ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ਸਾਚਾ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਜਿੰਨਿ ਉਪਾਇਆ ॥
हरि सिमरि एकंकारु साचा सभु जगतु जिंनि उपाइआ ॥
जिसने समूचा जगत उत्पन्न किया है, उस सत्यस्वरूप ओंकार की अर्चना करो।
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਅਗਨਿ ਬਾਧੇ ਗੁਰਿ ਖੇਲੁ ਜਗਤਿ ਦਿਖਾਇਆ ॥
पउणु पाणी अगनि बाधे गुरि खेलु जगति दिखाइआ ॥
उस गुरु-परमेश्वर ने पवन, पानी, अग्नि इत्यादि को नियंत्रण में कर जगत तमाशा दिखाया है।
ਆਚਾਰਿ ਤੂ ਵੀਚਾਰਿ ਆਪੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੰਜਮ ਜਪ ਤਪੋ ॥
आचारि तू वीचारि आपे हरि नामु संजम जप तपो ॥
ऐ मन ! हरिनाम का चिंतन ही तेरा पूजा-पाठ, तपस्या एवं संयम है, यही तेरा धर्म है।
ਸਖਾ ਸੈਨੁ ਪਿਆਰੁ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਕਾ ਜਪੁ ਜਪੋ ॥੨॥
सखा सैनु पिआरु प्रीतमु नामु हरि का जपु जपो ॥२॥
हरिनाम का जाप करो, क्योंकि यही सच्चा साथी, संबंधी एवं प्रियतम है॥ २॥
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਤੂ ਥਿਰੁ ਰਹੁ ਚੋਟ ਨ ਖਾਵਹੀ ਰਾਮ ॥
ए मन मेरिआ तू थिरु रहु चोट न खावही राम ॥
ऐ मन ! तू स्थिर रह, चोट मत खाना।
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਹੀ ਰਾਮ ॥
ए मन मेरिआ गुण गावहि सहजि समावही राम ॥
प्रभु के गुण गाकर सहज-स्वभाव समा जाना।
ਗੁਣ ਗਾਇ ਰਾਮ ਰਸਾਇ ਰਸੀਅਹਿ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਸਾਰਹੇ ॥
गुण गाइ राम रसाइ रसीअहि गुर गिआन अंजनु सारहे ॥
प्रभु के गुण गाकर प्रेम में लीन रहना, गुरु-ज्ञान का सुरमा लगाओ।
ਤ੍ਰੈ ਲੋਕ ਦੀਪਕੁ ਸਬਦਿ ਚਾਨਣੁ ਪੰਚ ਦੂਤ ਸੰਘਾਰਹੇ ॥
त्रै लोक दीपकु सबदि चानणु पंच दूत संघारहे ॥
इससे तीनों लोकों के दीपक परमेश्वर का आलोक प्राप्त हो जाएगा, उस द्वारा कामादिक पाँच दूतों को समाप्त कर दोगे।
ਭੈ ਕਾਟਿ ਨਿਰਭਉ ਤਰਹਿ ਦੁਤਰੁ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਕਾਰਜ ਸਾਰਏ ॥
भै काटि निरभउ तरहि दुतरु गुरि मिलिऐ कारज सारए ॥
गुरु से मिलकर सब कार्य संवर जाते हैं, भय को दूर कर निर्भय होकर दुस्तर संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है।
ਰੂਪੁ ਰੰਗੁ ਪਿਆਰੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਹਰਿ ਆਪਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਏ ॥੩॥
रूपु रंगु पिआरु हरि सिउ हरि आपि किरपा धारए ॥३॥
यदि ईश्वर स्वयं कृपा धारण करे तो उसके प्रेम में उस जैसा ही रूप-रंग हो जाएगा॥ ३॥
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਤੂ ਕਿਆ ਲੈ ਆਇਆ ਕਿਆ ਲੈ ਜਾਇਸੀ ਰਾਮ ॥
ए मन मेरिआ तू किआ लै आइआ किआ लै जाइसी राम ॥
ऐ मन ! तू क्या लेकर आया था, अंततः क्या लेकर यहां से जाएगा?”
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਤਾ ਛੁਟਸੀ ਜਾ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਸੀ ਰਾਮ ॥
ए मन मेरिआ ता छुटसी जा भरमु चुकाइसी राम ॥
अगर भ्रम की निवृति होगी तो तेरा छुटकारा निश्चित है।
ਧਨੁ ਸੰਚਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਵਖਰੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਭਾਉ ਪਛਾਣਹੇ ॥
धनु संचि हरि हरि नाम वखरु गुर सबदि भाउ पछाणहे ॥
हरिनाम धन संचित कर और शब्द-गुरु के द्वारा प्रेम की पहचान कर।
ਮੈਲੁ ਪਰਹਰਿ ਸਬਦਿ ਨਿਰਮਲੁ ਮਹਲੁ ਘਰੁ ਸਚੁ ਜਾਣਹੇ ॥
मैलु परहरि सबदि निरमलु महलु घरु सचु जाणहे ॥
पावन शब्द के फलस्वरूप मन की मैल निवृत्ति कर सच्चे घर को जान ले।
ਪਤਿ ਨਾਮੁ ਪਾਵਹਿ ਘਰਿ ਸਿਧਾਵਹਿ ਝੋਲਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪੀ ਰਸੋ ॥
पति नामु पावहि घरि सिधावहि झोलि अम्रित पी रसो ॥
हरिनाम रूपी यश पाकर तू वास्तविक घर आएगा और जी भरकर अमृत पान प्राप्त होगा।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਬਦਿ ਰਸੁ ਪਾਈਐ ਵਡਭਾਗਿ ਜਪੀਐ ਹਰਿ ਜਸੋ ॥੪॥
हरि नामु धिआईऐ सबदि रसु पाईऐ वडभागि जपीऐ हरि जसो ॥४॥
हरिनाम का भजन करो, शब्द द्वारा आनंद पाओ, उत्तम भाग्य से प्रभु का यशोगान होता है।॥ ४॥
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਬਿਨੁ ਪਉੜੀਆ ਮੰਦਰਿ ਕਿਉ ਚੜੈ ਰਾਮ ॥
ए मन मेरिआ बिनु पउड़ीआ मंदरि किउ चड़ै राम ॥
ऐ मन ! सीढ़ियों के बिना इमारत पर कैसे चढ़ा जा सकता है,”
ਏ ਮਨ ਮੇਰਿਆ ਬਿਨੁ ਬੇੜੀ ਪਾਰਿ ਨ ਅੰਬੜੈ ਰਾਮ ॥
ए मन मेरिआ बिनु बेड़ी पारि न अ्मबड़ै राम ॥
नौका के बिना दरिया से पार कैसे हुआ जा सकता है।
ਪਾਰਿ ਸਾਜਨੁ ਅਪਾਰੁ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਸੁਰਤਿ ਲੰਘਾਵਏ ॥
पारि साजनु अपारु प्रीतमु गुर सबद सुरति लंघावए ॥
अपार प्रियतम साजन (संसार-समुद्र के) उस पार है, शब्द-गुरु की सुरति पार करवाने वाली है।
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕਰਹਿ ਰਲੀਆ ਫਿਰਿ ਨ ਪਛੋਤਾਵਏ ॥
मिलि साधसंगति करहि रलीआ फिरि न पछोतावए ॥
साधु-संगति में मिलकर आनंद प्राप्त किया जा सकता है और फिर पछताना नहीं पड़ता।
ਕਰਿ ਦਇਆ ਦਾਨੁ ਦਇਆਲ ਸਾਚਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਸੰਗਤਿ ਪਾਵਓ ॥
करि दइआ दानु दइआल साचा हरि नाम संगति पावओ ॥
हे दीनदयाल ! दया कर, हरिनाम रूपी संगति प्रदान करो।
ਨਾਨਕੁ ਪਇਅੰਪੈ ਸੁਣਹੁ ਪ੍ਰੀਤਮ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਵਓ ॥੫॥੬॥
नानकु पइअ्मपै सुणहु प्रीतम गुर सबदि मनु समझावओ ॥५॥६॥
नानक की विनती है कि हे प्रियतम ! मेरी विनय सुनो, शब्द-गुरु द्वारा मन को समझा दो॥ ५॥ ६॥
ਤੁਖਾਰੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੪
तुखारी छंत महला ४
तुखारी छंत महला ४
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
ਅੰਤਰਿ ਪਿਰੀ ਪਿਆਰੁ ਕਿਉ ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਜੀਵੀਐ ਰਾਮ ॥
अंतरि पिरी पिआरु किउ पिर बिनु जीवीऐ राम ॥
दिल में प्रभु का ही प्रेम बसा हुआ है, फिर उसके बिना कैसे जिंदा रहा जा सकता है।
ਜਬ ਲਗੁ ਦਰਸੁ ਨ ਹੋਇ ਕਿਉ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੀਐ ਰਾਮ ॥
जब लगु दरसु न होइ किउ अम्रितु पीवीऐ राम ॥
जब तक उसके दर्शन नहीं होते तो क्योंकर अमृतपान हो सकता है।
ਕਿਉ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੀਐ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਜੀਵੀਐ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਰਹਨੁ ਨ ਜਾਏ ॥
किउ अम्रितु पीवीऐ हरि बिनु जीवीऐ तिसु बिनु रहनु न जाए ॥
मैं नाम का अमृत कैसे पी सकता हूं और भगवान के बिना कैसे रह सकता हूं? मैं उसके बिना आध्यात्मिक रूप से जीवित नहीं रह सकता।
ਅਨਦਿਨੁ ਪ੍ਰਿਉ ਪ੍ਰਿਉ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਏ ॥
अनदिनु प्रिउ प्रिउ करे दिनु राती पिर बिनु पिआस न जाए ॥
मन रात-दिन बबीहे की तरह प्रिय-प्रिय करता है और प्रियतम बिना प्यास नहीं बुझ सकती।
ਅਪਣੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਹੁ ਹਰਿ ਪਿਆਰੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਦ ਸਾਰਿਆ ॥
अपणी क्रिपा करहु हरि पिआरे हरि हरि नामु सद सारिआ ॥
हे प्यारे प्रभु ! अपनी कृपा करो, क्योंकि सदा तेरे नाम का ही जाप किया है।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਿਆ ਮੈ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਹਉ ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਟਹੁ ਵਾਰਿਆ ॥੧॥
गुर कै सबदि मिलिआ मै प्रीतमु हउ सतिगुर विटहु वारिआ ॥१॥
गुरु के शब्द द्वारा मुझे प्रियतम प्रभु मिल गया है, अतः मैं सतगुरु पर बलिहारी हूँ॥ १॥
ਜਬ ਦੇਖਾਂ ਪਿਰੁ ਪਿਆਰਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਰਸਿ ਰਵਾ ਰਾਮ ॥
जब देखां पिरु पिआरा हरि गुण रसि रवा राम ॥
जब प्रियतम प्रभु के दर्शन करूँ तो प्रेमपूर्वक उसी के गुण-गान में लीन रहूँ।