Hindi Page 321

ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਕੀਤਾ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ॥੨॥
नानक राम नामु धनु कीता पूरे गुर परसादि ॥२॥
हे नानक ! पूर्ण गुरु की कृपा से उसने राम के नाम को अपना धन बनाया है॥ २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥

ਧੋਹੁ ਨ ਚਲੀ ਖਸਮ ਨਾਲਿ ਲਬਿ ਮੋਹਿ ਵਿਗੁਤੇ ॥
धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥
जगत् के मालिक प्रभु के साथ किसी प्रकार का धोखा सफल नहीं हो सकता। लोभ एवं मोह द्वारा प्राणी नष्ट हो जाता है।

ਕਰਤਬ ਕਰਨਿ ਭਲੇਰਿਆ ਮਦਿ ਮਾਇਆ ਸੁਤੇ ॥
करतब करनि भलेरिआ मदि माइआ सुते ॥
माया के नशे में सोए हुए मनुष्य नीच कर्म करते हैं

ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨਿ ਭਵਾਈਅਨਿ ਜਮ ਮਾਰਗਿ ਮੁਤੇ ॥
फिरि फिरि जूनि भवाईअनि जम मारगि मुते ॥
और वह बार-बार योनियों में धकेले जाते हैं तथा यमराज के मार्ग में छोड़ दिए जाते हैं।

ਕੀਤਾ ਪਾਇਨਿ ਆਪਣਾ ਦੁਖ ਸੇਤੀ ਜੁਤੇ ॥
कीता पाइनि आपणा दुख सेती जुते ॥
दुःखों से बंधे हुए वह अपने कर्मों का फल पाते हैं।

ਨਾਨਕ ਨਾਇ ਵਿਸਾਰਿਐ ਸਭ ਮੰਦੀ ਰੁਤੇ ॥੧੨॥
नानक नाइ विसारिऐ सभ मंदी रुते ॥१२॥
हे नानक ! यदि भगवान के नाम को विस्मृत कर दिया जाए तो सभी ऋतु व्यर्थ ही हैं।॥ १२॥

ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਉਠੰਦਿਆ ਬਹੰਦਿਆ ਸਵੰਦਿਆ ਸੁਖੁ ਸੋਇ ॥
उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥
उठते-बैठते, सोते समय हमेशा सुख बना रहता है

ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਲਾਹਿਐ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ॥੧॥
नानक नामि सलाहिऐ मनु तनु सीतलु होइ ॥१॥
हे नानक ! भगवान के नाम की सराहना करने से मन एवं तन शीतल हो जाते हैं ॥ १॥

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

ਲਾਲਚਿ ਅਟਿਆ ਨਿਤ ਫਿਰੈ ਸੁਆਰਥੁ ਕਰੇ ਨ ਕੋਇ ॥
लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥
प्राणी हमेशा लोभ में फँसा हुआ भटकता रहता है और कोई भी शुभ कर्म नहीं करता।

ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਨਾਨਕਾ ਤਿਸੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥੨॥
जिसु गुरु भेटै नानका तिसु मनि वसिआ सोइ ॥२॥
हे नानक ! जिस इन्सान को गुरु मिल जाता है, उसके हृदय में ईश्वर निवास कर जाता है।॥ २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਸਭੇ ਵਸਤੂ ਕਉੜੀਆ ਸਚੇ ਨਾਉ ਮਿਠਾ ॥
सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥
संसार की समस्त वस्तुएँ कड़वी हो जाती हैं, लेकिन एक ईश्वर का नाम ही सदा मीठा रहता है।

ਸਾਦੁ ਆਇਆ ਤਿਨ ਹਰਿ ਜਨਾਂ ਚਖਿ ਸਾਧੀ ਡਿਠਾ ॥
सादु आइआ तिन हरि जनां चखि साधी डिठा ॥
“(परन्तु) यह स्वाद भगवान के उन भक्तों को आता है, जिन्होंने यह नाम-रस चखकर देखा है।

ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਮਨਿ ਤਿਸੈ ਵੁਠਾ ॥
पारब्रहमि जिसु लिखिआ मनि तिसै वुठा ॥
उसी मनुष्य के मन में यह नाम (रस) बसता है, जिसके लिए पारब्रह्म ने ऐसा लिख छोड़ा है।

ਇਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਭਾਉ ਦੁਯਾ ਕੁਠਾ ॥
इकु निरंजनु रवि रहिआ भाउ दुया कुठा ॥
एक निरंजन प्रभु ही हर जगह पर दिखता है। (मनुष्य का) द्वैतभाव नष्ट हो जाता है।

ਹਰਿ ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਜੋੜਿ ਕਰ ਪ੍ਰਭੁ ਦੇਵੈ ਤੁਠਾ ॥੧੩॥
हरि नानकु मंगै जोड़ि कर प्रभु देवै तुठा ॥१३॥
नानक भी दोनों हाथ जोड़कर ईश्वर का नाम मॉगता है, लेकिन ईश्वर जिस पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करता है, उसे ही देता है॥ १३॥

ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਜਾਚੜੀ ਸਾ ਸਾਰੁ ਜੋ ਜਾਚੰਦੀ ਹੇਕੜੋ ॥
जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥
वही याचना सर्वोत्तम है जो एक ईश्वर (के नाम) को माँगना है।

ਗਾਲ੍ਹ੍ਹੀ ਬਿਆ ਵਿਕਾਰ ਨਾਨਕ ਧਣੀ ਵਿਹੂਣੀਆ ॥੧॥
गाल्ही बिआ विकार नानक धणी विहूणीआ ॥१॥
हे नानक ! विश्व के मालिक परमेश्वर के नाम के सिवाय सब बातें व्यर्थ हैं॥ १॥

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

ਨੀਹਿ ਜਿ ਵਿਧਾ ਮੰਨੁ ਪਛਾਣੂ ਵਿਰਲੋ ਥਿਓ ॥
नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥
जिसका मन ईश्वर के प्रेम में बिंधा हो, ऐसा (प्रभु की) पहचान करने वाला कोई विरला पुरुष ही होता है।

ਜੋੜਣਹਾਰਾ ਸੰਤੁ ਨਾਨਕ ਪਾਧਰੁ ਪਧਰੋ ॥੨॥
जोड़णहारा संतु नानक पाधरु पधरो ॥२॥
हे नानक ! संत भगवान से मिलाने में समर्थ होता है और प्रभु को मिलने हेतु सन्मार्ग दिखा देता है॥ २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥

ਸੋਈ ਸੇਵਿਹੁ ਜੀਅੜੇ ਦਾਤਾ ਬਖਸਿੰਦੁ ॥
सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥
हे मेरे मन ! उस ईश्वर को याद कर, जो सबका दाता एवं क्षमाशील है।

ਕਿਲਵਿਖ ਸਭਿ ਬਿਨਾਸੁ ਹੋਨਿ ਸਿਮਰਤ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
किलविख सभि बिनासु होनि सिमरत गोविंदु ॥
गोबिन्द का भजन करने से पापों का विनाश हो जाता है।

ਹਰਿ ਮਾਰਗੁ ਸਾਧੂ ਦਸਿਆ ਜਪੀਐ ਗੁਰਮੰਤੁ ॥
हरि मारगु साधू दसिआ जपीऐ गुरमंतु ॥
गुरु ने ईश्वर के मिलन का मार्ग बतलाया है।गुरु का मन्त्र सदैव याद करना चाहिए।

ਮਾਇਆ ਸੁਆਦ ਸਭਿ ਫਿਕਿਆ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਵੰਦੁ ॥
माइआ सुआद सभि फिकिआ हरि मनि भावंदु ॥
माया के तमाम रस फीके लगते हैं और केवल ईश्वर ही मन में प्रिय लगता है।

ਧਿਆਇ ਨਾਨਕ ਪਰਮੇਸਰੈ ਜਿਨਿ ਦਿਤੀ ਜਿੰਦੁ ॥੧੪॥
धिआइ नानक परमेसरै जिनि दिती जिंदु ॥१४॥
हे नानक ! जिस परमेश्वर ने यह प्राण दिए हैं, उसका हमेशा ही ध्यान करना चाहिए ॥ १४ ॥

ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਵਤ ਲਗੀ ਸਚੇ ਨਾਮ ਕੀ ਜੋ ਬੀਜੇ ਸੋ ਖਾਇ ॥
वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥
त्यनाम रूपी बीज बोने हेतु शुभ समय आया है, जो व्यक्ति नाम रूपी बीज बोता है, वही इसका फल सेवन करता है।

ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਨਾਨਕਾ ਜਿਸ ਨੋ ਲਿਖਿਆ ਆਇ ॥੧॥
तिसहि परापति नानका जिस नो लिखिआ आइ ॥१॥
हे नानक ! यह वस्तु उस पुरुष को ही प्राप्त होती है, जिसकी किस्मत में लिखा होता है। १ ।।

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

ਮੰਗਣਾ ਤ ਸਚੁ ਇਕੁ ਜਿਸੁ ਤੁਸਿ ਦੇਵੈ ਆਪਿ ॥
मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥
यदि इन्सान ने मॉगना है तो उसे एक सत्य-नाम ही मॉगना चाहिए। यह सत्य-नाम उसे ही मिलता है, जिसे ईश्वर स्वयं अपनी खुशी से प्रदान करता है।

ਜਿਤੁ ਖਾਧੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੀਐ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਦਾਤਿ ॥੨॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ नानक साहिब दाति ॥२॥
हे नानक ! यह परमेश्वर की ही देन है, जिसे खाने से मन तृप्त हो जाता है।॥ २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਲਾਹਾ ਜਗ ਮਹਿ ਸੇ ਖਟਹਿ ਜਿਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ॥
लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥
दुनिया में वहीं लोग लाभ प्राप्त करते हैं, जिनके पास हरि नाम-रूपी धन एवं पूंजी है।

ਦੁਤੀਆ ਭਾਉ ਨ ਜਾਣਨੀ ਸਚੇ ਦੀ ਆਸ ॥
दुतीआ भाउ न जाणनी सचे दी आस ॥
वे किसी दूसरे के साथ मोह करना नहीं जानते, उन्हें एक ईश्वर पर ही भरोसा होता है।

ਨਿਹਚਲੁ ਏਕੁ ਸਰੇਵਿਆ ਹੋਰੁ ਸਭ ਵਿਣਾਸੁ ॥
निहचलु एकु सरेविआ होरु सभ विणासु ॥
वे सारी दुनिया को नश्वर समझते हुए एक अटल परमेश्वर की ही भक्ति करते हैं।

ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਜਿਸੁ ਵਿਸਰੈ ਤਿਸੁ ਬਿਰਥਾ ਸਾਸੁ ॥
पारब्रहमु जिसु विसरै तिसु बिरथा सासु ॥
जिस व्यक्ति को ईश्वर भूल जाता हैं, उसका प्रत्येक श्वास निष्फल हो जाता है

ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਜਨ ਰਖਿਆ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਜਾਸੁ ॥੧੫॥
कंठि लाइ जन रखिआ नानक बलि जासु ॥१५॥
हे नानक ! जिस ईश्वर ने अपने सेवकों को स्वयं अपने गले से लगाकर बचाया है, मैं उस पर हमेशा ही न्यौछावर हूँ॥ १५॥

ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਫੁਰਮਾਇਆ ਮੀਹੁ ਵੁਠਾ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥
जब भगवान का हुक्म हुआ तो सहज स्वभाव ही बरसात होने लगी।

ਅੰਨੁ ਧੰਨੁ ਬਹੁਤੁ ਉਪਜਿਆ ਪ੍ਰਿਥਮੀ ਰਜੀ ਤਿਪਤਿ ਅਘਾਇ ॥
अंनु धंनु बहुतु उपजिआ प्रिथमी रजी तिपति अघाइ ॥
इससे अधिक मात्रा में अन्न एवं घन उत्पन्न हुए और पृथ्वी भलीभांति तृप्त एवं संतुष्ट हो गई।

ਸਦਾ ਸਦਾ ਗੁਣ ਉਚਰੈ ਦੁਖੁ ਦਾਲਦੁ ਗਇਆ ਬਿਲਾਇ ॥
सदा सदा गुण उचरै दुखु दालदु गइआ बिलाइ ॥
साधु हमेशा ही प्रभु की महिमा उच्चरित करता है और उसके दुःख-दरिद्रता दूर हो गए हैं।

ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇਆ ਮਿਲਿਆ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ मिलिआ तिसै रजाइ ॥
इन्सान वही कुछ हासिल करता है, जो आदि से उसकी किस्मत में लिखा होता है और यह परमेश्वर की इच्छानुसार मिलता है।

ਪਰਮੇਸਰਿ ਜੀਵਾਲਿਆ ਨਾਨਕ ਤਿਸੈ ਧਿਆਇ ॥੧॥
परमेसरि जीवालिआ नानक तिसै धिआइ ॥१॥
हे नानक ! जिसने यह अमूल्य जीवन प्रदान किया है, उस परमेश्वर को स्मरण कर ॥ १॥

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

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