ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਜਿਸੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਹੋਵੈ ਤਿਸੁ ਰਿਦੈ ਵਸੇਹਾ ॥
अम्रित बाणी सतिगुर पूरे की जिसु किरपालु होवै तिसु रिदै वसेहा ॥
पूर्ण सतगुरु की वाणी अमृतमय है, परन्तु यह उसके हृदय में ही बसती है, जिस पर वह कृपालु हो जाता है।
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਤਿਸ ਕਾ ਕਟੀਐ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਹਾ ॥੨॥
आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥२॥
गुरु उसका जन्म-मरण का चक्र काट देता है और उसे सदैव सुख मिलता रहता है। २।
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਣਾ ਜੰਤੁ ਸੋ ਤੁਧੁ ਬੁਝਈ ॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥
हे परमेश्वर ! जो जीव तुझे भाता है, वही तुझे बूझता है।
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਣਾ ਜੰਤੁ ਸੁ ਦਰਗਹ ਸਿਝਈ ॥
जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥
जो जीव तुझे प्रिय होता है, वही तेरे दरबार में सफल होता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰੀ ਨਦਰਿ ਹਉਮੈ ਤਿਸੁ ਗਈ ॥
जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥
जिस पर तेरी करुणा-दृष्टि हुई है, उसका अभिमान दूर हो गया है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂ ਸੰਤੁਸਟੁ ਕਲਮਲ ਤਿਸੁ ਖਈ ॥
जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥
जिस पर तू प्रसन्न हुआ है, उसके सभी पाप-विकार नाश हो गए हैं।
ਜਿਸ ਕੈ ਸੁਆਮੀ ਵਲਿ ਨਿਰਭਉ ਸੋ ਭਈ ॥
जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥
जगत् का स्वामी जिसके पक्ष में हुआ है, वह निडर हो गया है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂ ਕਿਰਪਾਲੁ ਸਚਾ ਸੋ ਥਿਅਈ ॥
जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥
जिस पर तू कृपालु हो गया है, वह सत्यवादी बन गया है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰੀ ਮਇਆ ਨ ਪੋਹੈ ਅਗਨਈ ॥
जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥
जिस पर तेरी मेहर हो जाती है, उसे तृष्णाग्नि भी स्पर्श नहीं करती।
ਤਿਸ ਨੋ ਸਦਾ ਦਇਆਲੁ ਜਿਨਿ ਗੁਰ ਤੇ ਮਤਿ ਲਈ ॥੭॥
तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥७॥
जिस व्यक्ति ने गुरु से मति ली है, उस पर तू सदा ही दयालु रहता है।७॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਿਰਪਾਲ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਲੈ ॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥
हे कृपानिधान ! कृपा करके मेरा कल्याण कर दे।
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਪੀ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਇ ਪੈ ॥
सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥
सतगुरु के चरणों में पड़कर में सर्वदा तेरा नाम जपता हूँ।
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਵਸੁ ਦੂਖਾ ਨਾਸੁ ਹੋਇ ॥
मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥
मेरे मन-तन में अवस्थित हो जाओ ताकि दुखों का नाश हो जाए।
ਹਥ ਦੇਇ ਆਪਿ ਰਖੁ ਵਿਆਪੈ ਭਉ ਨ ਕੋਇ ॥
हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥
अपना हाथ देकर मेरी रक्षा करो, ताकि किसी प्रकार का भय प्रभावित न करे।
ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਏਤੈ ਕੰਮਿ ਲਾਇ ॥
गुण गावा दिनु रैणि एतै कमि लाइ ॥
मैं दिन-रात तेरा यशोगान करता रहूँ, इसलिए मुझे इसी काम में लगाकर रखो।
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਜਾਇ ॥
संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥
संतजनों की संगति करने से अहंकार का रोग दूर हो जाता है।
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਖਸਮੁ ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥
सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥
सब जीवों में एक परमेश्वर ही व्याप्त है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਚੁ ਸਚੋ ਸਚੁ ਲਹਿਆ ॥
गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥
गुरु की कृपा से ही सत्य की प्राप्ति होती है और मैंने भी उस परमसत्य को पा लिया है।
ਦਇਆ ਕਰਹੁ ਦਇਆਲ ਅਪਣੀ ਸਿਫਤਿ ਦੇਹੁ ॥
दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥
हे दीनदयाल ! दया करो और अपनी स्तुति का दान दीजिए।
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਏਹ ॥੧॥
दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥१॥
हे नानक ! भगवान से हमारी यही प्रीति है कि उसके दर्शन करके आनंदित हो गया हूँ॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਏਕੋ ਜਪੀਐ ਮਨੈ ਮਾਹਿ ਇਕਸ ਕੀ ਸਰਣਾਇ ॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥
मन में एक ईश्वर को ही जपते रहना चाहिए और एक उसकी ही शरण लेनी चाहिए।
ਇਕਸੁ ਸਿਉ ਕਰਿ ਪਿਰਹੜੀ ਦੂਜੀ ਨਾਹੀ ਜਾਇ ॥
इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥
एक उससे ही प्रेम करो, उसके अतिरिक्त अन्य कोई प्रेम का स्थान नहीं है।
ਇਕੋ ਦਾਤਾ ਮੰਗੀਐ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥
इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥
एक दाता से ही माँगना चाहिए, उससे सबकुछ मिल जाता है।
ਮਨਿ ਤਨਿ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਇਕੋ ਇਕੁ ਧਿਆਇ ॥
मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥
अपने मन एवं तन, जीवन की हरेक साँस एवं भोजन का ग्रास लेते समय एक प्रभु का ही ध्यान करो।
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਚੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
अम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
सच्चे परमेश्वर का नामामृत ही सच्चा कोष है जो गुरु की सहायता से मिलता है।
ਵਡਭਾਗੀ ਤੇ ਸੰਤ ਜਨ ਜਿਨ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ਆਇ ॥
वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥
वे संतजन बड़े खुशकिस्मत हैं, जिनके मन में भगवान बस गया है।
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਨਾਹਿ ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥
समुद्र, पृथ्वी एवं नभ में एक परमात्मा ही रमण कर रहा है, अन्य कोई नहीं।
ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਨਾਮੁ ਉਚਰਾ ਨਾਨਕ ਖਸਮ ਰਜਾਇ ॥੨॥
नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥२॥
हे नानक ! परमेश्वर की मर्जी में ही नाम का ध्यान एवं उच्चारण करता रहता हूँ॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂ ਰਖਵਾਲਾ ਮਾਰੇ ਤਿਸੁ ਕਉਣੁ ॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥
हे ईश्वर ! जिसका तू रखवाला है, उसे कौन मार सकता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂ ਰਖਵਾਲਾ ਜਿਤਾ ਤਿਨੈ ਭੈਣੁ ॥
जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥
जिसका तू रक्षक है, उसने तीनों लोकों को विजय कर लिया है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰਾ ਅੰਗੁ ਤਿਸੁ ਮੁਖੁ ਉਜਲਾ ॥
जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥
जिसका तू साथ देता है, उसका मुख उज्जवल हो जाता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰਾ ਅੰਗੁ ਸੁ ਨਿਰਮਲੀ ਹੂੰ ਨਿਰਮਲਾ ॥
जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥
जिसे तेरा साथ मिल जाता है, वह अत्यंत निर्मल हो जाता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰੀ ਨਦਰਿ ਨ ਲੇਖਾ ਪੁਛੀਐ ॥
जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥
जिस पर तेरी कृपा-दृष्टि हो जाती है, उसके कर्मों का हिसाब-किताब नहीं पूछा जाता।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰੀ ਖੁਸੀ ਤਿਨਿ ਨਉ ਨਿਧਿ ਭੁੰਚੀਐ ॥
जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥
जिसे तेरी खुशी हासिल हो जाती है, वह दुनिया की नौ निधियों को भोगता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂ ਪ੍ਰਭ ਵਲਿ ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਮੁਹਛੰਦਗੀ ॥
जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥
हे प्रभु! तू जिसके पक्ष में है, उसे किसी प्रकार की मोहताजी कैसे हो सकती है।
ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰੀ ਮਿਹਰ ਸੁ ਤੇਰੀ ਬੰਦਿਗੀ ॥੮॥
जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥८॥
जिस पर तेरी मेहर है वही तेरी भजन- बंदगी में लीन है।
ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सलोक महला ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇ ਸੰਤਾਂ ਸੰਗਿ ਵਿਹਾਵੇ ॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥
हे स्वामी ! कृपालु हो जाओ ताकि मेरा समूचा जीवन संतों के संग व्यतीत हो जाए।
ਤੁਧਹੁ ਭੁਲੇ ਸਿ ਜਮਿ ਜਮਿ ਮਰਦੇ ਤਿਨ ਕਦੇ ਨ ਚੁਕਨਿ ਹਾਵੇ ॥੧॥
तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥१॥
जो तुझे भूल गए हैं, वे जन्म-मरण में ही दुखी रहते हैं और उनके कष्ट कभी समाप्त नहीं होते॥१॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਿਮਰਹੁ ਆਪਣਾ ਘਟਿ ਅਵਘਟਿ ਘਟ ਘਾਟ ॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥
मन में सतगुरु को ही स्मरण करते रहो, चाहे कठिन घाटी एवं पहाड़ चढ़ना हो या दरिया पार करना हो।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੰਤਿਆ ਕੋਇ ਨ ਬੰਧੈ ਵਾਟ ॥੨॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥२॥
परमेश्वर का नाम जपने से मार्ग में कोई बाधा नहीं आती।॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥