ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कलिआन महला ५ ॥
कलिआन महला ५ ॥
ਮੇਰੇ ਲਾਲਨ ਕੀ ਸੋਭਾ ॥
मेरे लालन की सोभा ॥
मेरे प्रभु की शोभा
ਸਦ ਨਵਤਨ ਮਨ ਰੰਗੀ ਸੋਭਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सद नवतन मन रंगी सोभा ॥१॥ रहाउ ॥
सदैव नवीन एवं मन को रंगने वाली है॥ १॥रहाउ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਮਹੇਸ ਸਿਧ ਮੁਨਿ ਇੰਦ੍ਰਾ ਭਗਤਿ ਦਾਨੁ ਜਸੁ ਮੰਗੀ ॥੧॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा भगति दानु जसु मंगी ॥१॥
ब्रह्मा, शिवशंकर, सिद्ध, मुनि एवं इन्द्र इत्यादि भक्ति एवं यश ही मांगते हैं।॥ १॥
ਜੋਗ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਸੇਖਨਾਗੈ ਸਗਲ ਜਪਹਿ ਤਰੰਗੀ ॥
जोग गिआन धिआन सेखनागै सगल जपहि तरंगी ॥
बड़े-बड़े योगी, ज्ञानी, ध्यानी एवं शेषनाग इत्यादि सब परमात्मा का जाप करते हैं।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੰਤਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸਦ ਸੰਗੀ ॥੨॥੩॥
कहु नानक संतन बलिहारै जो प्रभ के सद संगी ॥२॥३॥
नानक का कथन है कि मैं उन संत पुरुषों पर बलिहारी जाता हूँ, जो प्रभु वन्दना में लीन रहकर सदा उसी के साथ रहते हैं।॥ २॥३॥
ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨
कलिआन महला ५ घरु २
कलिआन महला ५ घरु २
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਤੇਰੈ ਮਾਨਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਾਨਿ ॥
तेरै मानि हरि हरि मानि ॥
हे ईश्वर ! तेरी महिमा गाने से ही मान-सम्मान प्राप्त होता है।
ਨੈਨ ਬੈਨ ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨੀਐ ਅੰਗ ਅੰਗੇ ਸੁਖ ਪ੍ਰਾਨਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नैन बैन स्रवन सुनीऐ अंग अंगे सुख प्रानि ॥१॥ रहाउ ॥
ऑखों से दर्शन करने, जिव्हा से नामोच्चारण, कानों से कीर्तन सुनने से अंग-अंग एवं प्राणों को सुख प्राप्त होता है॥ १॥रहाउ॥
ਇਤ ਉਤ ਦਹ ਦਿਸਿ ਰਵਿਓ ਮੇਰ ਤਿਨਹਿ ਸਮਾਨਿ ॥੧॥
इत उत दह दिसि रविओ मेर तिनहि समानि ॥१॥
इधर-उधर, दसों दिशाओं, पर्वतों एवं तृण में समान रूप से ईश्वर ही व्याप्त है॥ १॥
ਜਤ ਕਤਾ ਤਤ ਪੇਖੀਐ ਹਰਿ ਪੁਰਖ ਪਤਿ ਪਰਧਾਨ ॥
जत कता तत पेखीऐ हरि पुरख पति परधान ॥
जहाँ भी देखा जाए, उधर प्रभु ही नज़र आता है, वह परम पुरुष, संसार का स्वामी एवं प्रधान है।
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਮਿਟੇ ਕਥੇ ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨ ॥੨॥੧॥੪॥
साधसंगि भ्रम भै मिटे कथे नानक ब्रहम गिआन ॥२॥१॥४॥
नानक यही ब्रह्मज्ञान कथन करते हैं कि साधु पुरुषों की संगत में सब भ्रम भय मिट जाते ॥२॥१॥४॥
ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कलिआन महला ५ ॥
कलिआन महला ५ ॥
ਗੁਨ ਨਾਦ ਧੁਨਿ ਅਨੰਦ ਬੇਦ ॥
गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥
परमात्मा का गुणगान, शब्द की ध्वनि, आनंददायक वेद-ज्ञान का
ਕਥਤ ਸੁਨਤ ਮੁਨਿ ਜਨਾ ਮਿਲਿ ਸੰਤ ਮੰਡਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कथत सुनत मुनि जना मिलि संत मंडली ॥१॥ रहाउ ॥
संतों की मण्डली में मिलकर मुनिजन कथन एवं श्रवण करते हैं।॥ १॥रहाउ॥
ਗਿਆਨ ਧਿਆਨ ਮਾਨ ਦਾਨ ਮਨ ਰਸਿਕ ਰਸਨ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਤਹ ਪਾਪ ਖੰਡਲੀ ॥੧॥
गिआन धिआन मान दान मन रसिक रसन नामु जपत तह पाप खंडली ॥१॥
वे ज्ञान-चर्चा करते हैं, ध्यानशील रहते हैं, मोह-माया को छोड़ने की प्रेरणा करते हैं, मन से प्रेमपूर्वक परमात्मा का नाम जपते और पापों का खण्डन करते हैं।॥ १॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਗਿਆਨ ਭੁਗਤਿ ਸੁਰਤਿ ਸਬਦ ਤਤ ਬੇਤੇ ਜਪੁ ਤਪੁ ਅਖੰਡਲੀ ॥
जोग जुगति गिआन भुगति सुरति सबद तत बेते जपु तपु अखंडली ॥
वे तत्व वेता योग-युक्ति, ज्ञान-भोग, शब्द का चिन्तन, जाप-तपस्या करते हैं।
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਮਿਲਿ ਜੋਤਿ ਨਾਨਕ ਕਛੂ ਦੁਖੁ ਨ ਡੰਡਲੀ ॥੨॥੨॥੫॥
ओति पोति मिलि जोति नानक कछू दुखु न डंडली ॥२॥२॥५॥
नानक फुरमाते हैं कि वे परम ज्योति में पूर्णतया मिल जाते हैं और उनको कोई दुख प्रभावित नहीं करता॥ २॥२॥५॥
ਕਲਿਆਨੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कलिआनु महला ५ ॥
कलिआन महला ५ ॥
ਕਉਨੁ ਬਿਧਿ ਤਾ ਕੀ ਕਹਾ ਕਰਉ ॥
कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥
प्रभु-मिलन का क्या तरीका है, उसके लिए मुझे क्या करना चाहिए।
ਧਰਤ ਧਿਆਨੁ ਗਿਆਨੁ ਸਸਤ੍ਰਗਿਆ ਅਜਰ ਪਦੁ ਕੈਸੇ ਜਰਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
धरत धिआनु गिआनु ससत्रगिआ अजर पदु कैसे जरउ ॥१॥ रहाउ ॥
अनेक व्यक्ति ध्यान लगाते हैं, शास्त्रज्ञ ज्ञान-चर्चा करते हैं, लेकिन इस असह्य अवस्था को किस तरह सहन करूँ॥ १॥रहाउ॥
ਬਿਸਨ ਮਹੇਸ ਸਿਧ ਮੁਨਿ ਇੰਦ੍ਰਾ ਕੈ ਦਰਿ ਸਰਨਿ ਪਰਉ ॥੧॥
बिसन महेस सिध मुनि इंद्रा कै दरि सरनि परउ ॥१॥
क्या मैं विष्णु, महेश, सिद्ध-मुनि अथवा इन्द्र के द्वार पर उनकी शरण में पडूं॥ १॥
ਕਾਹੂ ਪਹਿ ਰਾਜੁ ਕਾਹੂ ਪਹਿ ਸੁਰਗਾ ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਮੁਕਤਿ ਕਹਉ ॥
काहू पहि राजु काहू पहि सुरगा कोटि मधे मुकति कहउ ॥
कोई राज देता है, कोई स्वर्ग देता है, लेकिन मुक्ति करोड़ों में से किसी विरले के ही पास है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਰਸੁ ਪਾਈਐ ਸਾਧੂ ਚਰਨ ਗਹਉ ॥੨॥੩॥੬॥
कहु नानक नाम रसु पाईऐ साधू चरन गहउ ॥२॥३॥६॥
नानक का कथन है कि साधु पुरुषों के चरणों में आने से ही हरिनाम का रस प्राप्त होता है॥२॥३॥६॥
ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कलिआन महला ५ ॥
कलिआन महला ५ ॥
ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਪ੍ਰਭ ਸਖੇ ॥
प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥
हे प्रभु ! एकमात्र तू ही मेरे प्राणों का स्वामी है, तू दया का सागर है, परमपुरुष एवं सच्चा साथी है।
ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਕਲਿ ਕਾਲ ਜਾਲ ਦੁਖ ਬਿਨਾਸਨੁ ਹਰਿ ਰਖੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गरभ जोनि कलि काल जाल दुख बिनासनु हरि रखे ॥१॥ रहाउ ॥
तू ही गर्भ योनि (से मुक्त करने वाला), मौत के जाल एवं दुखों को नष्ट करके बचाने वाला है॥ १॥रहाउ॥
ਨਾਮ ਧਾਰੀ ਸਰਨਿ ਤੇਰੀ ॥
नाम धारी सरनि तेरी ॥
मैं नाम धारण करके तेरी शरण में आया हूँ,
ਪ੍ਰਭ ਦਇਆਲ ਟੇਕ ਮੇਰੀ ॥੧॥
प्रभ दइआल टेक मेरी ॥१॥
हे दयालु प्रभु ! तू ही मेरा आसरा है॥ १॥
ਅਨਾਥ ਦੀਨ ਆਸਵੰਤ ॥
अनाथ दीन आसवंत ॥
मुझ सरीखे अनाथ एवं दीन को तेरी ही आशा है,
ਨਾਮੁ ਸੁਆਮੀ ਮਨਹਿ ਮੰਤ ॥੨॥
नामु सुआमी मनहि मंत ॥२॥
हे स्वामी ! तेरा नाम ही मन में मंत्र है॥ २॥
ਤੁਝ ਬਿਨਾ ਪ੍ਰਭ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਨੂ ॥
तुझ बिना प्रभ किछू न जानू ॥
हे प्रभु ! तेरे सिवा मैं कुछ नहीं मानता और
ਸਰਬ ਜੁਗ ਮਹਿ ਤੁਮ ਪਛਾਨੂ ॥੩॥
सरब जुग महि तुम पछानू ॥३॥
समूचे जगत में तुम्हें ही पहचानता हूँ॥ ३॥
ਹਰਿ ਮਨਿ ਬਸੇ ਨਿਸਿ ਬਾਸਰੋ ॥
हरि मनि बसे निसि बासरो ॥
मेरे मन में दिन-रात परमात्मा ही बसता है और
ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਨਕ ਆਸਰੋ ॥੪॥੪॥੭॥
गोबिंद नानक आसरो ॥४॥४॥७॥
नानक का कथन है कि, उसका ही मुझे आसरा है॥ ४॥ ४॥ ७॥
ਕਲਿਆਨ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कलिआन महला ५ ॥
कलिआन महला ५ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਜਾਪੀਐ ਭਗਵਾਨ ॥
मनि तनि जापीऐ भगवान ॥
मन तन से भगवान का जाप करना चाहिए।
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਸਦਾ ਸੂਖ ਕਲਿਆਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर पूरे सुप्रसंन भए सदा सूख कलिआन ॥१॥ रहाउ ॥
पूर्ण गुरु के प्रसन्न होने पर सदैव सुख एवं कल्याण प्राप्त होता है।॥ १॥रहाउ॥
ਸਰਬ ਕਾਰਜ ਸਿਧਿ ਭਏ ਗਾਇ ਗੁਨ ਗੁਪਾਲ ॥
सरब कारज सिधि भए गाइ गुन गुपाल ॥
ईश्वर के गुण-गान से सभी कार्य सिद्ध हो गए हैं।
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਪ੍ਰਭੂ ਸਿਮਰੇ ਨਾਠਿਆ ਦੁਖ ਕਾਲ ॥੧॥
मिलि साधसंगति प्रभू सिमरे नाठिआ दुख काल ॥१॥
साधुजनों के संग मिलकर प्रभु का सिमरन किया तो दुख एवं काल दूर हो गए॥ १॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰਿਆ ਕਰਉ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਸੇਵ ॥
करि किरपा प्रभ मेरिआ करउ दिनु रैनि सेव ॥
हे मेरे प्रभु ! मुझ पर कृपा करो, ताकि दिन-रात तेरी सेवा में तल्लीन रहूँ।