ਕਵਨ ਗੁਨੁ ਜੋ ਤੁਝੁ ਲੈ ਗਾਵਉ ॥
कवन गुनु जो तुझु लै गावउ ॥
हे ईश्वर !वह कौन-से गुण है जिनकी मैं स्तुति करू,”
ਕਵਨ ਬੋਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਰੀਝਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कवन बोल पारब्रहम रीझावउ ॥१॥ रहाउ ॥
हे पारब्रह्म-प्रभु ! में क्या बोलू जिससे मैं तुझे प्रसन्न कर दूँ॥ १॥ रहाउ॥
ਕਵਨ ਸੁ ਪੂਜਾ ਤੇਰੀ ਕਰਉ ॥
कवन सु पूजा तेरी करउ ॥
हे नाथ ! वह कौन-सी पूजा-अर्चना है, जो मैं तेरी करूँ।
ਕਵਨ ਸੁ ਬਿਧਿ ਜਿਤੁ ਭਵਜਲ ਤਰਉ ॥੨॥
कवन सु बिधि जितु भवजल तरउ ॥२॥
हे दीनदयालु! वह कौन-सी विधि है, जिससे मैं भयानक सागर से पार हो जाऊँ ?॥ २॥
ਕਵਨ ਤਪੁ ਜਿਤੁ ਤਪੀਆ ਹੋਇ ॥
कवन तपु जितु तपीआ होइ ॥
हे प्रभु ! वह कौन-सी तपस्या है, जिससे मैं तपस्वी हो जाऊँ ?
ਕਵਨੁ ਸੁ ਨਾਮੁ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਖੋਇ ॥੩॥
कवनु सु नामु हउमै मलु खोइ ॥३॥
हे परमात्मा ! यह कौन-सा नाम है, जिस द्वारा अहंकार की मैल दूर हो जाती है॥ ३॥
ਗੁਣ ਪੂਜਾ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਨਾਨਕ ਸਗਲ ਘਾਲ ॥
गुण पूजा गिआन धिआन नानक सगल घाल ॥
हे नानक ! उसकी तमाम साधना, गुणानुवाद, पूजा, ज्ञान एवं ध्यान सफल हो जाते है
ਜਿਸੁ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਦਇਆਲ ॥੪॥
जिसु करि किरपा सतिगुरु मिलै दइआल ॥४॥
जिसे दयालु सतिगुरु अपनी कृपा करके मिल जाते हैं, ॥ ४॥
ਤਿਸ ਹੀ ਗੁਨੁ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ॥
तिस ही गुनु तिन ही प्रभु जाता ॥
केवल वही गुण-फल प्राप्त करता है और केवल वही प्रभु को समझता है,
ਜਿਸ ਕੀ ਮਾਨਿ ਲੇਇ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੩੬॥੧੦੫॥
जिस की मानि लेइ सुखदाता ॥१॥ रहाउ दूजा ॥३६॥१०५॥
जिसकी भक्ति सुखदाता स्वीकार कर लेता है॥ १॥ रहाउ दूजा॥ ३६॥ १०५॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਆਪਨ ਤਨੁ ਨਹੀ ਜਾ ਕੋ ਗਰਬਾ ॥
आपन तनु नही जा को गरबा ॥
हे प्राणी ! यह तन जिसका तुझे अभिमान हैं, यह तेरा अपना नहीं है।
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਨਹੀ ਆਪਨ ਦਰਬਾ ॥੧॥
राज मिलख नही आपन दरबा ॥१॥
शासन, सम्पति, धन (सदा के लिए) तेरे नहीं है॥ १॥
ਆਪਨ ਨਹੀ ਕਾ ਕਉ ਲਪਟਾਇਓ ॥
आपन नही का कउ लपटाइओ ॥
हे प्राणी ! जब यह तेरे नहीं, तो फिर उनसे क्यों मोह करते हो ?
ਆਪਨ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आपन नामु सतिगुर ते पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
केवल नाम ही तेरा है और वह तुझे सतिगुरु से प्राप्त होगा ॥ १॥ रहाउ॥
ਸੁਤ ਬਨਿਤਾ ਆਪਨ ਨਹੀ ਭਾਈ ॥
सुत बनिता आपन नही भाई ॥
हे प्राणी ! पुत्र, पत्नी एवं भाई तेरे नहीं।
ਇਸਟ ਮੀਤ ਆਪ ਬਾਪੁ ਨ ਮਾਈ ॥੨॥
इसट मीत आप बापु न माई ॥२॥
इष्ट मित्र, पिता एवं माता तेरे अपने नहीं हैं।॥ २॥
ਸੁਇਨਾ ਰੂਪਾ ਫੁਨਿ ਨਹੀ ਦਾਮ ॥
सुइना रूपा फुनि नही दाम ॥
सोना, चांदी एवं धन-दौलत भी तेरे नहीं हैं।
ਹੈਵਰ ਗੈਵਰ ਆਪਨ ਨਹੀ ਕਾਮ ॥੩॥
हैवर गैवर आपन नही काम ॥३॥
कुशल घोड़े एवं सुन्दर हाथी तेरे किसी काम नहीं ॥ ३॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਗੁਰਿ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
कहु नानक जो गुरि बखसि मिलाइआ ॥
हे नानक ! जिसको गुरु जी क्षमा कर देते हैं, उसको वह प्रभु से मिला देते हैं।
ਤਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਿਸ ਕਾ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥੪॥੩੭॥੧੦੬॥
तिस का सभु किछु जिस का हरि राइआ ॥४॥३७॥१०६॥
जिसका प्रभु-परमेश्वर है उसके पास सब कुछ है॥ ४ ॥ ३७ ॥ १०६ ॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਊਪਰਿ ਮੇਰੇ ਮਾਥੇ ॥
गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥
गुरु के चरण मेरे मस्तक पर विद्यमान हैं।
ਤਾ ਤੇ ਦੁਖ ਮੇਰੇ ਸਗਲੇ ਲਾਥੇ ॥੧॥
ता ते दुख मेरे सगले लाथे ॥१॥
इससे मेरे समस्त दुःख दूर हो गए हैं।॥ १॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥
सतिगुर अपुने कउ कुरबानी ॥
मैं अपने सतिगुरु पर कुर्बान जाता हूँ।
ਆਤਮ ਚੀਨਿ ਪਰਮ ਰੰਗ ਮਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आतम चीनि परम रंग मानी ॥१॥ रहाउ ॥
जिनके द्वारा मैंने अपने आत्मिक जीवन को समझ लिया है और सर्वोपरि आनन्द भोगता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
ਚਰਣ ਰੇਣੁ ਗੁਰ ਕੀ ਮੁਖਿ ਲਾਗੀ ॥
चरण रेणु गुर की मुखि लागी ॥
गुरु की चरण-धूलि मेरे चेहरे पर लग गई है
ਅਹੰਬੁਧਿ ਤਿਨਿ ਸਗਲ ਤਿਆਗੀ ॥੨॥
अह्मबुधि तिनि सगल तिआगी ॥२॥
और उसने मेरी अहंबुद्धि सारी निवृत्त कर दी है॥ २॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਲਗੋ ਮਨਿ ਮੀਠਾ ॥
गुर का सबदु लगो मनि मीठा ॥
गुरु का शब्द मेरे मन को मीठा लग रहा है।
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਤਾ ਤੇ ਮੋਹਿ ਡੀਠਾ ॥੩॥
पारब्रहमु ता ते मोहि डीठा ॥३॥
पारब्रह्म प्रभु का इस कारण मैं दर्शन कर रहा हूँ॥ ३॥
ਗੁਰੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥
गुरु सुखदाता गुरु करतारु ॥
गुरु ही सुखदाता और गुरु ही करतार हैं।
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਆਧਾਰੁ ॥੪॥੩੮॥੧੦੭॥
जीअ प्राण नानक गुरु आधारु ॥४॥३८॥१०७॥
हे नानक ! गुरु मेरी आत्मा एवं प्राणों का आधार है ॥४॥३८॥१०७॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਕਉ ਆਹਿ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥
हे मेरे मन ! तू उस प्रभु के मिलन की लालसा कर,
ਜਾ ਕੈ ਊਣਾ ਕਛਹੂ ਨਾਹਿ ॥੧॥
जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥१॥
जिसके घर में किसी पदार्थ की कोई कमी नहीं है॥ १॥
ਹਰਿ ਸਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਕਰਿ ਮਨ ਮੀਤ ॥
हरि सा प्रीतमु करि मन मीत ॥
हे मेरे मन ! तू उस प्रियतम हरि को अपना मित्र बना।
ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ਰਾਖਹੁ ਸਦ ਚੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
प्रान अधारु राखहु सद चीत ॥१॥ रहाउ ॥
तू सदैव ही प्रभु को अपने हृदय में बसा कर रख, जो तेरे प्राणों का आधार है॥ १॥ रहाउ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਤੂੰ ਤਾ ਕਉ ਸੇਵਿ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ सेवि ॥
हे मेरे मन ! तू उसकी सेवा कर,
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਅਪਰੰਪਰ ਦੇਵ ॥੨॥
आदि पुरख अपर्मपर देव ॥२॥
जो आदिपुरुष एवं अपरंपार देव है॥ २॥
ਤਿਸੁ ਊਪਰਿ ਮਨ ਕਰਿ ਤੂੰ ਆਸਾ ॥
तिसु ऊपरि मन करि तूं आसा ॥
हे मेरे मन ! तू उस पर अपनी आशा रख,
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਜਾ ਕਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥੩॥
आदि जुगादि जा का भरवासा ॥३॥
जो आदि एवं युगों के आरम्भ से प्राणियों का सहारा है॥ ३॥
ਜਾ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
जा की प्रीति सदा सुखु होइ ॥
जिसके प्रेम से हमेशा सुख-शांति प्राप्त होती है,
ਨਾਨਕੁ ਗਾਵੈ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਸੋਇ ॥੪॥੩੯॥੧੦੮॥
नानकु गावै गुर मिलि सोइ ॥४॥३९॥१०८॥
हे नानक ! गुरु से मिलकर वह उसकी महिमा ही गायन करता है॥ ४॥ ३९॥ १०८ ॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
ਮੀਤੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਹਮ ਮਾਨਾ ॥
मीतु करै सोई हम माना ॥
जो कुछ मेरा मित्र (प्रभु) करता है, उसको मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।
ਮੀਤ ਕੇ ਕਰਤਬ ਕੁਸਲ ਸਮਾਨਾ ॥੧॥
मीत के करतब कुसल समाना ॥१॥
मेरे मित्र प्रभु के कार्य मुझे सुख के तुल्य प्रतीत होते हैं।॥ १॥
ਏਕਾ ਟੇਕ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਚੀਤ ॥
एका टेक मेरै मनि चीत ॥
मेरे मन एवं चित्त में एक ही प्रभु का सहारा है,
ਜਿਸੁ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੁ ਹਮਰਾ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिसु किछु करणा सु हमरा मीत ॥१॥ रहाउ ॥
जिसकी यह सब रचना है, वही मेरा मित्र-प्रभु है॥१॥ रहाउ॥
ਮੀਤੁ ਹਮਾਰਾ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
मीतु हमारा वेपरवाहा ॥
मेरा मित्र प्रभु बेपरवाह है।
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮੋਹਿ ਅਸਨਾਹਾ ॥੨॥
गुर किरपा ते मोहि असनाहा ॥२॥
गुरु की दया से मेरा उससे प्रेम हो गया है॥ २॥
ਮੀਤੁ ਹਮਾਰਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
मीतु हमारा अंतरजामी ॥
मेरा मित्र प्रभु अन्तर्यामी है।
ਸਮਰਥ ਪੁਰਖੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੁਆਮੀ ॥੩॥
समरथ पुरखु पारब्रहमु सुआमी ॥३॥
परब्रह्म पुरुष रूप एवं सारे जगत् का स्वामी है और सब कुछ करने में समर्थ है॥ ३॥
ਹਮ ਦਾਸੇ ਤੁਮ ਠਾਕੁਰ ਮੇਰੇ ॥
हम दासे तुम ठाकुर मेरे ॥
हे प्रभु ! मैं तेरा दास हूँ और तू मेरा ठाकुर है।