Hindi Page 1203

ਕਰਹਿ ਸੋਮ ਪਾਕੁ ਹਿਰਹਿ ਪਰ ਦਰਬਾ ਅੰਤਰਿ ਝੂਠ ਗੁਮਾਨ ॥
करहि सोम पाकु हिरहि पर दरबा अंतरि झूठ गुमान ॥
कोई पुरुष सोम-पाक यज्ञ करता है, पराया धन छीनता है और उसके मन में झूठ का घमण्ड बना रहता है।

ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਕੀ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਣਹਿ ਬਿਆਪੇ ਮਨ ਕੈ ਮਾਨ ॥੨॥
सासत्र बेद की बिधि नही जाणहि बिआपे मन कै मान ॥२॥
वह शास्त्र एवं वेदों की विधि को नहीं जानता और मन के अभिमान में चकनाचूर रहता है।॥२॥

ਸੰਧਿਆ ਕਾਲ ਕਰਹਿ ਸਭਿ ਵਰਤਾ ਜਿਉ ਸਫਰੀ ਦੰਫਾਨ ॥
संधिआ काल करहि सभि वरता जिउ सफरी द्मफान ॥
वह संध्याकाल की आरती एवं व्रत उपवास करके ढोंगी ही सिद्ध होता है।

ਪ੍ਰਭੂ ਭੁਲਾਏ ਊਝੜਿ ਪਾਏ ਨਿਹਫਲ ਸਭਿ ਕਰਮਾਨ ॥੩॥
प्रभू भुलाए ऊझड़ि पाए निहफल सभि करमान ॥३॥
(लेकिन जीव बेचारा भी क्या कर सकता है) क्योंकि, जिसे प्रभु ने भुला दिया है, वह गलत रास्ते पर ही चलता है, और किए गए सभी कर्म निष्फल होते हैं।॥३॥

ਸੋ ਗਿਆਨੀ ਸੋ ਬੈਸਨੌ ਪੜ੍ਹ੍ਹਿਆ ਜਿਸੁ ਕਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਭਗਵਾਨ ॥
सो गिआनी सो बैसनौ पड़्हिआ जिसु करी क्रिपा भगवान ॥
वास्तव में वही ज्ञानी, वही वैष्णव एवं पढ़ा लिखा है, जिस पर भगवान कृपा करता है।

ਓੁਨਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਉਧਰਿਆ ਸਗਲ ਬਿਸ੍ਵਾਨ ॥੪॥
ओनि सतिगुरु सेवि परम पदु पाइआ उधरिआ सगल बिस्वान ॥४॥
उन्होंने ही सतगुरु की सेवा करके परमपद (मोक्ष) पा लिया है और उनके पथ-प्रदर्शन पर सब लोगों का उद्धार हुआ है।॥४॥

ਕਿਆ ਹਮ ਕਥਹ ਕਿਛੁ ਕਥਿ ਨਹੀ ਜਾਣਹ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਬੋੁਲਾਨ ॥
किआ हम कथह किछु कथि नही जाणह प्रभ भावै तिवै बोलान ॥
हम क्या कथन करें, कुछ भी कथन नहीं जानते, दरअसल जैसे प्रभु चाहता है, वैसे ही बोलते हैं।

ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੀ ਧੂਰਿ ਇਕ ਮਾਂਗਉ ਜਨ ਨਾਨਕ ਪਇਓ ਸਰਾਨ ॥੫॥੨॥
साधसंगति की धूरि इक मांगउ जन नानक पइओ सरान ॥५॥२॥
नानक विनती करते हैं कि वह तेरी शरण में आ पड़ा है और साधु पुरुषों की चरण-धूल ही चाहता है॥५॥२॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਅਬ ਮੋਰੋ ਨਾਚਨੋ ਰਹੋ ॥
अब मोरो नाचनो रहो ॥
अब मेरा इधर-उधर घूमना खत्म हो गया है,

ਲਾਲੁ ਰਗੀਲਾ ਸਹਜੇ ਪਾਇਓ ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨਿ ਲਹੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
लालु रगीला सहजे पाइओ सतिगुर बचनि लहो ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु के वचन द्वारा मैंने स्वाभाविक ही रंगीला प्रभु पा लिया है॥१॥रहाउ ॥

ਕੁਆਰ ਕੰਨਿਆ ਜੈਸੇ ਸੰਗਿ ਸਹੇਰੀ ਪ੍ਰਿਅ ਬਚਨ ਉਪਹਾਸ ਕਹੋ ॥
कुआर कंनिआ जैसे संगि सहेरी प्रिअ बचन उपहास कहो ॥
जैसे कुंवारी कन्या अपनी सहेलियों के साथ प्रियतम-पति के बारे में खूब हंसी मजाक करती है।

ਜਉ ਸੁਰਿਜਨੁ ਗ੍ਰਿਹ ਭੀਤਰਿ ਆਇਓ ਤਬ ਮੁਖੁ ਕਾਜਿ ਲਜੋ ॥੧॥
जउ सुरिजनु ग्रिह भीतरि आइओ तब मुखु काजि लजो ॥१॥
विवाह होने पर, जब पति घर में आता है तो वह शर्माती हुई मुँह ढंकती है।॥१॥

ਜਿਉ ਕਨਿਕੋ ਕੋਠਾਰੀ ਚੜਿਓ ਕਬਰੋ ਹੋਤ ਫਿਰੋ ॥
जिउ कनिको कोठारी चड़िओ कबरो होत फिरो ॥
जैसे कुठाली में पड़कर सोना बहुत उछल कूद करता है,

ਜਬ ਤੇ ਸੁਧ ਭਏ ਹੈ ਬਾਰਹਿ ਤਬ ਤੇ ਥਾਨ ਥਿਰੋ ॥੨॥
जब ते सुध भए है बारहि तब ते थान थिरो ॥२॥
जब शुद्ध हो जाता है तो स्थिर हो जाता है।(वैसे ही जीव है) ॥२॥

ਜਉ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਤਊ ਲਉ ਬਜਿਓ ਮੂਰਤ ਘਰੀ ਪਲੋ ॥
जउ दिनु रैनि तऊ लउ बजिओ मूरत घरी पलो ॥
जब तक दिन-रात है, जब तक हर घड़ी, पल व मुहूर्त घड़ियाल बजता है वैसे ही जिंदगी चलती है।

ਬਜਾਵਨਹਾਰੋ ਊਠਿ ਸਿਧਾਰਿਓ ਤਬ ਫਿਰਿ ਬਾਜੁ ਨ ਭਇਓ ॥੩॥
बजावनहारो ऊठि सिधारिओ तब फिरि बाजु न भइओ ॥३॥
जब बजाने वाला उठकर चला जाता है तो यह घड़ियाल फिर नहीं बजता (जीवन साँसें छूटने पर जिंदगी खत्म हो जाती है) ॥३॥

ਜੈਸੇ ਕੁੰਭ ਉਦਕ ਪੂਰਿ ਆਨਿਓ ਤਬ ਓੁਹੁ ਭਿੰਨ ਦ੍ਰਿਸਟੋ ॥
जैसे कु्मभ उदक पूरि आनिओ तब ओहु भिंन द्रिसटो ॥
जैसे घड़े को पानी से भरकर लाया जाता है तो यह भिन्न ही दिखाई देता है।

ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕੁੰਭੁ ਜਲੈ ਮਹਿ ਡਾਰਿਓ ਅੰਭੈ ਅੰਭ ਮਿਲੋ ॥੪॥੩॥
कहु नानक कु्मभु जलै महि डारिओ अ्मभै अ्मभ मिलो ॥४॥३॥
हे नानक ! घड़े से भरे हुए पानी को पानी में ही मिला दिया जाता है तो पानी आत्मा परमात्मा में मिलकर एक रूप ही हो जाता है ॥ ४ ॥ ३ ॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਅਬ ਪੂਛੇ ਕਿਆ ਕਹਾ ॥
अब पूछे किआ कहा ॥
अब पूछने पर क्या बताया जाए ?

ਲੈਨੋ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਨੀਕੋ ਬਾਵਰ ਬਿਖੁ ਸਿਉ ਗਹਿ ਰਹਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
लैनो नामु अम्रित रसु नीको बावर बिखु सिउ गहि रहा ॥१॥ रहाउ ॥
लेना तो अमृतमय मीठा रस ईश्वर का नाम है, लेकिन बावला मनुष्य विषय-विकारों में ही लीन रहा।॥१॥रहाउ॥।

ਦੁਲਭ ਜਨਮੁ ਚਿਰੰਕਾਲ ਪਾਇਓ ਜਾਤਉ ਕਉਡੀ ਬਦਲਹਾ ॥
दुलभ जनमु चिरंकाल पाइओ जातउ कउडी बदलहा ॥
चिरंकाल पश्चात् दुर्लभ मानव जन्म प्राप्त हुआ किन्तु कौड़ियों के बदले जीवन बर्बाद कर दिया।

ਕਾਥੂਰੀ ਕੋ ਗਾਹਕੁ ਆਇਓ ਲਾਦਿਓ ਕਾਲਰ ਬਿਰਖ ਜਿਵਹਾ ॥੧॥
काथूरी को गाहकु आइओ लादिओ कालर बिरख जिवहा ॥१॥
प्रभु भजन रूपी कस्तूरी का ग्राहक बनकर आया था, अफसोस ! बैल (मूख) बनकर अपने ऊपर मिट्टी लाद ली है॥१॥

ਆਇਓ ਲਾਭੁ ਲਾਭਨ ਕੈ ਤਾਈ ਮੋਹਨਿ ਠਾਗਉਰੀ ਸਿਉ ਉਲਝਿ ਪਹਾ ॥
आइओ लाभु लाभन कै ताई मोहनि ठागउरी सिउ उलझि पहा ॥
यह मनुष्य जीवन का लाभ पाने के लिए आया था परन्तु मोहिनी ठग-धूटी में ही उलझा रहा।

ਕਾਚ ਬਾਦਰੈ ਲਾਲੁ ਖੋਈ ਹੈ ਫਿਰਿ ਇਹੁ ਅਉਸਰੁ ਕਦਿ ਲਹਾ ॥੨॥
काच बादरै लालु खोई है फिरि इहु अउसरु कदि लहा ॥२॥
कांच के बदले में अमूल्य हीरे लाल को खो दिया है, फिर यह सुनहरी अवसर कब मिलेगा ॥२॥

ਸਗਲ ਪਰਾਧ ਏਕੁ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਠਾਕੁਰੁ ਛੋਡਹ ਦਾਸਿ ਭਜਹਾ ॥
सगल पराध एकु गुणु नाही ठाकुरु छोडह दासि भजहा ॥
मनुष्य में अपराध ही अपराध भरे हुए हैं, कोई अच्छाई नहीं, यह मालिक को छोड़कर उसकी दासी माया की स्तुति करता है।

ਆਈ ਮਸਟਿ ਜੜਵਤ ਕੀ ਨਿਆਈ ਜਿਉ ਤਸਕਰੁ ਦਰਿ ਸਾਂਨੑਿਹਾ ॥੩॥
आई मसटि जड़वत की निआई जिउ तसकरु दरि सांन्हिहा ॥३॥
जिस प्रकार चोर दरवाजे में फंसकर मूर्छित हो जाता है, वैसे ही मनुष्य माया में लिप्त होकर जड़ बना हुआ खामोश है॥३॥

ਆਨ ਉਪਾਉ ਨ ਕੋਊ ਸੂਝੈ ਹਰਿ ਦਾਸਾ ਸਰਣੀ ਪਰਿ ਰਹਾ ॥
आन उपाउ न कोऊ सूझै हरि दासा सरणी परि रहा ॥
मुझे अन्य कोई उपाय नहीं सूझता, अतः प्रभु-भक्तों की शरण में पड़ा रहता हूँ।

ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਬ ਹੀ ਮਨ ਛੁਟੀਐ ਜਉ ਸਗਲੇ ਅਉਗਨ ਮੇਟਿ ਧਰਹਾ ॥੪॥੪॥
कहु नानक तब ही मन छुटीऐ जउ सगले अउगन मेटि धरहा ॥४॥४॥
हे नानक ! जब सभी अवगुणों को मिटा दिया जाता है, तब ही मन बन्धनों से मुक्त होता है॥४॥४॥

ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥

ਮਾਈ ਧੀਰਿ ਰਹੀ ਪ੍ਰਿਅ ਬਹੁਤੁ ਬਿਰਾਗਿਓ ॥
माई धीरि रही प्रिअ बहुतु बिरागिओ ॥
हे माई ! मेरा हौसला खत्म हो गया है, प्रियतम प्रभु के प्रेम में वैराग्यवान हो गई हूँ।

ਅਨਿਕ ਭਾਂਤਿ ਆਨੂਪ ਰੰਗ ਰੇ ਤਿਨੑ ਸਿਉ ਰੁਚੈ ਨ ਲਾਗਿਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अनिक भांति आनूप रंग रे तिन्ह सिउ रुचै न लागिओ ॥१॥ रहाउ ॥
अनेक प्रकार के अनुपम रंगों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं ॥१॥रहाउ॥।

ਨਿਸਿ ਬਾਸੁਰ ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰਿਅ ਮੁਖਿ ਟੇਰਉ ਨੀਂਦ ਪਲਕ ਨਹੀ ਜਾਗਿਓ ॥
निसि बासुर प्रिअ प्रिअ मुखि टेरउ नींद पलक नही जागिओ ॥
मैं दिन-रात प्रियतम का नाम जपती रहती हूँ, उसके बिना आँखों में नींद नहीं आती, जागती रहती हूँ।

ਹਾਰ ਕਜਰ ਬਸਤ੍ਰ ਅਨਿਕ ਸੀਗਾਰ ਰੇ ਬਿਨੁ ਪਿਰ ਸਭੈ ਬਿਖੁ ਲਾਗਿਓ ॥੧॥
हार कजर बसत्र अनिक सीगार रे बिनु पिर सभै बिखु लागिओ ॥१॥
सुन्दर हार, काजल, वस्त्र एवं अनेक प्रकार के श्रृंगार प्रभु के बिना सभी जहर लगते हैं।॥१॥

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