ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਲੀਨੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਉਪਜੀ ਦਰਸ ਪਿਆਸ ॥
करि किरपा लीने करि अपुने उपजी दरस पिआस ॥
ईश्वर ने कृपा करके अपना बना लिया है, अतः मन में उसके दर्शनों की प्यास उत्पन्न हो गई है।
ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ਬਿਨਸੀ ਦੁਤੀਆ ਆਸ ॥੧॥
संतसंगि मिलि हरि गुण गाए बिनसी दुतीआ आस ॥१॥
संत पुरुषों की संगत में परमात्मा का गुणगान किया, जिससे अन्य सब आशाएँ समाप्त हो गई हैं॥१॥
ਮਹਾ ਉਦਿਆਨ ਅਟਵੀ ਤੇ ਕਾਢੇ ਮਾਰਗੁ ਸੰਤ ਕਹਿਓ ॥
महा उदिआन अटवी ते काढे मारगु संत कहिओ ॥
संतों ने जग रूपी भयानक उजाड़ से निकालकर सच्चा मार्ग बतलाया है।
ਦੇਖਤ ਦਰਸੁ ਪਾਪ ਸਭਿ ਨਾਸੇ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਰਤਨੁ ਲਹਿਓ ॥੨॥੧੦੦॥੧੨੩॥
देखत दरसु पाप सभि नासे हरि नानक रतनु लहिओ ॥२॥१००॥१२३॥
नानक फुरमाते हैं कि संतों के दर्शन से सभी पाप नष्ट हो गए हैं और प्रभु रूपी रत्न पा लिया है॥२॥ १०० ॥ १२३॥
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥
ਮਾਈ ਰੀ ਅਰਿਓ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀ ਖੋਰਿ ॥
माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥
हे माई ! मेरा मन प्रेम की खुमारी में निमग्न है।
ਦਰਸਨ ਰੁਚਿਤ ਪਿਆਸ ਮਨਿ ਸੁੰਦਰ ਸਕਤ ਨ ਕੋਈ ਤੋਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
दरसन रुचित पिआस मनि सुंदर सकत न कोई तोरि ॥१॥ रहाउ ॥
मन को सुन्दर प्रभु-दर्शनों की तीव्र लालसा लगी हुई है, जिसे कोई तोड़ नहीं सकता ॥१॥रहाउ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਮਾਨ ਪਤਿ ਪਿਤ ਸੁਤ ਬੰਧਪ ਹਰਿ ਸਰਬਸੁ ਧਨ ਮੋਰ ॥
प्रान मान पति पित सुत बंधप हरि सरबसु धन मोर ॥
ईश्वर ही मेरा सर्वस्व है, वही मेरा प्राण, मान-प्रतिष्ठा, पिता, पुत्र, बंधु इत्यादि धन है।
ਧ੍ਰਿਗੁ ਸਰੀਰੁ ਅਸਤ ਬਿਸਟਾ ਕ੍ਰਿਮ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜਾਨਤ ਹੋਰ ॥੧॥
ध्रिगु सरीरु असत बिसटा क्रिम बिनु हरि जानत होर ॥१॥
जो परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य को मानता है, हड्डियों, विष्ठा एवं कीड़ों से भरा उसका शरीर धिक्कार योग्य है॥१॥
ਭਇਓ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਪਰਾ ਪੂਰਬਲਾ ਜੋਰ ॥
भइओ क्रिपाल दीन दुख भंजनु परा पूरबला जोर ॥
दीनों के दुख नाश करने वाला पूर्व जन्म के कर्म फल के कारण हम पर कृपालु हो गया है।
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਸਾਗਰ ਬਿਨਸਿਓ ਆਨ ਨਿਹੋਰ ॥੨॥੧੦੧॥੧੨੪॥
नानक सरणि क्रिपा निधि सागर बिनसिओ आन निहोर ॥२॥१०१॥१२४॥
नानक का कथन है कि मैंने कृपानिधि, प्रेम के सागर प्रभु की शरण ली है, जिससे लोगों की निर्भरता समाप्त हो गई है ॥२॥ १०१ ॥१२४॥
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥
ਨੀਕੀ ਰਾਮ ਕੀ ਧੁਨਿ ਸੋਇ ॥
नीकी राम की धुनि सोइ ॥
राम भजन की सुरीली ध्वनि भली है।
ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਨੂਪ ਸੁਆਮੀ ਜਪਤ ਸਾਧੂ ਹੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
चरन कमल अनूप सुआमी जपत साधू होइ ॥१॥ रहाउ ॥
ईश्वर के अनुपम चरणों का जाप करने से जीव साधू कहलाता है॥१॥रहाउ॥।
ਚਿਤਵਤਾ ਗੋਪਾਲ ਦਰਸਨ ਕਲਮਲਾ ਕਢੁ ਧੋਇ ॥
चितवता गोपाल दरसन कलमला कढु धोइ ॥
परमात्मा के दर्शन का चिन्तन कर वह पापों को धो डालता है।
ਜਨਮ ਮਰਨ ਬਿਕਾਰ ਅੰਕੁਰ ਹਰਿ ਕਾਟਿ ਛਾਡੇ ਖੋਇ ॥੧॥
जनम मरन बिकार अंकुर हरि काटि छाडे खोइ ॥१॥
वह जन्म-मरण एवं विकारों के बीज को काट देता है॥१॥
ਪਰਾ ਪੂਰਬਿ ਜਿਸਹਿ ਲਿਖਿਆ ਬਿਰਲਾ ਪਾਏ ਕੋਇ ॥
परा पूरबि जिसहि लिखिआ बिरला पाए कोइ ॥
जिसके भाग्य में पूर्व से लिखा होता है, ऐसा कोई विरला ही भगवान को पाता है।
ਰਵਣ ਗੁਣ ਗੋਪਾਲ ਕਰਤੇ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਜੋਇ ॥੨॥੧੦੨॥੧੨੫॥
रवण गुण गोपाल करते नानका सचु जोइ ॥२॥१०२॥१२५॥
हे नानक ! वह तो कर्ता परमेश्वर के गुण गाते हुए उस परम सत्य को ही खोज रहे हैं।॥२॥ १०२ ॥ १२५ ॥
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਮਤਿ ਸਾਰ ॥
हरि के नाम की मति सार ॥
हरि-नामोच्चारण करने वाले जिज्ञासु की बुद्धि उत्तम होती है।
ਹਰਿ ਬਿਸਾਰਿ ਜੁ ਆਨ ਰਾਚਹਿ ਮਿਥਨ ਸਭ ਬਿਸਥਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि बिसारि जु आन राचहि मिथन सभ बिसथार ॥१॥ रहाउ ॥
जो हरि को भुलाकर अन्य कर्मकाण्ड में तल्लीन होता है, उसका किया सब झूठा है॥१॥रहाउ॥।
ਸਾਧਸੰਗਮਿ ਭਜੁ ਸੁਆਮੀ ਪਾਪ ਹੋਵਤ ਖਾਰ ॥
साधसंगमि भजु सुआमी पाप होवत खार ॥
साधु पुरुषों की सभा में भगवान का भजन करो, सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
ਚਰਨਾਰਬਿੰਦ ਬਸਾਇ ਹਿਰਦੈ ਬਹੁਰਿ ਜਨਮ ਨ ਮਾਰ ॥੧॥
चरनारबिंद बसाइ हिरदै बहुरि जनम न मार ॥१॥
प्रभु-चरणों को हृदय में बसाने से जन्म-मरण से मुक्ति हो जाती है।॥१॥
ਕਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹ ਰਾਖਿ ਲੀਨੇ ਏਕ ਨਾਮ ਅਧਾਰ ॥
करि अनुग्रह राखि लीने एक नाम अधार ॥
एकमात्र नामोच्चारण के आधार पर प्रभु ने कृपा कर हमें बचा लिया है।
ਦਿਨ ਰੈਨਿ ਸਿਮਰਤ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਮੁਖ ਊਜਲ ਦਰਬਾਰਿ ॥੨॥੧੦੩॥੧੨੬॥
दिन रैनि सिमरत सदा नानक मुख ऊजल दरबारि ॥२॥१०३॥१२६॥
नानक कथन करते हैं कि दिन-रात परमात्मा का स्मरण करो, इसके फलस्वरूप ईश्वर के दरबार में सम्मान प्राप्त होता है॥ २ ॥ १०३ ॥ १२६ ॥
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥
ਮਾਨੀ ਤੂੰ ਰਾਮ ਕੈ ਦਰਿ ਮਾਨੀ ॥
मानी तूं राम कै दरि मानी ॥
हे जीव-स्त्री! तुझे ईश्वर के दरबार में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है,
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਏ ਬਿਨਸੀ ਸਭ ਅਭਿਮਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए बिनसी सभ अभिमानी ॥१॥ रहाउ ॥
साधुजनों के साथ मिलकर भगवान का गुण-गान किया, जिससे अभिमान समाप्त हो गया ॥१॥रहाउ॥।
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਅਪੁਨੀ ਕਰਿ ਲੀਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੂਰ ਗਿਆਨੀ ॥
धारि अनुग्रहु अपुनी करि लीनी गुरमुखि पूर गिआनी ॥
प्रभु ने कृपा कर अपना बना लिया और गुरु से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई।
ਸਰਬ ਸੂਖ ਆਨੰਦ ਘਨੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਦਰਸ ਧਿਆਨੀ ॥੧॥
सरब सूख आनंद घनेरे ठाकुर दरस धिआनी ॥१॥
ठाकुर जी के दर्शनों एवं ध्यान में सर्व सुख एवं आनंद ही आनंद प्राप्त होता है।॥१॥
ਨਿਕਟਿ ਵਰਤਨਿ ਸਾ ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਨਿ ਦਹ ਦਿਸ ਸਾਈ ਜਾਨੀ ॥
निकटि वरतनि सा सदा सुहागनि दह दिस साई जानी ॥
वही सदा सुहागिन कहलाती है, जो प्रभु के आसपास रहती है और दसों दिशाओं में मशहूर होती है।
ਪ੍ਰਿਅ ਰੰਗ ਰੰਗਿ ਰਤੀ ਨਾਰਾਇਨ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਕੁਰਬਾਨੀ ॥੨॥੧੦੪॥੧੨੭॥
प्रिअ रंग रंगि रती नाराइन नानक तिसु कुरबानी ॥२॥१०४॥१२७॥
नानक उस जीव-स्त्री पर कुर्बान जाता है, जो प्रियतम नारायण के रंग में लीन रहती है॥२॥ १०४ ॥ १२७ ॥
ਸਾਰਗ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सारग महला ५ ॥
सारग महला ५ ॥
ਤੁਅ ਚਰਨ ਆਸਰੋ ਈਸ ॥
तुअ चरन आसरो ईस ॥
हे ईश्वर ! मुझे तुम्हारे चरणों का आसरा है।
ਤੁਮਹਿ ਪਛਾਨੂ ਸਾਕੁ ਤੁਮਹਿ ਸੰਗਿ ਰਾਖਨਹਾਰ ਤੁਮੈ ਜਗਦੀਸ ॥ ਰਹਾਉ ॥
तुमहि पछानू साकु तुमहि संगि राखनहार तुमै जगदीस ॥ रहाउ ॥
मैं तुझे ही अपना परिचित, रिश्तेरदार एवं साथी मानता हूँ, तू ही मेरा रखवाला है, जगत का ईश्वर है॥रहाउ॥।
ਤੂ ਹਮਰੋ ਹਮ ਤੁਮਰੇ ਕਹੀਐ ਇਤ ਉਤ ਤੁਮ ਹੀ ਰਾਖੇ ॥
तू हमरो हम तुमरे कहीऐ इत उत तुम ही राखे ॥
तू हमारा है, हम तुम्हारे कहलाते हैं, लोक-परलोक तू ही हमारी रक्षा करता है।
ਤੂ ਬੇਅੰਤੁ ਅਪਰੰਪਰੁ ਸੁਆਮੀ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਕੋਈ ਲਾਖੈ ॥੧॥
तू बेअंतु अपर्मपरु सुआमी गुर किरपा कोई लाखै ॥१॥
तू बेअन्त है, अपरंपार है, केवल गुरु की कृपा से तुझे समझा जा सकता है॥१॥
ਬਿਨੁ ਬਕਨੇ ਬਿਨੁ ਕਹਨ ਕਹਾਵਨ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਾਨੈ ॥
बिनु बकने बिनु कहन कहावन अंतरजामी जानै ॥
हे अन्तर्यामी ! तू बिना बोले, हमारे बिना कहने-कहलवाने पर भी मन की हर भावना को जानता है।
ਜਾ ਕਉ ਮੇਲਿ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਨਾਨਕੁ ਸੇ ਜਨ ਦਰਗਹ ਮਾਨੇ ॥੨॥੧੦੫॥੧੨੮॥
जा कउ मेलि लए प्रभु नानकु से जन दरगह माने ॥२॥१०५॥१२८॥
नानक फुरमाते हैं कि जिसे प्रभु अपने चरणों में मिला लेता है, वही उसके दरबार में सम्मान प्राप्त करता है॥ २ ॥ १०५ ॥ १२८ ॥