Hindi Page 257

ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟੈ ਜਮ ਪੰਥ ਕੀ ਜਾਸੁ ਬਸੈ ਮਨਿ ਨਾਉ ॥
त्रास मिटै जम पंथ की जासु बसै मनि नाउ ॥
जिसके हृदय में नाम निवास करता है, उसको मृत्यु का मार्ग एवं भय नहीं सताता।

ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ਮਤਿ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸ ਮਹਲੀ ਪਾਵਹਿ ਠਾਉ ॥
गति पावहि मति होइ प्रगास महली पावहि ठाउ ॥
वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है और उसकी मति उज्जवल हो जाती है और उसको स्वामी के आत्मस्वरूप में निवास मिल जाता है।

ਤਾਹੂ ਸੰਗਿ ਨ ਧਨੁ ਚਲੈ ਗ੍ਰਿਹ ਜੋਬਨ ਨਹ ਰਾਜ ॥
ताहू संगि न धनु चलै ग्रिह जोबन नह राज ॥
अन्तकाल जीव के साथ न ही धन साथ जाता है, न ही घर, जवानी एवं राज्य साथ जाता है।

ਸੰਤਸੰਗਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹਹੁ ਇਹੈ ਤੁਹਾਰੈ ਕਾਜ ॥
संतसंगि सिमरत रहहु इहै तुहारै काज ॥
हे जीव ! संतों की संगति में ईश्वर का भजन करता रह, केवल वही परलोक में तेरे काम आएगा।

ਤਾਤਾ ਕਛੂ ਨ ਹੋਈ ਹੈ ਜਉ ਤਾਪ ਨਿਵਾਰੈ ਆਪ ॥
ताता कछू न होई है जउ ताप निवारै आप ॥
जब ईश्वर स्वयं तेरे ताप का निवारण करेगा तो तुझे निश्चित ही कोई जलन नहीं होगी।

ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ਨਾਨਕ ਹਮਹਿ ਆਪਹਿ ਮਾਈ ਬਾਪ ॥੩੨॥
प्रतिपालै नानक हमहि आपहि माई बाप ॥३२॥
हे नानक ! ईश्वर स्वयं ही हमारा पालन-पोषण करता है, वह हमारी माता एवं पिता है।॥ ३२ ॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥

ਥਾਕੇ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਘਾਲਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਲਾਥ ॥
थाके बहु बिधि घालते त्रिपति न त्रिसना लाथ ॥
स्वेच्छाचारी जीव अनेक विधियों से परिश्रम करके हार-थक गए हैं। उनकी तृप्ति नहीं हुई और न ही उनकी तृष्णा मिटी है।

ਸੰਚਿ ਸੰਚਿ ਸਾਕਤ ਮੂਏ ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਨ ਸਾਥ ॥੧॥
संचि संचि साकत मूए नानक माइआ न साथ ॥१॥
हे नानक ! शाक्त जीव धन संचित करते-करते मर जाते हैं परन्तु धन-दौलत उनके साथ नहीं जाता ॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਥਥਾ ਥਿਰੁ ਕੋਊ ਨਹੀ ਕਾਇ ਪਸਾਰਹੁ ਪਾਵ ॥
थथा थिरु कोऊ नही काइ पसारहु पाव ॥
थ- कोई भी जीव स्थिर नहीं, तुम क्यों अपने चरण फैलाते हो ?

ਅਨਿਕ ਬੰਚ ਬਲ ਛਲ ਕਰਹੁ ਮਾਇਆ ਏਕ ਉਪਾਵ ॥
अनिक बंच बल छल करहु माइआ एक उपाव ॥
केवल धन के प्रयास की खातिर तुम बहुत धोखे एवं छल-कपट करते हो।

ਥੈਲੀ ਸੰਚਹੁ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰਹੁ ਥਾਕਿ ਪਰਹੁ ਗਾਵਾਰ ॥
थैली संचहु स्रमु करहु थाकि परहु गावार ॥
हे मूर्ख ! तुम थैली भरने के लिए परिश्रम करते हो और फिर हार-थक कर गिर जाते हो।

ਮਨ ਕੈ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਅੰਤੇ ਅਉਸਰ ਬਾਰ ॥
मन कै कामि न आवई अंते अउसर बार ॥
यह अन्तिम अवसर तेरी आत्मा के किसी काम नहीं आना।

ਥਿਤਿ ਪਾਵਹੁ ਗੋਬਿਦ ਭਜਹੁ ਸੰਤਹ ਕੀ ਸਿਖ ਲੇਹੁ ॥
थिति पावहु गोबिद भजहु संतह की सिख लेहु ॥
इसलिए गोविन्द का भजन करने एवं संतों के उपदेश का अनुसरण करने से तुझे स्थिरता प्राप्त हो जाएगी।

ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਹੁ ਸਦ ਏਕ ਸਿਉ ਇਆ ਸਾਚਾ ਅਸਨੇਹੁ ॥
प्रीति करहु सद एक सिउ इआ साचा असनेहु ॥
सदैव एक ईश्वर से प्रेम करो। यही (तेरा) सच्चा प्रेम है।

ਕਾਰਨ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨੋ ਸਭ ਬਿਧਿ ਏਕੈ ਹਾਥ ॥
कारन करन करावनो सभ बिधि एकै हाथ ॥
ईश्वर सब कुछ करने वाला एवं जीव से कराने वाला है। समस्त युक्तियों केवल उसके वश में है।

ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤੁ ਤਿਤੁ ਲਗਹਿ ਨਾਨਕ ਜੰਤ ਅਨਾਥ ॥੩੩॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगहि नानक जंत अनाथ ॥३३॥
नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जीव तो असहाय एवं विवश हैं, चूंकि जीवों को तुम जहां-जहां भी लगा देते हो, वे उस तरफ ही लग जाते हैं ॥३३॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥

ਦਾਸਹ ਏਕੁ ਨਿਹਾਰਿਆ ਸਭੁ ਕਛੁ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
दासह एकु निहारिआ सभु कछु देवनहार ॥
उसके दासों ने एक ईश्वर को देखा है, जो सब कुछ देने वाला है।

ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹਹਿ ਨਾਨਕ ਦਰਸ ਅਧਾਰ ॥੧॥
सासि सासि सिमरत रहहि नानक दरस अधार ॥१॥
हे नानक ! वह श्वाश-श्वाश से ईश्वर का चिन्तन करते जाते हैं और उसके दर्शन ही उनके जीवन का आघार है॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥

ਦਦਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਸਭ ਕਉ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार ॥
द- एक परमात्मा ही वह दाता है जो समस्त जीवों को भोजन-पदार्थ देने वाला है।

ਦੇਂਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਅਗਨਤ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
देंदे तोटि न आवई अगनत भरे भंडार ॥
जीवों को देते वक्त उसकी देन में कोई कमी नहीं आती, क्योंकि उसके अक्षय भण्डार भरपूर हैं।

ਦੈਨਹਾਰੁ ਸਦ ਜੀਵਨਹਾਰਾ ॥
दैनहारु सद जीवनहारा ॥
वह देने वाला सदैव जीवित है।

ਮਨ ਮੂਰਖ ਕਿਉ ਤਾਹਿ ਬਿਸਾਰਾ ॥
मन मूरख किउ ताहि बिसारा ॥
हे मूर्ख मन ! तू उस देने वाले दाता को क्यों भूल रहा है ?

ਦੋਸੁ ਨਹੀ ਕਾਹੂ ਕਉ ਮੀਤਾ ॥
दोसु नही काहू कउ मीता ॥
हे मेरे मित्र ! इसमें किसी का दोष नहीं।

ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਬੰਧੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਤਾ ॥
माइआ मोह बंधु प्रभि कीता ॥
क्योंकि माया-मोह के बन्धन ईश्वर ने ही रचे हैं।

ਦਰਦ ਨਿਵਾਰਹਿ ਜਾ ਕੇ ਆਪੇ ॥
दरद निवारहि जा के आपे ॥
हे नानक ! जिस गुरमुख का वह स्वयं दुःख दूर कर देता है,

ਨਾਨਕ ਤੇ ਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਧ੍ਰਾਪੇ ॥੩੪॥
नानक ते ते गुरमुखि ध्रापे ॥३४॥
वह कृतार्थ हो जाता है।॥ ३४॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक।

ਧਰ ਜੀਅਰੇ ਇਕ ਟੇਕ ਤੂ ਲਾਹਿ ਬਿਡਾਨੀ ਆਸ ॥
धर जीअरे इक टेक तू लाहि बिडानी आस ॥
हे मेरे मन ! तू एक ईश्वर का सहारा ले तथा किसी दूसरे की आशा को त्याग दे।

ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੧॥
नानक नामु धिआईऐ कारजु आवै रासि ॥१॥
हे नानक ! भगवान के नाम का ध्यान करने से समस्त कार्य संवर जाते हैं॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਧਧਾ ਧਾਵਤ ਤਉ ਮਿਟੈ ਸੰਤਸੰਗਿ ਹੋਇ ਬਾਸੁ ॥
धधा धावत तउ मिटै संतसंगि होइ बासु ॥
ध- यदि संतों-महापुरुषों की संगति में निवास हो जाए तो मन की भटकना मिट जाती है।

ਧੁਰ ਤੇ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਆਪਿ ਤਉ ਹੋਇ ਮਨਹਿ ਪਰਗਾਸੁ ॥
धुर ते किरपा करहु आपि तउ होइ मनहि परगासु ॥
यदि ईश्वर स्वयं आदि से ही कृपा करे तो मन में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है।

ਧਨੁ ਸਾਚਾ ਤੇਊ ਸਚ ਸਾਹਾ ॥
धनु साचा तेऊ सच साहा ॥
जिनके पास सच्चा नाम-धन है, वही सच्चे साहूकार हैं।

ਹਰਿ ਹਰਿ ਪੂੰਜੀ ਨਾਮ ਬਿਸਾਹਾ ॥
हरि हरि पूंजी नाम बिसाहा ॥
हरि-परमेश्वर का नाम उनकी जीवन-पूंजी होती है और वह उसके नाम का व्यापार करते रहते हैं।

ਧੀਰਜੁ ਜਸੁ ਸੋਭਾ ਤਿਹ ਬਨਿਆ ॥
धीरजु जसु सोभा तिह बनिआ ॥
वही आदमी धैर्यवान होता है और उसे बड़ा यश एवं शोभा मिलती है।

ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸ੍ਰਵਨ ਜਿਹ ਸੁਨਿਆ ॥
हरि हरि नामु स्रवन जिह सुनिआ ॥
जो आदमी अपने कानों से हरि-परमेश्वर का नाम सुनता रहता है,

ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਹ ਘਟਿ ਰਹੇ ਸਮਾਈ ॥
गुरमुखि जिह घटि रहे समाई ॥
हे नानक ! जिस गुरमुख के अन्तर्मन में भगवान का नाम निवास कर लेता है,

ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਜਨ ਮਿਲੀ ਵਡਾਈ ॥੩੫॥
नानक तिह जन मिली वडाई ॥३५॥
उसे ही दुनिया में ख्याति प्राप्त होती है॥ ३५॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक ॥

ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਾਮੁ ਜਪੁ ਜਪਿਆ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥
नानक नामु नामु जपु जपिआ अंतरि बाहरि रंगि ॥
हे नानक ! जो व्यक्ति भीतर एवं बाहर एकाग्रचित होकर ईश्वर के नाम का जाप करता रहता है,

ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਉਪਦੇਸਿਆ ਨਰਕੁ ਨਾਹਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ॥੧॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नरकु नाहि साधसंगि ॥१॥
पूर्ण गुरु से उपदेश प्राप्त करता है और संतों की सभा में शामिल होता है, ऐसा व्यक्ति कभी नरक में नहीं जाता ॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥

ਨੰਨਾ ਨਰਕਿ ਪਰਹਿ ਤੇ ਨਾਹੀ ॥
नंना नरकि परहि ते नाही ॥
न- वह नरक में नहीं पड़ता,

ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਬਸਾਹੀ ॥
जा कै मनि तनि नामु बसाही ॥
जिस व्यक्ति के मन एवं तन में भगवान का नाम निवास करता है।

ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਜਪਤੇ ॥
नामु निधानु गुरमुखि जो जपते ॥
जो गुरमुख नाम-भण्डार का भजन करते रहते हैं,

ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਨਾ ਓਇ ਖਪਤੇ ॥
बिखु माइआ महि ना ओइ खपते ॥
वे माया के विष में नष्ट नहीं होते।

ਨੰਨਾਕਾਰੁ ਨ ਹੋਤਾ ਤਾ ਕਹੁ ॥
नंनाकारु न होता ता कहु ॥
उनके जीवन-मार्ग में कोई बाधा नहीं आती,

ਨਾਮੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਜਾ ਕਹੁ ॥
नामु मंत्रु गुरि दीनो जा कहु ॥
जिन जिज्ञासुओं को गुरु ने नाम-मंत्र दिया है।

error: Content is protected !!