ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਕਦੇ ਮੂਲਿ ਪੂਰਨ ਭੰਡਾਰ ॥
तोटि न आवै कदे मूलि पूरन भंडार ॥
नाम रूपी पूंजी से भक्तों के भण्डार भरे हुए हैं और उनमें कभी कोई कमी नहीं आती।
ਚਰਨ ਕਮਲ ਮਨਿ ਤਨਿ ਬਸੇ ਪ੍ਰਭ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥੨॥
चरन कमल मनि तनि बसे प्रभ अगम अपार ॥२॥
प्रभु अगम्य एवं अपार है और उसके सुन्दर चरण-कमल मेरे मन एवं तन में बसते हैं।॥ २॥
ਬਸਤ ਕਮਾਵਤ ਸਭਿ ਸੁਖੀ ਕਿਛੁ ਊਨ ਨ ਦੀਸੈ ॥
बसत कमावत सभि सुखी किछु ऊन न दीसै ॥
नाम की कमाई करने से सारे संतजन करतारपुर में सुखी रहते हैं और उन्हें किसी बात की कोई कमी नहीं।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭੇਟੇ ਪ੍ਰਭੂ ਪੂਰਨ ਜਗਦੀਸੈ ॥੩॥
संत प्रसादि भेटे प्रभू पूरन जगदीसै ॥३॥
संतों की कृपा से मुझे पूर्ण प्रभु जगदीश मिल गया है।३॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਸਭੈ ਕਰਹਿ ਸਚੁ ਥਾਨੁ ਸੁਹਾਇਆ ॥
जै जै कारु सभै करहि सचु थानु सुहाइआ ॥
सभी जय-जयकार कर रहे हैं और सत्य का स्थान बड़ा सुन्दर लग रहा है।
ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨ ਸੁਖ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੩੩॥੬੩॥
जपि नानक नामु निधान सुख पूरा गुरु पाइआ ॥४॥३३॥६३॥
हे नानक ! सुखों के भण्डार प्रभु -नाम को जपकर पूर्ण गुरु को पा लिया है॥ ४ ॥ ३३ ॥ ६३ ॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਰਾਧੀਐ ਹੋਈਐ ਆਰੋਗ ॥
हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥
हरि की आराधना करने से जीव आरोग्य हो जाता है।
ਰਾਮਚੰਦ ਕੀ ਲਸਟਿਕਾ ਜਿਨਿ ਮਾਰਿਆ ਰੋਗੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
रामचंद की लसटिका जिनि मारिआ रोगु ॥१॥ रहाउ ॥
यह हरि-नाम ही श्री राम चन्द्र की लाठी है, जिसने रोग को नाश कर दिया है।॥ १॥ रहाउ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਹਰਿ ਜਾਪੀਐ ਨਿਤ ਕੀਚੈ ਭੋਗੁ ॥
गुरु पूरा हरि जापीऐ नित कीचै भोगु ॥
पूर्ण गुरु द्वारा हरि का जाप किया जाए तो नित्य सुख बना रहता है।
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਵਾਰਣੈ ਮਿਲਿਆ ਸੰਜੋਗੁ ॥੧॥
साधसंगति कै वारणै मिलिआ संजोगु ॥१॥
मैं साधुओं की संगति पर न्योछावर हूँ, जिनके कारण संयोग प्राप्त हुआ है॥ १॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨਸੈ ਬਿਓਗੁ ॥
जिसु सिमरत सुखु पाईऐ बिनसै बिओगु ॥
जिसका सिमरन करने से सुख प्राप्त होता है और वियोग दूर हो जाता है,
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਗਤੀ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਜੋਗੁ ॥੨॥੩੪॥੬੪॥
नानक प्रभ सरणागती करण कारण जोगु ॥२॥३४॥६४॥
नानक तो उस प्रभु की शरण में है, जो करने एवं करवाने में समर्थ है।२॥ ३४॥ ६४॥
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦੇ ਘਰੁ ੫
रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ५
रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ५
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਅਵਰਿ ਉਪਾਵ ਸਭਿ ਤਿਆਗਿਆ ਦਾਰੂ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥
अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥
अन्य सब उपाय त्यागकर नाम रूपी दवा ली है।
ਤਾਪ ਪਾਪ ਸਭਿ ਮਿਟੇ ਰੋਗ ਸੀਤਲ ਮਨੁ ਭਇਆ ॥੧॥
ताप पाप सभि मिटे रोग सीतल मनु भइआ ॥१॥
इससे ताप, पाप एवं सभी रोग मिट गए हैं और मन शीतल शांत हो गया है॥ १॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਆਰਾਧਿਆ ਸਗਲਾ ਦੁਖੁ ਗਇਆ ॥
गुरु पूरा आराधिआ सगला दुखु गइआ ॥
पूर्ण गुरु की आराधना करने से सारा दुख दूर हो गया है।
ਰਾਖਨਹਾਰੈ ਰਾਖਿਆ ਅਪਨੀ ਕਰਿ ਮਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
राखनहारै राखिआ अपनी करि मइआ ॥१॥ रहाउ ॥
रखवाले परमात्मा ने कृपा करके बचा लिया है॥ १॥ रहाउ॥
ਬਾਹ ਪਕੜਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕਾਢਿਆ ਕੀਨਾ ਅਪਨਇਆ ॥
बाह पकड़ि प्रभि काढिआ कीना अपनइआ ॥
प्रभु ने मेरी बांह पकड़कर मुझे भवसागर में से बाहर निकाल लिया है।
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਮਨ ਤਨ ਸੁਖੀ ਨਾਨਕ ਨਿਰਭਇਆ ॥੨॥੧॥੬੫॥
सिमरि सिमरि मन तन सुखी नानक निरभइआ ॥२॥१॥६५॥
हे नानक ! भगवान् का सिमरन करके मन-तन सुखी हो गया है और निडर हो गया हूँ॥ २ ॥ १ ॥ ६५ ॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਕਰੁ ਧਰਿ ਮਸਤਕਿ ਥਾਪਿਆ ਨਾਮੁ ਦੀਨੋ ਦਾਨਿ ॥
करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥
मेरे मस्तक पर अपना हाथ धरकर ईश्वर ने मुझे अपनी सेवा में ही लीन किया है और नाम-दान दिया है।
ਸਫਲ ਸੇਵਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਤਾ ਕੀ ਨਹੀ ਹਾਨਿ ॥੧॥
सफल सेवा पारब्रहम की ता की नही हानि ॥१॥
परब्रह्म की सेवा सफल है और इससे कोई हानि नहीं होती॥ १॥
ਆਪੇ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਰਾਖਤਾ ਭਗਤਨ ਕੀ ਆਨਿ ॥
आपे ही प्रभु राखता भगतन की आनि ॥
प्रभु स्वयं ही अपने भक्तों की मान-प्रतिष्ठा रखता है।
ਜੋ ਜੋ ਚਿਤਵਹਿ ਸਾਧ ਜਨ ਸੋ ਲੇਤਾ ਮਾਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो जो चितवहि साध जन सो लेता मानि ॥१॥ रहाउ ॥
साधुजन जो कुछ भी मन में सोचते हैं, परमात्मा उन्हें सम्मान देता है॥ १॥ रहाउ॥
ਸਰਣਿ ਪਰੇ ਚਰਣਾਰਬਿੰਦ ਜਨ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਪ੍ਰਾਨ ॥
सरणि परे चरणारबिंद जन प्रभ के प्रान ॥
भक्तजन प्रभु को प्राणों से प्रिय हैं और वे उसके चरणों की शरण में ही पड़े रहते हैं।
ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ਨਾਨਕ ਮਿਲੇ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਨ ॥੨॥੨॥੬੬॥
सहजि सुभाइ नानक मिले जोती जोति समान ॥२॥२॥६६॥
हे नानक ! वे सहज स्वभाव प्रभु को मिल जाते हैं और उनकी ज्योति परम ज्योति में विलीन हो जाती है॥ २ ॥ २ ॥ ६६॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਕਾ ਆਸਰਾ ਦੀਨੋ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ॥
चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥
प्रभु ने स्वयं ही अपने चरणों का आसरा दिया है।
ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਗਤਿ ਜਨ ਪਰੇ ਤਾ ਕਾ ਸਦ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
प्रभ सरणागति जन परे ता का सद परतापु ॥१॥
जो भक्तजन प्रभु की शरण में पड़े हैं, उनका सदा के लिए प्रताप बन गया है॥ १॥
ਰਾਖਨਹਾਰ ਅਪਾਰ ਪ੍ਰਭ ਤਾ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਸੇਵ ॥
राखनहार अपार प्रभ ता की निरमल सेव ॥
अपार प्रभु रखवाला है और उसकी सेवा करने से मन निर्मल हो जाता है।
ਰਾਮ ਰਾਜ ਰਾਮਦਾਸ ਪੁਰਿ ਕੀਨੑੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
राम राज रामदास पुरि कीन्हे गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥
गुरुदेव ने अमृतसर नगरी में राम-राज्य स्थापित कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਕਿਛੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ किछु बिघनु न लागै ॥
सदैव भगवान का ध्यान करने से कोई विघ्न नहीं आता।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੀਐ ਭਇ ਦੁਸਮਨ ਭਾਗੈ ॥੨॥੩॥੬੭॥
नानक नामु सलाहीऐ भइ दुसमन भागै ॥२॥३॥६७॥
हे नानक ! नाम की महिमा-गान करने से दुश्मन भी भाग जाते हैं।॥ २॥ ३॥ ६७ ॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰਭੁ ਆਰਾਧੀਐ ਮਿਲਿ ਸਾਧ ਸਮਾਗੈ ॥
मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥
साधुओं की सभा में मिलकर तन-मन से प्रभु की आराधना करनी चाहिए।
ਉਚਰਤ ਗੁਨ ਗੋਪਾਲ ਜਸੁ ਦੂਰ ਤੇ ਜਮੁ ਭਾਗੈ ॥੧॥
उचरत गुन गोपाल जसु दूर ते जमु भागै ॥१॥
ईश्वर का गुणगान एवं यश करने से यम दूर से ही भाग जाता है॥ १॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਜੋ ਜਨੁ ਜਪੈ ਅਨਦਿਨੁ ਸਦ ਜਾਗੈ ॥
राम नामु जो जनु जपै अनदिनु सद जागै ॥
जो व्यक्ति नित्य राम-नाम जपता रहता है, वह सदैव जाग्रत रहता है।