ਨਾਨਕ ਸੇ ਅਖੜੀਆ ਬਿਅੰਨਿ ਜਿਨੀ ਡਿਸੰਦੋ ਮਾ ਪਿਰੀ ॥੩॥
नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥३॥
हे नानक ! वे आँखें अन्य ही हैं, जिससे प्रियतम प्रभु दिखाई देता है॥ ३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜਿਨਿ ਜਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨਿ ਸਭਿ ਸੁਖ ਪਾਈ ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥
जिस व्यक्ति ने गुरुमुख बनकर परमात्मा की उपासना की है, उसने सब सुख पा लिए हैं।
ਓਹੁ ਆਪਿ ਤਰਿਆ ਕੁਟੰਬ ਸਿਉ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਤਰਾਈ ॥
ओहु आपि तरिआ कुट्मब सिउ सभु जगतु तराई ॥
वह अपने परिवार सहित स्वयं तो पार हुआ ही है, उसने समूचे जगत् का भी उद्धार कर दिया है।
ਓਨਿ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਧਨੁ ਸੰਚਿਆ ਸਭ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਈ ॥
ओनि हरि नामा धनु संचिआ सभ तिखा बुझाई ॥
उसने हरि-नाम रूपी धन ही संचय किया है और सारी तृष्णा बुझा ली है।
ਓਨਿ ਛਡੇ ਲਾਲਚ ਦੁਨੀ ਕੇ ਅੰਤਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ओनि छडे लालच दुनी के अंतरि लिव लाई ॥
दुनिया के सब लालच छोड़कर उसने अन्तर्मन में ईश्वर से ही लगन लगाई है।
ਓਸੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਘਰਿ ਅਨੰਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਸਖਾ ਸਹਾਈ ॥
ओसु सदा सदा घरि अनंदु है हरि सखा सहाई ॥
उसके हृदय-घर में सदैव आनंद बना रहता है और ईश्वर उसका सहायक व शुभचिंतक बन गया है।
ਓਨਿ ਵੈਰੀ ਮਿਤ੍ਰ ਸਮ ਕੀਤਿਆ ਸਭ ਨਾਲਿ ਸੁਭਾਈ ॥
ओनि वैरी मित्र सम कीतिआ सभ नालि सुभाई ॥
उसने शत्रु और मित्रों को एक समान ही समझा है और सबके संग प्रेमपूर्वक रहता है।
ਹੋਆ ਓਹੀ ਅਲੁ ਜਗ ਮਹਿ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਜਪਾਈ ॥
होआ ओही अलु जग महि गुर गिआनु जपाई ॥
वहू गुरु के ज्ञान द्वारा नाम जपकर समूचे जगत् में विख्यात हो गया है।
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ॥੧੬॥
पूरबि लिखिआ पाइआ हरि सिउ बणि आई ॥१६॥
उसकी ईश्वर से प्रीति लगी हुई है और उसने पूर्व जन्म में किए शुभ कर्मों का फल पा लिया है॥ १६॥
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे मः ५ ॥
डखणे महला ५॥
ਸਚੁ ਸੁਹਾਵਾ ਕਾਢੀਐ ਕੂੜੈ ਕੂੜੀ ਸੋਇ ॥
सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥
एक सत्य ही सुन्दर कहा जाता है, परन्तु झूठ की शोभा झूठी ही होती है।
ਨਾਨਕ ਵਿਰਲੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਜਿਨ ਸਚੁ ਪਲੈ ਹੋਇ ॥੧॥
नानक विरले जाणीअहि जिन सचु पलै होइ ॥१॥
हे नानक ! जिनके पास सत्य होता है, ऐसे व्यक्ति विरले ही ज्ञात होते हैं।॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਸਜਣ ਮੁਖੁ ਅਨੂਪੁ ਅਠੇ ਪਹਰ ਨਿਹਾਲਸਾ ॥
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥
मेरे सज्जन का मुख अनुपम है, आठ प्रहर उसे ही निहारती रहूँगी।
ਸੁਤੜੀ ਸੋ ਸਹੁ ਡਿਠੁ ਤੈ ਸੁਪਨੇ ਹਉ ਖੰਨੀਐ ॥੨॥
सुतड़ी सो सहु डिठु तै सुपने हउ खंनीऐ ॥२॥
मैंने सोते समय उस मालिक को देखा है, और सपने में भी उस पर कुर्बान जाती हूँ॥ २॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਸਜਣ ਸਚੁ ਪਰਖਿ ਮੁਖਿ ਅਲਾਵਣੁ ਥੋਥਰਾ ॥
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥
सज्जन प्रभु को अपने हृदय में ही पहचानो, मुँह से बोलना तो सब व्यर्थ ही है।
ਮੰਨ ਮਝਾਹੂ ਲਖਿ ਤੁਧਹੁ ਦੂਰਿ ਨ ਸੁ ਪਿਰੀ ॥੩॥
मंन मझाहू लखि तुधहु दूरि न सु पिरी ॥३॥
वह प्रियतम तुझसे कहीं दूर नहीं अपितु उसे अपने मन में देख लो॥ ३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਧਰਤਿ ਆਕਾਸੁ ਪਾਤਾਲੁ ਹੈ ਚੰਦੁ ਸੂਰੁ ਬਿਨਾਸੀ ॥
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥
धरती, आकाश, पाताल, चाँद-सूर्य सब नाशवान् हैं।
ਬਾਦਿਸਾਹ ਸਾਹ ਉਮਰਾਵ ਖਾਨ ਢਾਹਿ ਡੇਰੇ ਜਾਸੀ ॥
बादिसाह साह उमराव खान ढाहि डेरे जासी ॥
बड़े-बड़े बादशाह, साहूकार, नवाब एवं सरदार मौत को प्राप्त हो जाएँगे।
ਰੰਗ ਤੁੰਗ ਗਰੀਬ ਮਸਤ ਸਭੁ ਲੋਕੁ ਸਿਧਾਸੀ ॥
रंग तुंग गरीब मसत सभु लोकु सिधासी ॥
कगाल, अमीर, गरीब एवं मस्त सभी लोग संसार में से चले जाएँगे।
ਕਾਜੀ ਸੇਖ ਮਸਾਇਕਾ ਸਭੇ ਉਠਿ ਜਾਸੀ ॥
काजी सेख मसाइका सभे उठि जासी ॥
काजी, शेख, सम्पन्न लोग सभी दुनिया से चले जाएँगे।
ਪੀਰ ਪੈਕਾਬਰ ਅਉਲੀਏ ਕੋ ਥਿਰੁ ਨ ਰਹਾਸੀ ॥
पीर पैकाबर अउलीए को थिरु न रहासी ॥
पीर-पैगम्बर, औलिये सब की मृत्यु निश्चित है।
ਰੋਜਾ ਬਾਗ ਨਿਵਾਜ ਕਤੇਬ ਵਿਣੁ ਬੁਝੇ ਸਭ ਜਾਸੀ ॥
रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी ॥
रोज़ा रखने वाले, बाँग देने वाले, नमाज पढ़ने वाले, कुरान शरीफ पढ़ने वाले सत्य को बूझे बिना सब नाश हो जाएँगे।
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮੇਦਨੀ ਸਭ ਆਵੈ ਜਾਸੀ ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी ॥
संसार की चौरासी लाख योनियाँ सब आवागमन में पड़ी हुई है।
ਨਿਹਚਲੁ ਸਚੁ ਖੁਦਾਇ ਏਕੁ ਖੁਦਾਇ ਬੰਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥੧੭॥
निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी ॥१७॥
सत्य तो यही है कि एक सच्चा खुदा ही सदा अटल है और एक खुदा की बंदगी करने वाला बंदा ही नाश रहित है॥ १७॥
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे मः ५ ॥|
डखणे महला ५॥
ਡਿਠੀ ਹਭ ਢੰਢੋਲਿ ਹਿਕਸੁ ਬਾਝੁ ਨ ਕੋਇ ॥
डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥
मैंने सारी दुनिया ढूंढ कर देख ली है, मगर ईश्वर के सिवा अन्य कोई हितैषी नहीं है।
ਆਉ ਸਜਣ ਤੂ ਮੁਖਿ ਲਗੁ ਮੇਰਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਠੰਢਾ ਹੋਇ ॥੧॥
आउ सजण तू मुखि लगु मेरा तनु मनु ठंढा होइ ॥१॥
हे सज्जन ! तुम मेरे पास आओ, अपने दर्शन दो, जिससे मेरा तन-मन शीतल हो जाए॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਆਸਕੁ ਆਸਾ ਬਾਹਰਾ ਮੂ ਮਨਿ ਵਡੀ ਆਸ ॥
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥
सच्चा आशिक वही है, जिसके मन में कोई आशा नहीं होती, लेकिन मेरे मन में तो बड़ी-बड़ी आशाएँ बनी हुई हैं।
ਆਸ ਨਿਰਾਸਾ ਹਿਕੁ ਤੂ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਗਈਆਸ ॥੨॥
आस निरासा हिकु तू हउ बलि बलि बलि गईआस ॥२॥
हे ईश्वर ! एक तू हो आशा से रहित है और मैं तुझ पर बारंबार बलिहारी जाता हूँ॥ २॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਵਿਛੋੜਾ ਸੁਣੇ ਡੁਖੁ ਵਿਣੁ ਡਿਠੇ ਮਰਿਓਦਿ ॥
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥
जब वियोग की बात सुनकर ही बहुत दुख होता है तो दर्शन किए बिना वह मृतक समान हो जाता है।
ਬਾਝੁ ਪਿਆਰੇ ਆਪਣੇ ਬਿਰਹੀ ਨਾ ਧੀਰੋਦਿ ॥੩॥
बाझु पिआरे आपणे बिरही ना धीरोदि ॥३॥
अपने प्यारे के बिना वियोगी को धैर्य नहीं होता।॥ ३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਤਟ ਤੀਰਥ ਦੇਵ ਦੇਵਾਲਿਆ ਕੇਦਾਰੁ ਮਥੁਰਾ ਕਾਸੀ ॥
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥
पावन तीर्थ स्थल, देवताओं के देवालय, केदारनाथ, मथुरा, काशी,
ਕੋਟਿ ਤੇਤੀਸਾ ਦੇਵਤੇ ਸਣੁ ਇੰਦ੍ਰੈ ਜਾਸੀ ॥
कोटि तेतीसा देवते सणु इंद्रै जासी ॥
देवराज इन्द्र समेत तेंतीस करोड़ देवते सब नाश हो जाएँगे।
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਚਾਰਿ ਖਟੁ ਦਰਸ ਸਮਾਸੀ ॥
सिम्रिति सासत्र बेद चारि खटु दरस समासी ॥
स्मृतियाँ, शास्त्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, छः दर्शन सर्भी समाहित हो जाएँगे।
ਪੋਥੀ ਪੰਡਿਤ ਗੀਤ ਕਵਿਤ ਕਵਤੇ ਭੀ ਜਾਸੀ ॥
पोथी पंडित गीत कवित कवते भी जासी ॥
बड़े-बड़े ग्रंथ, पण्डित, गीत, कविता एवं कवि भी यहाँ से चले जाएँगे।
ਜਤੀ ਸਤੀ ਸੰਨਿਆਸੀਆ ਸਭਿ ਕਾਲੈ ਵਾਸੀ ॥
जती सती संनिआसीआ सभि कालै वासी ॥
बड़े-बड़े ब्रह्मचारी, सदाचारी, संन्यासी सभी काल के वश में पड़ जाएँगे।
ਮੁਨਿ ਜੋਗੀ ਦਿਗੰਬਰਾ ਜਮੈ ਸਣੁ ਜਾਸੀ ॥
मुनि जोगी दिग्मबरा जमै सणु जासी ॥
मुनि, योगी, दिगम्बर भी एक न एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएँगे।
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਵਿਣਸਣਾ ਸਭ ਬਿਨਸਿ ਬਿਨਾਸੀ ॥
जो दीसै सो विणसणा सभ बिनसि बिनासी ॥
जो भी दृष्टिगत है, वह नाश हो जाना है, सब कुछ पूर्णतया नष्ट हो जाएगा।
ਥਿਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੋ ਸੇਵਕੁ ਥਿਰੁ ਹੋਸੀ ॥੧੮॥
थिरु पारब्रहमु परमेसरो सेवकु थिरु होसी ॥१८॥
लेकिन परब्रह्म परमेश्वर सदा अटल अमर है और उसका सेवक भी स्थिर रहेगा॥ १८॥
ਸਲੋਕ ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
सलोक डखणे मः ५ ॥
श्लोक डखणे महला ५॥
ਸੈ ਨੰਗੇ ਨਹ ਨੰਗ ਭੁਖੇ ਲਖ ਨ ਭੁਖਿਆ ॥
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥
सौ नंगे आदमी भी नग्नपन की परवाह नहीं करते, लाखों भूखे भी भूख से व्याकुल नहीं होते।
ਡੁਖੇ ਕੋੜਿ ਨ ਡੁਖ ਨਾਨਕ ਪਿਰੀ ਪਿਖੰਦੋ ਸੁਭ ਦਿਸਟਿ ॥੧॥
डुखे कोड़ि न डुख नानक पिरी पिखंदो सुभ दिसटि ॥१॥
हे नानक ! अगर इन पर भगवान् की शुभ-दृष्टि हो तो करोड़ों दुखयारे भी दुख से परेशान नहीं होते॥ १॥