ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਆਨੑੇਰੁ ਗਵਾਇਆ ॥
गुर परसादी घटि चानणा आन्हेरु गवाइआ ॥
गुरु की प्रसन्नता से हृदय में उजाला होता है और अज्ञान का अन्धेरा दूर हो जाता है।
ਲੋਹਾ ਪਾਰਸਿ ਭੇਟੀਐ ਕੰਚਨੁ ਹੋਇ ਆਇਆ ॥
लोहा पारसि भेटीऐ कंचनु होइ आइआ ॥
(मनुष्य रूपी) लोहा (गुरु रूपी) पारस से मिलकर सोना हो जाता है।
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਨਾਉ ਪਾਈਐ ਮਿਲਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाईऐ मिलि नामु धिआइआ ॥
हे नानक ! सतगुरु के मिलने से ही हरि-नाम प्राप्त होता है, तब परमेश्वर के नाम का ध्यान-मनन होता है।
ਜਿਨੑ ਕੈ ਪੋਤੈ ਪੁੰਨੁ ਹੈ ਤਿਨੑੀ ਦਰਸਨੁ ਪਾਇਆ ॥੧੯॥
जिन्ह कै पोतै पुंनु है तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१९॥
जिनके भाग्य में पुण्य फल होता है, उनको ही हरि-दर्शन प्राप्त होते हैं।॥ १६॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
सलोक मः १ ॥
श्लोक महला १॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਤਿਨਾ ਕਾ ਜੀਵਿਆ ਜਿ ਲਿਖਿ ਲਿਖਿ ਵੇਚਹਿ ਨਾਉ ॥
ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥
(छी ! छी !!) ऐसे व्यक्तियों का जीना धिक्कार योग्य है, जो नाम लिख-लिखकर बेच रहे हैं।
ਖੇਤੀ ਜਿਨ ਕੀ ਉਜੜੈ ਖਲਵਾੜੇ ਕਿਆ ਥਾਉ ॥
खेती जिन की उजड़ै खलवाड़े किआ थाउ ॥
खेती तो उजाड़ते जा रहे हैं, खलिहान के वक्त क्या बचेगा।(यदि नाम रूपी लाभ ही बेच दिया तो फल क्या मिलेगा)
ਸਚੈ ਸਰਮੈ ਬਾਹਰੇ ਅਗੈ ਲਹਹਿ ਨ ਦਾਦਿ ॥
सचै सरमै बाहरे अगै लहहि न दादि ॥
सत्य एवं मेहनत के बिना ईश्वर के आगे कोई श्रेय नहीं मिलता।
ਅਕਲਿ ਏਹ ਨ ਆਖੀਐ ਅਕਲਿ ਗਵਾਈਐ ਬਾਦਿ ॥
अकलि एह न आखीऐ अकलि गवाईऐ बादि ॥
यदि विवाद एवं झगड़े में बुद्धि को बर्बाद किया जाए तो बुद्धिमानी नहीं कहा जाता।
ਅਕਲੀ ਸਾਹਿਬੁ ਸੇਵੀਐ ਅਕਲੀ ਪਾਈਐ ਮਾਨੁ ॥
अकली साहिबु सेवीऐ अकली पाईऐ मानु ॥
काबलियत एवं बुद्धिमता से परमात्मा की उपासना करो, इस बुद्धिमता से ही मान-प्रतिष्ठा को प्राप्त किया जा सकता है।
ਅਕਲੀ ਪੜ੍ਹ੍ਹਿ ਕੈ ਬੁਝੀਐ ਅਕਲੀ ਕੀਚੈ ਦਾਨੁ ॥
अकली पड़्हि कै बुझीऐ अकली कीचै दानु ॥
बुद्धि से पठन कर समझना चाहिए और अन्यों को भी बुद्धि प्रदान करो।
ਨਾਨਕੁ ਆਖੈ ਰਾਹੁ ਏਹੁ ਹੋਰਿ ਗਲਾਂ ਸੈਤਾਨੁ ॥੧॥
नानकु आखै राहु एहु होरि गलां सैतानु ॥१॥
गुरु नानक कथन करते हैं कि केवल यही सच्चा रास्ता है, अन्य बातें तो शैतानों का काम है॥१॥
ਮਃ ੨ ॥
मः २ ॥
महला २ ॥
ਜੈਸਾ ਕਰੈ ਕਹਾਵੈ ਤੈਸਾ ਐਸੀ ਬਨੀ ਜਰੂਰਤਿ ॥
जैसा करै कहावै तैसा ऐसी बनी जरूरति ॥
जरूरत इस बात की है कि जैसा कोई (भला-बुरा) आचरण करता है, वैसा ही स्वयं को कहला सकता है।
ਹੋਵਹਿ ਲਿੰਙ ਝਿੰਙ ਨਹ ਹੋਵਹਿ ਐਸੀ ਕਹੀਐ ਸੂਰਤਿ ॥
होवहि लिंङ झिंङ नह होवहि ऐसी कहीऐ सूरति ॥
ऐसा ही जीव सुन्दर रूप वाला कहा जाता है, जिसके पास गुण रूपी अंग हैं, बुराइयों से भरा कुरुप नहीं होना चाहिए।
ਜੋ ਓਸੁ ਇਛੇ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ਤਾਂ ਨਾਨਕ ਕਹੀਐ ਮੂਰਤਿ ॥੨॥
जो ओसु इछे सो फलु पाए तां नानक कहीऐ मूरति ॥२॥
हे नानक ! वही प्रतिष्ठित कहलाता है, जो ईश्वर को मनाता है, जो कामना करता है, वह वही फल पाता है ॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਿਰਖੁ ਹੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸਿ ਫਲਿਆ ॥
सतिगुरु अम्रित बिरखु है अम्रित रसि फलिआ ॥
सतगुरु अमृत का वृक्ष है, जिसे अमृत रस का फल लगता है
ਜਿਸੁ ਪਰਾਪਤਿ ਸੋ ਲਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਿਲਿਆ ॥
जिसु परापति सो लहै गुर सबदी मिलिआ ॥
जिसे प्राप्त होता है, वही फल पाता है और गुरु के उपदेश से ही मिलता है।
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਰਲਿਆ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै हरि सेती रलिआ ॥
जो सतगुरु की रज़ा में चलता है, वह ईश्वर के साथ लीन हो जाता है।
ਜਮਕਾਲੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਕਈ ਘਟਿ ਚਾਨਣੁ ਬਲਿਆ ॥
जमकालु जोहि न सकई घटि चानणु बलिआ ॥
उसके हृदय में ज्ञान का आलोक होता है और यमदूत उसे तंग नहीं करते।
ਨਾਨਕ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਅਨੁ ਫਿਰਿ ਗਰਭਿ ਨ ਗਲਿਆ ॥੨੦॥
नानक बखसि मिलाइअनु फिरि गरभि न गलिआ ॥२०॥
हे नानक ! ईश्वर कृपा करके अपने साथ मिला लेता है और पुनः वह गर्भ योनि में तंग नहीं होता ॥ २० ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
सलोक मः १ ॥
श्लोक महला १॥
ਸਚੁ ਵਰਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਤੀਰਥੁ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਇਸਨਾਨੁ ॥
सचु वरतु संतोखु तीरथु गिआनु धिआनु इसनानु ॥
वही मनुष्य महत्वपूर्ण है, जिसका सत्य ही व्रत-उपवास, संतोष तीर्थ एवं ज्ञान-ध्यान स्नान होता है।
ਦਇਆ ਦੇਵਤਾ ਖਿਮਾ ਜਪਮਾਲੀ ਤੇ ਮਾਣਸ ਪਰਧਾਨ ॥
दइआ देवता खिमा जपमाली ते माणस परधान ॥
वह दया को देवता एवं क्षमा भावना को जपने वाली माला मानता है।
ਜੁਗਤਿ ਧੋਤੀ ਸੁਰਤਿ ਚਉਕਾ ਤਿਲਕੁ ਕਰਣੀ ਹੋਇ ॥
जुगति धोती सुरति चउका तिलकु करणी होइ ॥
उसकी सच्ची जीवन-युक्ति ही धोती, सुरति चौका और शुभ कर्म ही तिलक होता है।
ਭਾਉ ਭੋਜਨੁ ਨਾਨਕਾ ਵਿਰਲਾ ਤ ਕੋਈ ਕੋਇ ॥੧॥
भाउ भोजनु नानका विरला त कोई कोइ ॥१॥
लोगों से प्रेम करना भोजन होता है, गुरु नानक फुरमाते हैं, ऐसा मनुष्य कोई विरला ही होता है।॥१॥
ਮਹਲਾ ੩ ॥
महला ३ ॥
महला ३॥
ਨਉਮੀ ਨੇਮੁ ਸਚੁ ਜੇ ਕਰੈ ॥
नउमी नेमु सचु जे करै ॥
यदि सत्य को नियम बनाया जाए तो वही नवर्मी है।
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਉਚਰੈ ॥
काम क्रोधु त्रिसना उचरै ॥
काम, क्रोध एवं तृष्णा को छोड़ देना चाहिए।
ਦਸਮੀ ਦਸੇ ਦੁਆਰ ਜੇ ਠਾਕੈ ਏਕਾਦਸੀ ਏਕੁ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ॥
दसमी दसे दुआर जे ठाकै एकादसी एकु करि जाणै ॥
यदि दस इन्द्रियों को काबू में किया जाए तो वही दसमी है। एक परमेश्वर की सत्ता को मानना ही एकादशी है।
ਦੁਆਦਸੀ ਪੰਚ ਵਸਗਤਿ ਕਰਿ ਰਾਖੈ ਤਉ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥
दुआदसी पंच वसगति करि राखै तउ नानक मनु मानै ॥
पाँच विकारों को वश में रखा जाए तो द्वादशी है, गुरु नानक का कथन है कि इस तरह मन प्रसन्न हो सकता है।
ਐਸਾ ਵਰਤੁ ਰਹੀਜੈ ਪਾਡੇ ਹੋਰ ਬਹੁਤੁ ਸਿਖ ਕਿਆ ਦੀਜੈ ॥੨॥
ऐसा वरतु रहीजै पाडे होर बहुतु सिख किआ दीजै ॥२॥
हे पण्डित जी ! ऐसा व्रत रखना चाहिए, भला और अधिक शिक्षा देने का क्या लाभ है॥२ ॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਭੂਪਤਿ ਰਾਜੇ ਰੰਗ ਰਾਇ ਸੰਚਹਿ ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ॥
भूपति राजे रंग राइ संचहि बिखु माइआ ॥
बादशाह, राजा एवं भिखारी धन-दौलत इकठ्ठा करने में लगे हुए हैं।
ਕਰਿ ਕਰਿ ਹੇਤੁ ਵਧਾਇਦੇ ਪਰ ਦਰਬੁ ਚੁਰਾਇਆ ॥
करि करि हेतु वधाइदे पर दरबु चुराइआ ॥
जितना धन इकठ्ठा करते हैं, उनका उतना ही मोह बढ़ता है और पराया धन चुराते हैं।
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਨ ਵਿਸਹਹਿ ਬਹੁ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗਾਇਆ ॥
पुत्र कलत्र न विसहहि बहु प्रीति लगाइआ ॥
इनका धन से इतना प्रेम लगा हुआ है कि अपने पुत्र एवं पत्नी पर भी विश्वास नहीं करते।
ਵੇਖਦਿਆ ਹੀ ਮਾਇਆ ਧੁਹਿ ਗਈ ਪਛੁਤਹਿ ਪਛੁਤਾਇਆ ॥
वेखदिआ ही माइआ धुहि गई पछुतहि पछुताइआ ॥
देखते ही देखते दौलत छीन ली जाती है और बाद में पछताते हैं।
ਜਮ ਦਰਿ ਬਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਾਇਆ ॥੨੧॥
जम दरि बधे मारीअहि नानक हरि भाइआ ॥२१॥
हे नानक ! ऐसे लोगों को यम के द्वार पर दण्ड प्राप्त होता है, ईश्वर को यही मंजूर है॥ २१॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੧ ॥
सलोक मः १ ॥
श्लोक महूला १ ॥
ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣਾ ਗਾਵੈ ਗੀਤ ॥
गिआन विहूणा गावै गीत ॥
ज्ञानविहीन पुजारी ईश्वर के गीत गाता है।
ਭੁਖੇ ਮੁਲਾਂ ਘਰੇ ਮਸੀਤਿ ॥
भुखे मुलां घरे मसीति ॥
धन का भूखा मुल्ला घर को मस्जिद बनाकर अपना साधन बनाता है।
ਮਖਟੂ ਹੋਇ ਕੈ ਕੰਨ ਪੜਾਏ ॥
मखटू होइ कै कंन पड़ाए ॥
मनुष्य आलसी होकर कान फड़वा कर योगी बन जाता है और
ਫਕਰੁ ਕਰੇ ਹੋਰੁ ਜਾਤਿ ਗਵਾਏ ॥
फकरु करे होरु जाति गवाए ॥
फकीर बनकर अपनी जाति गंवा देता है।
ਗੁਰੁ ਪੀਰੁ ਸਦਾਏ ਮੰਗਣ ਜਾਇ ॥
गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ ॥
कुछ गुरु-पीर कहलाकर माँगने जाते हैं।
ਤਾ ਕੈ ਮੂਲਿ ਨ ਲਗੀਐ ਪਾਇ ॥
ता कै मूलि न लगीऐ पाइ ॥
ऐसे लोगों के पैर बिल्कुल नहीं छूने चाहिएं।
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥
घालि खाइ किछु हथहु देइ ॥
जो मेहनत करके निर्वाह करता है, दूसरों की मदद अथवा दान करता है,
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥੧॥
नानक राहु पछाणहि सेइ ॥१॥
हे नानक ! ऐसा व्यक्ति ही सच्चा जीवन राह पहचानता है ॥ १॥