਾਲ ਥਾਇ ਪਈ ਜਿਨ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਾ ॥
गुरसिखा की घाल थाइ पई जिन हरि नामु धिआवा ॥
जो गुरु के सिक्ख हरि-नाम का ध्यान करते हैं, उनकी सेवा सफल हो जाती है।
ਜਿਨੑ ਨਾਨਕੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਜਿਆ ਤਿਨ ਹਰਿ ਪੂਜ ਕਰਾਵਾ ॥੨॥
जिन्ह नानकु सतिगुरु पूजिआ तिन हरि पूज करावा ॥२॥
हे नानक ! जिन्होंने सतिगुरु की पूजा की है, प्रभु उनकी पूजा दुनिया से करवाता है॥ २॥
ਗੁਰਸਿਖਾ ਮਨਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹੈ ਹਰਿ ਨਾਮ ਹਰਿ ਤੇਰੀ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
गुरसिखा मनि हरि प्रीति है हरि नाम हरि तेरी राम राजे ॥
गुरु-सिक्खों के मन में परमात्मा के नाम से ही प्रेम हैं। हे प्रभु ! वह तुझे प्रेम करते हैं।