ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਜੋ ਜੀਆ ਅੰਦਰਿ ਵਰਤੈ ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥
हे विश्व के रचयिता प्रभु ! तुम सबकुछ जानते हो, जो कुछ जीवों के हृदय में होता है।
ਤੂ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਅਗਣਤੁ ਹੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਵਿਚਿ ਗਣਤੈ ॥
तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥
समूचा जगत् ही इस चिन्तना में है; हे परमात्मा ! एक तुम इससे परे हो
ਸਭੁ ਕੀਤਾ ਤੇਰਾ ਵਰਤਦਾ ਸਭ ਤੇਰੀ ਬਣਤੈ ॥
सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥
“(क्योंकि) जो कुछ हो रहा है, सब तेरा किया हुआ हो रहा है, सारी (सृष्टि की) रचना ही तेरी बनाई हुई है।
ਤੂ ਘਟਿ ਘਟਿ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬ ਚਲਤੈ ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥
हे सच्चे मालिक ! तुम कण-कण में सर्वव्यापक हो, तेरे खेल अदभुत हैं।
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੇ ਸੁ ਹਰਿ ਮਿਲੇ ਨਾਹੀ ਕਿਸੈ ਪਰਤੈ ॥੨੪॥
सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥२४॥
जो मनुष्य सतिगुरु से मिला है, उसे ही भगवान प्राप्त हुआ है और किसी ने उन्हें भगवान की ओर से नहीं हटाया॥ २४॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੪ ॥
सलोकु मः ४ ॥
श्लोक महला ४॥
ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਰਖੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਈਐ ਚਿਤੁ ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥
यह चंचल मन स्थिर करके वश में रखना चाहिए और गुरु के माध्यम से अपना चित परमात्मा में लगाना चाहिए।
ਕਿਉ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਵਿਸਾਰੀਐ ਬਹਦਿਆ ਉਠਦਿਆ ਨਿਤ ॥
किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥
उठते-बैठते अपनी हरेक श्वास एवं ग्रास से हम क्यों उस प्रभु को कभी विस्मृत करें ?
ਮਰਣ ਜੀਵਣ ਕੀ ਚਿੰਤਾ ਗਈ ਇਹੁ ਜੀਅੜਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਵਸਿ ॥
मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥
अब जबकि यह आत्मा प्रभु-परमेश्वर के वश में कर दी है, इसलिए मेरी जन्म-मरण की चिन्ता मिट गई है।
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਖੁ ਤੂ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਬਖਸਿ ॥੧॥
जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥१॥
(हे प्रभु !) जैसे तुझे अच्छा लगे वैसे (मुझे) नानक को नाम की देन प्रदान कर चूंकि नाम ही मन की चिन्ता को मिटा सकता है। १॥
ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅਹੰਕਾਰੀ ਮਹਲੁ ਨ ਜਾਣੈ ਖਿਨੁ ਆਗੈ ਖਿਨੁ ਪੀਛੈ ॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
अहंकार में मस्त हुआ मनमुख इन्सान सतिगुरु के महल (अर्थात् सत्संग) को नहीं पहचानता और हर वक्त दुविधा में रहता है।
ਸਦਾ ਬੁਲਾਈਐ ਮਹਲਿ ਨ ਆਵੈ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦਰਗਹ ਸੀਝੈ ॥
सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥
हमेशा ही बुलाए जाने के बावजूद वह सतिगुरु के महल (सत्संग) में उपस्थित नहीं होता। प्रभु के दरबार में वह किस तरह स्वीकृत होगा ?
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਹਲੁ ਵਿਰਲਾ ਜਾਣੈ ਸਦਾ ਰਹੈ ਕਰ ਜੋੜਿ ॥
सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥
कोई विरला पुरुष ही सतिगुरु के महल (सत्संग) को जानता है और जो जानता है, वह सदा हाथ जोड़कर खड़ा रहता है।
ਆਪਣੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਨਾਨਕ ਲਏ ਬਹੋੜਿ ॥੨॥
आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥२॥
हे नानक ! यदि मेरा हरि अपनी कृपा करे तो वह मनुष्य को (मनमुखता से) मोड़ लेता है॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी।
ਸਾ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ ਸਫਲ ਹੈ ਜਿਤੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਨੁ ਮੰਨੇ ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥
जिस सेवा से सतिगुरु का मन प्रसन्न हो जाए, वहीं की हुई सेवा फलदायक है।
ਜਾ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਨੁ ਮੰਨਿਆ ਤਾ ਪਾਪ ਕਸੰਮਲ ਭੰਨੇ ॥
जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसमल भंने ॥
“(क्योंकि) जब सतिगुरु का मन प्रसन्न हो जाए, तभी पाप-विकार भी दूर हो जाते हैं।
ਉਪਦੇਸੁ ਜਿ ਦਿਤਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੋ ਸੁਣਿਆ ਸਿਖੀ ਕੰਨੇ ॥
उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥
सतिगुरु जो उपदेश सिक्खों को देते हैं, वे ध्यानपूर्वक उसे सुनते हैं।
ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨਿਆ ਤਿਨ ਚੜੀ ਚਵਗਣਿ ਵੰਨੇ ॥
जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥
जो सिक्ख सतिगुरु की इच्छा को मानते हैं, उन्हें चौगुनी रंगत चढ़ जाती है।
ਇਹ ਚਾਲ ਨਿਰਾਲੀ ਗੁਰਮੁਖੀ ਗੁਰ ਦੀਖਿਆ ਸੁਣਿ ਮਨੁ ਭਿੰਨੇ ॥੨੫॥
इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥२५॥
गुरमुखों का यह अदभुत जीवन-आचरण है कि गुरु का उपदेश सुनकर उनका मन प्रसन्न हो जाता है॥ २५॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
सलोकु मः ३ ॥
श्लोक महला ३॥
ਜਿਨਿ ਗੁਰੁ ਗੋਪਿਆ ਆਪਣਾ ਤਿਸੁ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
जिस व्यक्ति ने अपने गुरु की निंदा की है, उसे कहीं भी स्थान नहीं मिलता।
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਦੋਵੈ ਗਏ ਦਰਗਹ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥
हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥
उसका लोक एवं परलोक दोनों व्यर्थ हो जाते हैं और प्रभु के दरबार में भी उसे स्थान नहीं मिलता।
ਓਹ ਵੇਲਾ ਹਥਿ ਨ ਆਵਈ ਫਿਰਿ ਸਤਿਗੁਰ ਲਗਹਿ ਪਾਇ ॥
ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥
सतिगुरु के चरण-स्पर्श का यह सुनहरी अवसर फिर से प्राप्त नहीं होता। (क्योंकि)
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਗਣਤੈ ਘੁਸੀਐ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਵਿਹਾਇ ॥
सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥
सतिगुरु की निंदा करने में एक बार यदि पथभ्रष्ट हो जाए तो बिल्कुल दुखों में ही जीवन व्यतीत होता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਵੈਰੁ ਹੈ ਆਪੇ ਲਏ ਜਿਸੁ ਲਾਇ ॥
सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥
महापुरुष सतिगुरु की किसी से शत्रुता नहीं है। जिस किसी को वह चाहता है, वह अपने साथ मिला लेता है।
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨੁ ਜਿਨਾ ਵੇਖਾਲਿਓਨੁ ਤਿਨਾ ਦਰਗਹ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੧॥
नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥१॥
हे नानक ! सत्य के दरबार में गुरु उनकी मुक्ति करवा देता है, जिन्हें वह प्रभु के दर्शन करवाता है॥ १॥
ਮਃ ੩ ॥
मः ३ ॥
महला ३॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅਗਿਆਨੁ ਦੁਰਮਤਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
स्वेच्छाचारी पुरुष अज्ञानी, खोटी बुद्धि वाला एवं अहंकारी होता है,
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਜੂਐ ਮਤਿ ਹਾਰੀ ॥
अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥
उसके मन में क्रोध ही होता है और वह जुए में बुद्धि गंवा देता है।
ਕੂੜੁ ਕੁਸਤੁ ਓਹੁ ਪਾਪ ਕਮਾਵੈ ॥
कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥
वह छल-कपट तथा पाप के काम करता है (इसलिए)
ਕਿਆ ਓਹੁ ਸੁਣੈ ਕਿਆ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵੈ ॥
किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥
वह क्या सुन सकता है और दूसरों को क्या बता सकता है ?
ਅੰਨਾ ਬੋਲਾ ਖੁਇ ਉਝੜਿ ਪਾਇ ॥
अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥
वह अन्धा और बहरा मनुष्य भटक गया है
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧਾ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥
और जन्मता-मरता रहता है।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਥਾਇ ਨ ਪਾਇ ॥
बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥
सतिगुरु से साक्षात्कार हुए बिना वह परलोक में स्वीकार नहीं होता।
ਨਾਨਕ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਕਮਾਇ ॥੨॥
नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥२॥
हे नानक ! पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार जो उनकी किस्मत में लिखा होता है, वहीं उसे मिलता है॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी।
ਜਿਨ ਕੇ ਚਿਤ ਕਠੋਰ ਹਹਿ ਸੇ ਬਹਹਿ ਨ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥
जिनके ह्रदय कठोर होते हैं, वे सतिगुरु के पास नहीं बैठते।
ਓਥੈ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਕੂੜਿਆਰਾ ਚਿਤ ਉਦਾਸਿ ॥
ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥
वहाँ सत्य प्रवृत्त हो रहा है और झूठे लोग मानसिक तौर पर उदास रहते हैं।
ਓਇ ਵਲੁ ਛਲੁ ਕਰਿ ਝਤਿ ਕਢਦੇ ਫਿਰਿ ਜਾਇ ਬਹਹਿ ਕੂੜਿਆਰਾ ਪਾਸਿ ॥
ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥
वे छल-कपट करके समय बिताते हैं और दुबारा जाकर झूठों के पास बैठ जाते हैं।
ਵਿਚਿ ਸਚੇ ਕੂੜੁ ਨ ਗਡਈ ਮਨਿ ਵੇਖਹੁ ਕੋ ਨਿਰਜਾਸਿ ॥
विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥
सत्य में झूठ नहीं मिलता, हे मेरे मन ! तू निर्णय करके देख ले।
ਕੂੜਿਆਰ ਕੂੜਿਆਰੀ ਜਾਇ ਰਲੇ ਸਚਿਆਰ ਸਿਖ ਬੈਠੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥੨੬॥
कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥२६॥
झूठे जाकर झूठों से मिल जाते हैं तथा सत्यवादी सिक्ख सतिगुरु के पास बैठते हैं।॥ २६॥