ਹਰਿ ਜਨ ਹਰਿ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਮਾਨੁ ॥੨੯॥
हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥२९॥
नानक का कथन है कि यह सच्ची बात मान लो कि ईश्वर एवं उसके भक्तों में कोई अन्तर नहीं ॥ २६ ॥
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਮੈ ਫਧਿ ਰਹਿਓ ਬਿਸਰਿਓ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਮੁ ॥
मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥
मन माया में फँसा-रहता है, जिससे ईश्वर का नाम भूल जाता है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਜੀਵਨ ਕਉਨੇ ਕਾਮ ॥੩੦॥
कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥३०॥
गुरु नानक निर्देश करते हैं कि भगवान के भजन बिना जीवन किसी काम का नहीं ॥३० ॥
ਪ੍ਰਾਨੀ ਰਾਮੁ ਨ ਚੇਤਈ ਮਦਿ ਮਾਇਆ ਕੈ ਅੰਧੁ ॥
प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
माया के नशे में अन्धा होकर प्राणी राम को याद नहीं करता।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਪਰਤ ਤਾਹਿ ਜਮ ਫੰਧ ॥੩੧॥
कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥३१॥
हे नानक ! प्रभु-भजन बिना इसके गले में मौत का फंदा ही पड़ता है।॥३१॥
ਸੁਖ ਮੈ ਬਹੁ ਸੰਗੀ ਭਏ ਦੁਖ ਮੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕੋਇ ॥
सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥
सुख में तो बहुत सारे साथी बन जाते हैं, परन्तु दुख में कोई साथ नहीं देता।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮਨਾ ਅੰਤਿ ਸਹਾਈ ਹੋਇ ॥੩੨॥
कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥३२॥
गुरु नानक निर्देश करते हैं कि हे मन ! भगवान का भजन कर लो, क्योंकि अंत में वही सहाई होता है॥३२ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਭਰਮਤ ਫਿਰਿਓ ਮਿਟਿਓ ਨ ਜਮ ਕੋ ਤ੍ਰਾਸੁ ॥
जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥
प्राणी बेचारा जन्म-जन्मांतर भटकता रहा, लेकिन उसका मौत का डर नहीं मिटा I
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮਨਾ ਨਿਰਭੈ ਪਾਵਹਿ ਬਾਸੁ ॥੩੩॥
कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥३३॥
नानक फुरमाते हैं कि हे मन ! ईश्वर का भजन किया जाए तो निर्भय हो जाओगे ॥३३॥
ਜਤਨ ਬਹੁਤੁ ਮੈ ਕਰਿ ਰਹਿਓ ਮਿਟਿਓ ਨ ਮਨ ਕੋ ਮਾਨੁ ॥
जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥
मैंने बहुत कोशिशें कर ली हैं, लेकिन मन का अहंकार मिट नहीं सका।
ਦੁਰਮਤਿ ਸਿਉ ਨਾਨਕ ਫਧਿਓ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਭਗਵਾਨ ॥੩੪॥
दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥३४॥
नानक विनती करते हैं, हे भगवान ! दुर्मति में फँसा हुआ हूँ, मुझे बचा लो॥३४॥
ਬਾਲ ਜੁਆਨੀ ਅਰੁ ਬਿਰਧਿ ਫੁਨਿ ਤੀਨਿ ਅਵਸਥਾ ਜਾਨਿ ॥
बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥
बचपन, जवानी और बुढ़ापा- जिंदगी की यह तीन अवस्थाएँ मानी जाती हैं।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਬਿਰਥਾ ਸਭ ਹੀ ਮਾਨੁ ॥੩੫॥
कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥३५॥
नानक का कथन है कि ईश्वर के भजन बिना सब व्यर्थ मान ॥३५ ॥
ਕਰਣੋ ਹੁਤੋ ਸੁ ਨਾ ਕੀਓ ਪਰਿਓ ਲੋਭ ਕੈ ਫੰਧ ॥
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
जो तुम्हारे करने योग्य काम था, वह (प्रभु-भजन) तूने लालच में फँसकर बिल्कुल नहीं किया।
ਨਾਨਕ ਸਮਿਓ ਰਮਿ ਗਇਓ ਅਬ ਕਿਉ ਰੋਵਤ ਅੰਧ ॥੩੬॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥३६॥
गुरु नानक फुरमाते हैं कि हे अन्धे ! समय गुजर गया है, अब क्यों रो रहे हो ॥३६॥
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਮੈ ਰਮਿ ਰਹਿਓ ਨਿਕਸਤ ਨਾਹਿਨ ਮੀਤ ॥
मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥
हे मित्र ! मन तुम्हारा माया में ही लीन है, जो इससे निकलता नहीं।
ਨਾਨਕ ਮੂਰਤਿ ਚਿਤ੍ਰ ਜਿਉ ਛਾਡਿਤ ਨਾਹਿਨ ਭੀਤਿ ॥੩੭॥
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥३७॥
नानक का कथन है कि ज्यों दीवार पर रचित मूर्ति दीवार को नहीं छोड़ती, वैसा ही तुम्हारा हाल है॥ ३७ ॥
ਨਰ ਚਾਹਤ ਕਛੁ ਅਉਰ ਅਉਰੈ ਕੀ ਅਉਰੈ ਭਈ ॥
नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥
इन्सान चाहता तो कुछ और है, लेकिन कुछ और ही हो जाता है।
ਚਿਤਵਤ ਰਹਿਓ ਠਗਉਰ ਨਾਨਕ ਫਾਸੀ ਗਲਿ ਪਰੀ ॥੩੮॥
चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥३८॥
हे नानक ! लोगों को धोखा देने की सोच में वह खुद ही फॅस जाता है।॥३८॥
ਜਤਨ ਬਹੁਤ ਸੁਖ ਕੇ ਕੀਏ ਦੁਖ ਕੋ ਕੀਓ ਨ ਕੋਇ ॥
जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥
लोग सुख के लिए बहुत प्रयास करते हैं परन्तु दुख की रोकथाम के लिए कुछ नहीं करते।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਸੋ ਹੋਇ ॥੩੯॥
कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥३९॥
नानक समझाते हैं कि हे मन ! सुन, दरअसल जो ईश्वर को उचित लगता है, वही होता है।॥३६॥
ਜਗਤੁ ਭਿਖਾਰੀ ਫਿਰਤੁ ਹੈ ਸਭ ਕੋ ਦਾਤਾ ਰਾਮੁ ॥
जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥
यह जगत भिखारी की तरह घूमता है, लेकिन सब को देने वाला परमेश्वर ही है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮਨ ਸਿਮਰੁ ਤਿਹ ਪੂਰਨ ਹੋਵਹਿ ਕਾਮ ॥੪੦॥
कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥४०॥
नानक का कथन है कि हे मन ! भगवान का सिमरन करने से सब कार्य पूर्ण होते हैं।॥४०॥
ਝੂਠੈ ਮਾਨੁ ਕਹਾ ਕਰੈ ਜਗੁ ਸੁਪਨੇ ਜਿਉ ਜਾਨੁ ॥
झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥
हे भाई ! झूठा अभिमान क्यों कर रहे हो, यह दुनिया सपने की तरह है।
ਇਨ ਮੈ ਕਛੁ ਤੇਰੋ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਕਹਿਓ ਬਖਾਨਿ ॥੪੧॥
इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥४१॥
नानक का यही कथन है कि दुनिया में कुछ भी तेरा नहीं ॥४१॥
ਗਰਬੁ ਕਰਤੁ ਹੈ ਦੇਹ ਕੋ ਬਿਨਸੈ ਛਿਨ ਮੈ ਮੀਤ ॥
गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥
हे मित्र ! शरीर का तुम गर्व करते हो, लेकिन यह तो क्षण में ही नष्ट हो जाता है।
ਜਿਹਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਿਓ ਨਾਨਕ ਤਿਹਿ ਜਗੁ ਜੀਤਿ ॥੪੨॥
जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥४२॥
नानक का मत है कि जो प्राणी ईश्वर का यशोगान करता है, वही जगत पर विजयी होता है॥ ४२ ॥
ਜਿਹ ਘਟਿ ਸਿਮਰਨੁ ਰਾਮ ਕੋ ਸੋ ਨਰੁ ਮੁਕਤਾ ਜਾਨੁ ॥
जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥
जिसके दिल में राम का सिमरन है, उसी व्यक्ति को मुक्त मानो।
ਤਿਹਿ ਨਰ ਹਰਿ ਅੰਤਰੁ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਮਾਨੁ ॥੪੩॥
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥४३॥
नानक का मत है कि सच मानना, उस व्यक्ति एवं परमात्मा में कोई अन्तर नहीं ॥४३॥
ਏਕ ਭਗਤਿ ਭਗਵਾਨ ਜਿਹ ਪ੍ਰਾਨੀ ਕੈ ਨਾਹਿ ਮਨਿ ॥
एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥
जिस प्राणी के मन में भगवान की भक्ति नहीं।
ਜੈਸੇ ਸੂਕਰ ਸੁਆਨ ਨਾਨਕ ਮਾਨੋ ਤਾਹਿ ਤਨੁ ॥੪੪॥
जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥४४॥
गुरु नानक फुरमान करते हैं कि उसका तन सूअर एवं कुते की तरह मानो ॥४४॥
ਸੁਆਮੀ ਕੋ ਗ੍ਰਿਹੁ ਜਿਉ ਸਦਾ ਸੁਆਨ ਤਜਤ ਨਹੀ ਨਿਤ ॥
सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥
ज्यों कुता अपने मालिक का घर हरगिज नहीं छोड़ता।
ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਹਰਿ ਭਜਉ ਇਕ ਮਨਿ ਹੁਇ ਇਕ ਚਿਤਿ ॥੪੫॥
नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥४५॥
नानक का कथन है कि इसी तरह एकाम्रचित होकर दिल से भगवान का भजन करो॥ ४५ ॥
ਤੀਰਥ ਬਰਤ ਅਰੁ ਦਾਨ ਕਰਿ ਮਨ ਮੈ ਧਰੈ ਗੁਮਾਨੁ ॥
तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥
जो व्यक्ति तीर्थ, व्रत-उपवास एवं दान-पुण्य करके भी मन में गुमान करता है।
ਨਾਨਕ ਨਿਹਫਲ ਜਾਤ ਤਿਹ ਜਿਉ ਕੁੰਚਰ ਇਸਨਾਨੁ ॥੪੬॥
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥४६॥
हे नानक ! उसके सब कर्म यों निष्फल हो जाते हैं, ज्यों हाथी स्नान के बाद धूल लगा लेता है॥४६॥
ਸਿਰੁ ਕੰਪਿਓ ਪਗ ਡਗਮਗੇ ਨੈਨ ਜੋਤਿ ਤੇ ਹੀਨ ॥
सिरु क्मपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥
सिर कॉप रहा है, पैर डगमगा रहे हैं और आँखों की रोशनी भी नहीं रही।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਭਈ ਤਊ ਨ ਹਰਿ ਰਸਿ ਲੀਨ ॥੪੭॥
कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥४७॥
गुरु नानक का कथन है कि बुढ़ापे में यह दशा हो गई है, इसके बावजूद भी जीव परमात्मा के भजन में लीन नहीं हो रहा॥ ४७ ॥