ਜਿਉ ਬੈਸੰਤਰਿ ਧਾਤੁ ਸੁਧੁ ਹੋਇ ਤਿਉ ਹਰਿ ਕਾ ਭਉ ਦੁਰਮਤਿ ਮੈਲੁ ਗਵਾਇ ॥
जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥
जैसे अग्नि में धातु डालने से शुद्ध हो जाती है, वैसे ही प्रभु भय दुर्मति रूपी मैल को मन से निकाल देता है।
ਨਾਨਕ ਤੇ ਜਨ ਸੋਹਣੇ ਜੋ ਰਤੇ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਲਾਇ ॥੧॥
नानक ते जन सोहणे जो रते हरि रंगु लाइ ॥१॥
हे नानक ! वही भक्तजन सुन्दर हैं, जो भगवान से रंग लगाकर उसमें लीन हो गए हैं॥ १॥
ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥
ਰਾਮਕਲੀ ਰਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਤਾ ਬਨਿਆ ਸੀਗਾਰੁ ॥
रामकली रामु मनि वसिआ ता बनिआ सीगारु ॥
जब रामकली राग द्वारा गुणगान किया तो राम मेरे मन में बस गया और मेरा सुन्दर श्रृंगार बन गया।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਕਮਲੁ ਬਿਗਸਿਆ ਤਾ ਸਉਪਿਆ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰੁ ॥
गुर कै सबदि कमलु बिगसिआ ता सउपिआ भगति भंडारु ॥
जब गुरु के शब्द द्वारा हृदय-कमल प्रफुल्लित हो गया तो भगवान ने मुझे भक्ति का भण्डार सौंप दिया।
ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਤਾ ਜਾਗਿਆ ਚੂਕਾ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧਾਰੁ ॥
भरमु गइआ ता जागिआ चूका अगिआन अंधारु ॥
जब सारा भ्रम दूर हो गया तो यह मन जाग्रत हो गया और अज्ञान का अंधकार समाप्त हो गया।
ਤਿਸ ਨੋ ਰੂਪੁ ਅਤਿ ਅਗਲਾ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਨਾਲਿ ਪਿਆਰੁ ॥
तिस नो रूपु अति अगला जिसु हरि नालि पिआरु ॥
जिस जीव-स्त्री का परमेश्वर से प्रेम होता है, उसे अति सुन्दर रूप चढ़ जाता है और
ਸਦਾ ਰਵੈ ਪਿਰੁ ਆਪਣਾ ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਨਾਰਿ ॥
सदा रवै पिरु आपणा सोभावंती नारि ॥
वह शोभावान नारी सदा ही अपने प्रेियतम के संग रमण करती है।
ਮਨਮੁਖਿ ਸੀਗਾਰੁ ਨ ਜਾਣਨੀ ਜਾਸਨਿ ਜਨਮੁ ਸਭੁ ਹਾਰਿ ॥
मनमुखि सीगारु न जाणनी जासनि जनमु सभु हारि ॥
स्वेच्छाचारी जीव-स्त्री श्रृंगार करना नहीं जानती और वह अपना समूचा जीवन हार कर जगत् से चली जाती है।
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਸੀਗਾਰੁ ਕਰਹਿ ਨਿਤ ਜੰਮਹਿ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥
बिनु हरि भगती सीगारु करहि नित जमहि होइ खुआरु ॥
जो जीव रूपी नारी भगवान की भक्ति के बिना अन्य श्रृंगार करती है, वह नित्य जन्म-मरण में ख्वार होती है।
ਸੈਸਾਰੈ ਵਿਚਿ ਸੋਭ ਨ ਪਾਇਨੀ ਅਗੈ ਜਿ ਕਰੇ ਸੁ ਜਾਣੈ ਕਰਤਾਰੁ ॥
सैसारै विचि सोभ न पाइनी अगै जि करे सु जाणै करतारु ॥
वह संसार में शोभा प्राप्त नहीं करती और आगे परलोक में ईश्वर ही जानता है, क्या व्यवहार किया जाए।
ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਏਕੁ ਹੈ ਦੁਹੁ ਵਿਚਿ ਹੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
नानक सचा एकु है दुहु विचि है संसारु ॥
हे नानक ! एक ईश्वर ही सत्य है और शेष संसार जन्म-मरण दोनों में पड़ा हुआ है।
ਚੰਗੈ ਮੰਦੈ ਆਪਿ ਲਾਇਅਨੁ ਸੋ ਕਰਨਿ ਜਿ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾਰੁ ॥੨॥
चंगै मंदै आपि लाइअनु सो करनि जि आपि कराए करतारु ॥२॥
परमात्मा ने स्वयं ही जीवों को अच्छे एवं बुरे कार्यों में लगाया हुआ है, इसलिए जीव वही कुछ करते हैं, जो वह उनसे करवाता है॥ २॥
ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਵਈ ਦੂਜੀ ਨਾਹੀ ਜਾਇ ॥
बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥
सतगुरु की सेवा किए बिना मन को शान्ति नहीं मिलती और न ही द्वैतभाव दूर होता है।
ਜੇ ਬਹੁਤੇਰਾ ਲੋਚੀਐ ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
यदि हम अधिकतर पाने की कामना करें तो भी भाग्य के बिना प्राप्त नहीं होता।
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਵਿਕਾਰੁ ਹੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਇ ॥
अंतरि लोभु विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥
जिसके अन्तर्मन में लोभ रूपी विकार है, वह द्वैतभाव में ही ख्यार होता है।
ਤਿਨ ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਨ ਚੁਕਈ ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇ ॥
तिन जमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥
उसका जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता और वह अभिमान में ही दुखी होता रहता है।
ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ਸੋ ਖਾਲੀ ਕੋਈ ਨਾਹਿ ॥
जिनी सतिगुर सिउ चितु लाइआ सो खाली कोई नाहि ॥
जिन्होंने अपना चित्त सतगुरु से लगाया है, उनमें से कोई भी देन से खाली नहीं रहता।
ਤਿਨ ਜਮ ਕੀ ਤਲਬ ਨ ਹੋਵਈ ਨਾ ਓਇ ਦੁਖ ਸਹਾਹਿ ॥
तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥
उन्हें न ही यम का निमंत्रण आता है और न ही दुख सहन करना पड़ता है।
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਬਰੇ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਹਿ ॥੩॥
नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥३॥
हे नानक ! ऐसे गुरुमुख संसार-सागर से पार हो गए हैं और ये शब्द द्वारा सत्य में ही विलीन हो गए हैं।॥ ३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਆਪਿ ਅਲਿਪਤੁ ਸਦਾ ਰਹੈ ਹੋਰਿ ਧੰਧੈ ਸਭਿ ਧਾਵਹਿ ॥
आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥
अन्य सभी जीव दुनिया के कार्यों में इधर-उधर भागते रहते हैं परन्तु ईश्वर इन कायों से सदा निर्लिप्त रहता है।
ਆਪਿ ਨਿਹਚਲੁ ਅਚਲੁ ਹੈ ਹੋਰਿ ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ॥
आपि निहचलु अचलु है होरि आवहि जावहि ॥
वह निश्चल एवं अटल है किन्तु अन्य जीव आवागमन में पड़े रहते हैं।
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ गुरमुखि सुखु पावहि ॥
गुरुमुख बनकर सदैव भगवान का ध्यान करना चाहिए, तभी परमसुख प्राप्त होता है।
ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਪਾਈਐ ਸਚਿ ਸਿਫਤਿ ਸਮਾਵਹਿ ॥
निज घरि वासा पाईऐ सचि सिफति समावहि ॥
ऐसा जीव अपने सच्चे घर में निवास प्राप्त कर लेता है और ईश्वर की स्तुति में ही लीन रहता है।
ਸਚਾ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੁ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ॥੮॥
सचा गहिर ग्मभीरु है गुर सबदि बुझाई ॥८॥
वह सच्चा परमेश्वर गहन-गंभीर है और गुरु के शब्द द्वारा ही इस तथ्य की सूझ होती है॥ ८ ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੩ ॥
सलोक मः ३ ॥
श्लोक महला ३॥
ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਸਭੋ ਵਰਤੈ ਸਚੁ ॥
सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥
हे जीव ! सत्य नाम का ध्यान किया कर, चूंकेि समूचे विश्व में सत्य का ही प्रसार है।
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੈ ਜੋ ਬੁਝੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ਸਚੁ ॥
नानक हुकमै जो बुझै सो फलु पाए सचु ॥
हे नानक ! जो परमात्मा के हुक्म को समझ लेता है, उसे सत्य रूपी फल प्राप्त हो जाता है।
ਕਥਨੀ ਬਦਨੀ ਕਰਤਾ ਫਿਰੈ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝੈ ਸਚੁ ॥
कथनी बदनी करता फिरै हुकमु न बूझै सचु ॥
जो व्यक्ति मुँह से बातें ही करता रहता है और हुक्म को नहीं समझता, उसे सत्य का बोध नहीं होता।
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨੇ ਸੋ ਭਗਤੁ ਹੋਇ ਵਿਣੁ ਮੰਨੇ ਕਚੁ ਨਿਕਚੁ ॥੧॥
नानक हरि का भाणा मंने सो भगतु होइ विणु मंने कचु निकचु ॥१॥
हे नानक ! जो भगवान की इच्छा को मानता है, वही भक्त होता है और ईश्वरेच्छा को न मानने वाला जीव झूठा एवं कच्चा ही सिद्ध होता है॥ १॥
ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥
ਮਨਮੁਖ ਬੋਲਿ ਨ ਜਾਣਨੀ ਓਨਾ ਅੰਦਰਿ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
मनमुख बोलि न जाणनी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥
स्वेच्छाचारी जीव मधुर वाणी बोलना ही नहीं जानते, क्योंकि उनके मन में काम, क्रोध एवं अहंकार भरा होता है।
ਓਇ ਥਾਉ ਕੁਥਾਉ ਨ ਜਾਣਨੀ ਉਨ ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਵਿਕਾਰੁ ॥
ओइ थाउ कुथाउ न जाणनी उन अंतरि लोभु विकारु ॥
उनके अन्तर्मन में लोभ रूपी विकार होता है, जिससे वे अच्छे बुरे को भी नहीं जानते।
ਓਇ ਆਪਣੈ ਸੁਆਇ ਆਇ ਬਹਿ ਗਲਾ ਕਰਹਿ ਓਨਾ ਮਾਰੇ ਜਮੁ ਜੰਦਾਰੁ ॥
ओइ आपणै सुआइ आइ बहि गला करहि ओना मारे जमु जंदारु ॥
वे अपने स्वार्थ के लिए आकर बैठते और बातें करते हैं और परिणामस्वरूप निर्दयी यम से दण्ड भोगते हैं।
ਅਗੈ ਦਰਗਹ ਲੇਖੈ ਮੰਗਿਐ ਮਾਰਿ ਖੁਆਰੁ ਕੀਚਹਿ ਕੂੜਿਆਰ ॥
अगै दरगह लेखै मंगिऐ मारि खुआरु कीचहि कूड़िआर ॥
आगे परलोक में भी उनसे कर्मो का लेखा-जोखा मांगा जाता है तथा अशुभ कर्मों के कारण उन झूठों को पीट-पीट कर ख्वार किया जाता है।
ਏਹ ਕੂੜੈ ਕੀ ਮਲੁ ਕਿਉ ਉਤਰੈ ਕੋਈ ਕਢਹੁ ਇਹੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
एह कूड़ै की मलु किउ उतरै कोई कढहु इहु वीचारु ॥
कोई सोच-विचार कर यह निष्कर्ष निकालो कि उन स्वेच्छाचारी जीवों के मन में से झूठ की मैल कैसे उतर सकती है ?
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤਾ ਨਾਮੁ ਦਿੜਾਏ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਟਣਹਾਰੁ ॥
सतिगुरु मिलै ता नामु दिड़ाए सभि किलविख कटणहारु ॥
जब सतगुरु से भेंट हो जाती है तो वह उनके मन में नाम द्रढ़ करवा देता है, परमात्मा का नाम सब पापों को नाश करने वाला है।
ਨਾਮੁ ਜਪੇ ਨਾਮੋ ਆਰਾਧੇ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਕਰਹੁ ਸਭਿ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥
नामु जपे नामो आराधे तिसु जन कउ करहु सभि नमसकारु ॥
उस भक्त को सभी प्रणाम करो, जो नित्य नाम जपता और नाम की आराधना करता रहता है।