ਸਰਮ ਸੁਰਤਿ ਦੁਇ ਸਸੁਰ ਭਏ ॥
सरम सुरति दुइ ससुर भए ॥
लज्जा एवं सुरति दोनों मेरे सास-ससुर बन गए हैं।
ਕਰਣੀ ਕਾਮਣਿ ਕਰਿ ਮਨ ਲਏ ॥੨॥
करणी कामणि करि मन लए ॥२॥
सदाचरण को मैंने अपनी पत्नी बना लिया है॥ २॥
ਸਾਹਾ ਸੰਜੋਗੁ ਵੀਆਹੁ ਵਿਜੋਗੁ ॥
साहा संजोगु वीआहु विजोगु ॥
सत्संग मेरे विवाह का समय है और संसार से टूट जाना मेरा विवाह है।
ਸਚੁ ਸੰਤਤਿ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋਗੁ ॥੩॥੩॥
सचु संतति कहु नानक जोगु ॥३॥३॥
हे नानक ! ऐसे प्रभु मिलन से मेरे यहाँ सत्य की संतान उत्पन्न हुई है॥ ३॥ ३॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਪਉਣੈ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਕਾ ਮੇਲੁ ॥
पउणै पाणी अगनी का मेलु ॥
मानव-शरीर की रचना पवन, जल एवं अग्नि के मिलन से हुई है।
ਚੰਚਲ ਚਪਲ ਬੁਧਿ ਕਾ ਖੇਲੁ ॥
चंचल चपल बुधि का खेलु ॥
यह शरीर चंचल मन एवं चतुर बुद्धि का बनाया हुआ एक खिलौना है।
ਨਉ ਦਰਵਾਜੇ ਦਸਵਾ ਦੁਆਰੁ ॥
नउ दरवाजे दसवा दुआरु ॥
इस शरीर को दो नेत्र, दो कान, दो नासिका, मुँह, गुदा एवं इन्दी रूपी नौ द्वार लगे हुए हैं और दसम द्वार गुप्त है।
ਬੁਝੁ ਰੇ ਗਿਆਨੀ ਏਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥੧॥
बुझु रे गिआनी एहु बीचारु ॥१॥
हे ज्ञानी ! इस विचार को समझो ॥ १॥
ਕਥਤਾ ਬਕਤਾ ਸੁਨਤਾ ਸੋਈ ॥
कथता बकता सुनता सोई ॥
भगवान स्वयं ही कथा करने वाला, बोलने वाला एवं सुनने वाला है।
ਆਪੁ ਬੀਚਾਰੇ ਸੁ ਗਿਆਨੀ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आपु बीचारे सु गिआनी होई ॥१॥ रहाउ ॥
वहीं व्यक्ति ज्ञानी होता है जो अपने आत्मिक जीवन को सोचता-समझता है॥ १॥ रहाउ ॥
ਦੇਹੀ ਮਾਟੀ ਬੋਲੈ ਪਉਣੁ ॥
देही माटी बोलै पउणु ॥
यह शरीर मिट्टी है और पवन उसमें बोलती है।
ਬੁਝੁ ਰੇ ਗਿਆਨੀ ਮੂਆ ਹੈ ਕਉਣੁ ॥
बुझु रे गिआनी मूआ है कउणु ॥
हे ज्ञानी ! इस तथ्य को समझो कि वह कोन हैं? जो प्राण त्याग गया है?
ਮੂਈ ਸੁਰਤਿ ਬਾਦੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
मूई सुरति बादु अहंकारु ॥
यह शरीर एवं विवाद पैदा करने वाला अहंकार मरे हैं।
ਓਹੁ ਨ ਮੂਆ ਜੋ ਦੇਖਣਹਾਰੁ ॥੨॥
ओहु न मूआ जो देखणहारु ॥२॥
भगवान का अंश आत्मा नहीं मरी जो दुनिया रूपी खेल देखने वाली है॥ २॥
ਜੈ ਕਾਰਣਿ ਤਟਿ ਤੀਰਥ ਜਾਹੀ ॥
जै कारणि तटि तीरथ जाही ॥
जिस नाम रूपी रत्न-पदार्थ के लिए तुम तीर्थों के तट पर जाते हो,
ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਘਟ ਹੀ ਮਾਹੀ ॥
रतन पदारथ घट ही माही ॥
वह नाम रूपी अमूल्य रत्न तेरे हृदय में ही विद्यमान है।
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੰਡਿਤੁ ਬਾਦੁ ਵਖਾਣੈ ॥
पड़ि पड़ि पंडितु बादु वखाणै ॥
पण्डित ग्रंथ पढ़-पढ़ कर परस्पर विवाद करते हैं
ਭੀਤਰਿ ਹੋਦੀ ਵਸਤੁ ਨ ਜਾਣੈ ॥੩॥
भीतरि होदी वसतु न जाणै ॥३॥
परन्तु वह उस नाम रूपी अमूल्य वस्तु को नहीं जानते जो उनके हृदय में ही है॥३॥
ਹਉ ਨ ਮੂਆ ਮੇਰੀ ਮੁਈ ਬਲਾਇ ॥
हउ न मूआ मेरी मुई बलाइ ॥
मैं नहीं मरा, अपितु मेरी विपदा लाने वाली अज्ञानता रूपी बला मरी है।
ਓਹੁ ਨ ਮੂਆ ਜੋ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ओहु न मूआ जो रहिआ समाइ ॥
वह आत्मा नहीं मरी, जो सब में समाई हुई है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥
कहु नानक गुरि ब्रहमु दिखाइआ ॥
हे नानक ! गुरु ने मुझे ब्रह्म के दर्शन करवा दिए हैं
ਮਰਤਾ ਜਾਤਾ ਨਦਰਿ ਨ ਆਇਆ ॥੪॥੪॥
मरता जाता नदरि न आइआ ॥४॥४॥
और अब मुझे कोई भी मरता एवं जन्म लेता दिखाई नहीं देता॥ ४॥ ४॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ਦਖਣੀ ॥
गउड़ी महला १ दखणी ॥
गउड़ी महला १ दखणी ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਬੂਝੈ ਮਾਨੈ ਨਾਉ ॥
सुणि सुणि बूझै मानै नाउ ॥
जो प्रभु-नाम को निरन्तर सुनकर उसे समझने का प्रयास करता, एवं उस पर आस्था रखता है।
ਤਾ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥
ता कै सद बलिहारै जाउ ॥
मैं हमेशा ही उस पर कुर्बान जाता हूँ,
ਆਪਿ ਭੁਲਾਏ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
आपि भुलाए ठउर न ठाउ ॥
हे प्रभु ! जिसे तू स्वयं विस्मृत कर देता है, उसे कहीं भी स्थान नहीं मिलता।
ਤੂੰ ਸਮਝਾਵਹਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਉ ॥੧॥
तूं समझावहि मेलि मिलाउ ॥१॥
तू ही जीव को ज्ञान देता है और फिर उसे गुरु से साक्षात्कार करवा कर अपने साथ मिला लेता है॥ १॥
ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਚਲੈ ਮੈ ਨਾਲਿ ॥
नामु मिलै चलै मै नालि ॥
मेरी यही कामना है कि मुझे नाम प्राप्त हो, जो मेरे साथ परलोक में जाएगा।
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਬਾਧੀ ਸਭ ਕਾਲਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बिनु नावै बाधी सभ कालि ॥१॥ रहाउ ॥
प्रभु के नाम के अलावा सारी दुनिया काल ने बंधन में डाली हुई है॥ १॥ रहाउ ॥
ਖੇਤੀ ਵਣਜੁ ਨਾਵੈ ਕੀ ਓਟ ॥
खेती वणजु नावै की ओट ॥
मेरी कृषि एवं व्यापार प्रभु के नाम के आश्रय में ही है।
ਪਾਪੁ ਪੁੰਨੁ ਬੀਜ ਕੀ ਪੋਟ ॥
पापु पुंनु बीज की पोट ॥
मनुष्य ने अपने सिर पर पाप एवं पुण्य रूपी कर्मों के बीज की पोटली उठाई हुई है।
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਜੀਅ ਮਹਿ ਚੋਟ ॥
कामु क्रोधु जीअ महि चोट ॥
काम, क्रोध प्राणी के अन्तर्मन में घाव हैं।
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਚਲੇ ਮਨਿ ਖੋਟ ॥੨॥
नामु विसारि चले मनि खोट ॥२॥
खोटे मन वाले प्रभु नाम को विस्मृत करके संसार से चले जाते हैं।॥ २॥
ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਕੀ ਸਾਚੀ ਸੀਖ ॥
साचे गुर की साची सीख ॥
सच्चे गुरु की शिक्षा सत्य है।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਚੁ ਪਰੀਖ ॥
तनु मनु सीतलु साचु परीख ॥
सत्य नाम का सही मूल्यांकन जानने से तन एवं मन शीतल हो जाते हैं। सतिगुरु की यही परख है कि
ਜਲ ਪੁਰਾਇਨਿ ਰਸ ਕਮਲ ਪਰੀਖ ॥
जल पुराइनि रस कमल परीख ॥
वह विकारों रूपी स्वादों से यूं निर्लिप्त रहता है जैसे कमल का फूल कीचड़ से निर्लिप्त रहता है।
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਮੀਠੇ ਰਸ ਈਖ ॥੩॥
सबदि रते मीठे रस ईख ॥३॥
प्रभु के नाम में मग्न हुआ वह गन्ने के रस की भाँति मीठा है॥ ३॥
ਹੁਕਮਿ ਸੰਜੋਗੀ ਗੜਿ ਦਸ ਦੁਆਰ ॥
हुकमि संजोगी गड़ि दस दुआर ॥
यह दस द्वारों वाला शरीर रूपी किला परमात्मा के हुक्म में बनाया गया है।
ਪੰਚ ਵਸਹਿ ਮਿਲਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
पंच वसहि मिलि जोति अपार ॥
इसमें अपार प्रभु की ज्योति के साथ मिलकर पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ रहती हैं।
ਆਪਿ ਤੁਲੈ ਆਪੇ ਵਣਜਾਰ ॥
आपि तुलै आपे वणजार ॥
परमात्मा स्वयं ही व्यापारी है और स्वयं ही तुलने वाला सौदा है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰਣਹਾਰ ॥੪॥੫॥
नानक नामि सवारणहार ॥४॥५॥
हे नानक ! परमात्मा का नाम ही जीव का जीवन सुन्दर बनाने वाला है॥४ ॥५ ॥
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
गउड़ी महला १ ॥
गउड़ी महला १ ॥
ਜਾਤੋ ਜਾਇ ਕਹਾ ਤੇ ਆਵੈ ॥
जातो जाइ कहा ते आवै ॥
क्या यह जाना जा सकता है कि आत्मा कहाँ से आई है?
ਕਹ ਉਪਜੈ ਕਹ ਜਾਇ ਸਮਾਵੈ ॥
कह उपजै कह जाइ समावै ॥
वह कहाँ से उत्पन्न हुई है और वह कहाँ जाकर समा जाती है ?
ਕਿਉ ਬਾਧਿਓ ਕਿਉ ਮੁਕਤੀ ਪਾਵੈ ॥
किउ बाधिओ किउ मुकती पावै ॥
वह किस तरह मोह-माया के बंधनों में फंस जाती है और कैसे संधनों से मुक्ति प्राप्त करती है ?
ਕਿਉ ਅਬਿਨਾਸੀ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥੧॥
किउ अबिनासी सहजि समावै ॥१॥
वह किस तरह सहज ही अविनाशी प्रभु में समा जाती है॥ १॥
ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ॥
नामु रिदै अम्रितु मुखि नामु ॥
जिसके हृदय में परमात्मा का नाम निवास करता है और मुँह से भी अमृत-नाम उच्चरित होता है।
ਨਰਹਰ ਨਾਮੁ ਨਰਹਰ ਨਿਹਕਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नरहर नामु नरहर निहकामु ॥१॥ रहाउ ॥
वह प्रभुः का अमृत नाम निष्काम होकर जपता रहता है और इच्छा रहित हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥
ਸਹਜੇ ਆਵੈ ਸਹਜੇ ਜਾਇ ॥
सहजे आवै सहजे जाइ ॥
मनुष्य सहज ही इस दुनिया में आता है और सहज ही दुनिया से चला जाता है अर्थात् वह सहज ही जन्मता-मरता रहता है।
ਮਨ ਤੇ ਉਪਜੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥
मन ते उपजै मन माहि समाइ ॥
मन (की तृष्णाओं) से वह उत्पन्न हुआ है और मन (की तृष्णाओं) में ही वह समा जाता है।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੁਕਤੋ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇ ॥
गुरमुखि मुकतो बंधु न पाइ ॥
गुरमुख मोह-माया के बंधनों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है और वह सांसारिक बंधनों में नहीं पड़ता।
ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ਛੁਟੈ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥੨॥
सबदु बीचारि छुटै हरि नाइ ॥२॥
वह शब्द का चिन्तन करता है और प्रभु-नाम द्वारा मुक्त हो जाता है॥ २॥
ਤਰਵਰ ਪੰਖੀ ਬਹੁ ਨਿਸਿ ਬਾਸੁ ॥
तरवर पंखी बहु निसि बासु ॥
बहुत सारे पक्षी रात्रिकाल को पेड़ पर आकर निवास करते हैं।
ਸੁਖ ਦੁਖੀਆ ਮਨਿ ਮੋਹ ਵਿਣਾਸੁ ॥
सुख दुखीआ मनि मोह विणासु ॥
कई सुखी हैं और कई दुखी हैं। मन के मोह कारण वह सारे नाश हो जाते हैं।
ਸਾਝ ਬਿਹਾਗ ਤਕਹਿ ਆਗਾਸੁ ॥
साझ बिहाग तकहि आगासु ॥
जब रात्रेि बीतती है और सूर्योदय होता है, वह आकाश की ओर देखते हैं।
ਦਹ ਦਿਸਿ ਧਾਵਹਿ ਕਰਮਿ ਲਿਖਿਆਸੁ ॥੩॥
दह दिसि धावहि करमि लिखिआसु ॥३॥
विधाता की विधि अनुसार कर्मों के कारण वे दस दिशाओं में उड़ जाते हैं।॥ ३॥