Hindi Page 329

ਮਨਹਿ ਮਾਰਿ ਕਵਨ ਸਿਧਿ ਥਾਪੀ ॥੧॥
मनहि मारि कवन सिधि थापी ॥१॥
अपने मन को मार कर कौन सिद्ध बना है ? ॥ १॥

ਕਵਨੁ ਸੁ ਮੁਨਿ ਜੋ ਮਨੁ ਮਾਰੈ ॥
कवनु सु मुनि जो मनु मारै ॥
वह कौन-सा मुनि है, जिसने अपने मन को मार दिया है?

ਮਨ ਕਉ ਮਾਰਿ ਕਹਹੁ ਕਿਸੁ ਤਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मन कउ मारि कहहु किसु तारै ॥१॥ रहाउ ॥
कहो, मन को नष्ट करके वह किसका कल्याण करता है ? ॥ १॥ रहाउ॥

ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਬੋਲੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
मन अंतरि बोलै सभु कोई ॥
मन के द्वारा ही हरेक मनुष्य बोलता है।

ਮਨ ਮਾਰੇ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੨॥
मन मारे बिनु भगति न होई ॥२॥
मन को मारे बिना प्रभु की भक्ति नहीं होती॥ २॥

ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਜੋ ਜਾਨੈ ਭੇਉ ॥
कहु कबीर जो जानै भेउ ॥
हे कबीर ! जो पुरुष इस भेद को समझता है,

ਮਨੁ ਮਧੁਸੂਦਨੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਦੇਉ ॥੩॥੨੮॥
मनु मधुसूदनु त्रिभवण देउ ॥३॥२८॥
वह अपने मन में ही तीन लोकों के स्वामी मधुसूदन के दर्शन कर लेता है॥ ३॥ २८

ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥

ਓਇ ਜੁ ਦੀਸਹਿ ਅੰਬਰਿ ਤਾਰੇ ॥
ओइ जु दीसहि अंबरि तारे ॥
वे झिलमिलाते तारे जो अन्तरिक्ष में नजर आ रहे हैं,

ਕਿਨਿ ਓਇ ਚੀਤੇ ਚੀਤਨਹਾਰੇ ॥੧॥
किनि ओइ चीते चीतनहारे ॥१॥
किस चित्रकार ने चित्रित किए हैं ? ॥ १॥

ਕਹੁ ਰੇ ਪੰਡਿਤ ਅੰਬਰੁ ਕਾ ਸਿਉ ਲਾਗਾ ॥
कहु रे पंडित अंबरु का सिउ लागा ॥
हे पण्डित ! बताओं, अन्तरिक्ष केिसके सहारे कायम है।

ਬੂਝੈ ਬੂਝਨਹਾਰੁ ਸਭਾਗਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बूझै बूझनहारु सभागा ॥१॥ रहाउ ॥
इस बात को जानने वाला कोई भाग्यवान ही है॥ १॥ रहाउ॥

ਸੂਰਜ ਚੰਦੁ ਕਰਹਿ ਉਜੀਆਰਾ ॥
सूरज चंदु करहि उजीआरा ॥
सूर्य एवं चन्द्रमा (दुनिया में) उजाला करते हैं।

ਸਭ ਮਹਿ ਪਸਰਿਆ ਬ੍ਰਹਮ ਪਸਾਰਾ ॥੨॥
सभ महि पसरिआ ब्रहम पसारा ॥२॥
इस सृष्टि में ईश्वर की ज्योति का ही प्रकाश फैला हुआ है।॥ २॥

ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਜਾਨੈਗਾ ਸੋਇ ॥
कहु कबीर जानैगा सोइ ॥
हे कबीर ! (इस रहस्य को) केवल वही मनुष्य समझेगा,

ਹਿਰਦੈ ਰਾਮੁ ਮੁਖਿ ਰਾਮੈ ਹੋਇ ॥੩॥੨੯॥
हिरदै रामु मुखि रामै होइ ॥३॥२९॥
जिसके हृदय में राम है और मुँह में भी केवल राम ही है॥ ३॥ २६॥

ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥

ਬੇਦ ਕੀ ਪੁਤ੍ਰੀ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਭਾਈ ॥
बेद की पुत्री सिम्रिति भाई ॥
हे भाई ! यह स्मृति वेदों की पुत्री है।

ਸਾਂਕਲ ਜੇਵਰੀ ਲੈ ਹੈ ਆਈ ॥੧॥
सांकल जेवरी लै है आई ॥१॥
वह मनुष्यों हेतु (मानों कर्मकाण्ड की) जंजीरें एवं रस्सियों लेकर आई है॥ १॥

ਆਪਨ ਨਗਰੁ ਆਪ ਤੇ ਬਾਧਿਆ ॥
आपन नगरु आप ते बाधिआ ॥
इसने स्वयं ही अपने नगर में श्रद्धालु कैद कर लिए हैं।

ਮੋਹ ਕੈ ਫਾਧਿ ਕਾਲ ਸਰੁ ਸਾਂਧਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मोह कै फाधि काल सरु सांधिआ ॥१॥ रहाउ ॥
इसने मोह की फांसी में फॅसाकर मृत्यु का तीर खिंचा हुआ है।॥ १॥ रहाउ॥

ਕਟੀ ਨ ਕਟੈ ਤੂਟਿ ਨਹ ਜਾਈ ॥
कटी न कटै तूटि नह जाई ॥
यह स्मृति-रूपी रस्सी श्रद्धालुओं से काटने पर भी नहीं काटी जा सकती और न ही यह टूटती है।

ਸਾ ਸਾਪਨਿ ਹੋਇ ਜਗ ਕਉ ਖਾਈ ॥੨॥
सा सापनि होइ जग कउ खाई ॥२॥
यह नागिन बनकर दुनिया को निगल रही है॥ २॥

ਹਮ ਦੇਖਤ ਜਿਨਿ ਸਭੁ ਜਗੁ ਲੂਟਿਆ ॥
हम देखत जिनि सभु जगु लूटिआ ॥
हे कबीर ! हमारी ऑखों के समक्ष देखते ही देखते इस स्मृति ने सारी दुनिया को लूट लिया है,

ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਮੈ ਰਾਮ ਕਹਿ ਛੂਟਿਆ ॥੩॥੩੦॥
कहु कबीर मै राम कहि छूटिआ ॥३॥३०॥
लेकिन मैं राम का सिमरन करके इससे छूट गया हूँ॥ ३॥ ३०॥

ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥

ਦੇਇ ਮੁਹਾਰ ਲਗਾਮੁ ਪਹਿਰਾਵਉ ॥
देइ मुहार लगामु पहिरावउ ॥
में अपने मन रूपी घोड़े को प्रशंसा-निंदा से वर्जित करने की पूंजी देकर प्यार की लगन की लगाम डालता हूँ

ਸਗਲ ਤ ਜੀਨੁ ਗਗਨ ਦਉਰਾਵਉ ॥੧॥
सगल त जीनु गगन दउरावउ ॥१॥
और ईश्वर को हर जगह समझना -यह कार्ती डालकर मन को भगवान के देश की उड़ान भरता हूँ॥ १॥

ਅਪਨੈ ਬੀਚਾਰਿ ਅਸਵਾਰੀ ਕੀਜੈ ॥
अपनै बीचारि असवारी कीजै ॥
अपने स्वरूप के ज्ञान-रूपी घोड़े पर सवार हो जाओ तथा

ਸਹਜ ਕੈ ਪਾਵੜੈ ਪਗੁ ਧਰਿ ਲੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सहज कै पावड़ै पगु धरि लीजै ॥१॥ रहाउ ॥
बुद्धि-रूपी चरण को सहज के रकाब में रखो॥ १॥ रहाउ॥

ਚਲੁ ਰੇ ਬੈਕੁੰਠ ਤੁਝਹਿ ਲੇ ਤਾਰਉ ॥
चलु रे बैकुंठ तुझहि ले तारउ ॥
हे मन रूपी घोड़े ! चल, तुझे स्वर्ग की सैर कराऊँ,

ਹਿਚਹਿ ਤ ਪ੍ਰੇਮ ਕੈ ਚਾਬੁਕ ਮਾਰਉ ॥੨॥
हिचहि त प्रेम कै चाबुक मारउ ॥२॥
यदि जिद्द करोगे तो मैं तुझे प्रेम की चाबुक मारूंगा॥ २॥

ਕਹਤ ਕਬੀਰ ਭਲੇ ਅਸਵਾਰਾ ॥
कहत कबीर भले असवारा ॥
हे कबीर ! ऐसे चतुर सवार,

ਬੇਦ ਕਤੇਬ ਤੇ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਰਾ ॥੩॥੩੧॥
बेद कतेब ते रहहि निरारा ॥३॥३१॥
वेदों एवं कतेब से तटस्थ रहते हैं॥ ३॥ ३१ ॥

ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥

ਜਿਹ ਮੁਖਿ ਪਾਂਚਉ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਖਾਏ ॥
जिह मुखि पांचउ अम्रित खाए ॥
जिस मुख से पाँचों ही अमृत पदार्थ खाए जाते थे,

ਤਿਹ ਮੁਖ ਦੇਖਤ ਲੂਕਟ ਲਾਏ ॥੧॥
तिह मुख देखत लूकट लाए ॥१॥
(मरणोपरांत) उस मुख को अपने सामने ही लकड़ी जलाकर लगा दी जाती है।॥ १॥

ਇਕੁ ਦੁਖੁ ਰਾਮ ਰਾਇ ਕਾਟਹੁ ਮੇਰਾ ॥
इकु दुखु राम राइ काटहु मेरा ॥
हे मेरे राम ! मेरा यह दुःख दूर कर दो ,

ਅਗਨਿ ਦਹੈ ਅਰੁ ਗਰਭ ਬਸੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अगनि दहै अरु गरभ बसेरा ॥१॥ रहाउ ॥
यह जो तृष्णाग्नि जलाती है तथा बार-बार गर्भ का वास है॥ १॥ रहाउ॥

ਕਾਇਆ ਬਿਗੂਤੀ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਭਾਤੀ ॥
काइआ बिगूती बहु बिधि भाती ॥
(मरणोपरांत) यह सुन्दर शरीर अनेकों ढंग एवं विधियों से खत्म किया जाता है।

ਕੋ ਜਾਰੇ ਕੋ ਗਡਿ ਲੇ ਮਾਟੀ ॥੨॥
को जारे को गडि ले माटी ॥२॥
कोई मनुष्य इसे अग्नि में जला देता है और कोई इसे मिट्टी में दफन कर देता है॥ २॥

ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਹਰਿ ਚਰਣ ਦਿਖਾਵਹੁ ॥
कहु कबीर हरि चरण दिखावहु ॥
कबीर जी कहते हैं कि हे भगवान ! मुझे अपने चरणों के दर्शन करवा दीजिए,

ਪਾਛੈ ਤੇ ਜਮੁ ਕਿਉ ਨ ਪਠਾਵਹੁ ॥੩॥੩੨॥
पाछै ते जमु किउ न पठावहु ॥३॥३२॥
तदुपरांत चाहे यमराज को ही भेज देना॥ ३॥ ३२॥

ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥

ਆਪੇ ਪਾਵਕੁ ਆਪੇ ਪਵਨਾ ॥
आपे पावकु आपे पवना ॥
भगवान स्वयं ही अग्नि है और स्वयं ही वायु है।

ਜਾਰੈ ਖਸਮੁ ਤ ਰਾਖੈ ਕਵਨਾ ॥੧॥
जारै खसमु त राखै कवना ॥१॥
यदि मालिक स्वयं ही (प्राणी को) जलाने लगे तो कौन रक्षा कर सकता है॥ १॥

ਰਾਮ ਜਪਤ ਤਨੁ ਜਰਿ ਕੀ ਨ ਜਾਇ ॥ ਰਾਮ ਨਾਮ ਚਿਤੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
राम जपत तनु जरि की न जाइ ॥ राम नाम चितु रहिआ समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
राम के नाम का जाप करते हुए चाहे नि:संदेह मेरा शरीर ही जल जाए? मेरा मन राम के नाम में मग्न रहता है॥ १॥ रहाउ॥

ਕਾ ਕੋ ਜਰੈ ਕਾਹਿ ਹੋਇ ਹਾਨਿ ॥
का को जरै काहि होइ हानि ॥
न किसी का कुछ जलता है, न किसी का कोई नुक्सान होता है,

ਨਟ ਵਟ ਖੇਲੈ ਸਾਰਿਗਪਾਨਿ ॥੨॥
नट वट खेलै सारिगपानि ॥२॥
परमेश्वर स्वयं ही सर्वत्र नटखट खेल कर रहा है॥ २ ॥

ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਅਖਰ ਦੁਇ ਭਾਖਿ ॥
कहु कबीर अखर दुइ भाखि ॥
हे कबीर ! तू (‘राम’ के) दो अक्षर उच्चरित कर,

ਹੋਇਗਾ ਖਸਮੁ ਤ ਲੇਇਗਾ ਰਾਖਿ ॥੩॥੩੩॥
होइगा खसमु त लेइगा राखि ॥३॥३३॥
यदि मेरा मालिक है तो मुझे भवसागर से बचा लेगा ॥ ३॥ ३३॥

ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੁਪਦੇ ॥
गउड़ी कबीर जी दुपदे ॥
गउड़ी कबीर जी दुपदे ॥

ਨਾ ਮੈ ਜੋਗ ਧਿਆਨ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ना मै जोग धिआन चितु लाइआ ॥
न ही मैंने योग विद्या की तरफ अपना ध्यान अथवा मन लगाया।

ਬਿਨੁ ਬੈਰਾਗ ਨ ਛੂਟਸਿ ਮਾਇਆ ॥੧॥
बिनु बैराग न छूटसि माइआ ॥१॥
फिर वैराग्य के बिना माया से मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १॥

ਕੈਸੇ ਜੀਵਨੁ ਹੋਇ ਹਮਾਰਾ ॥
कैसे जीवनु होइ हमारा ॥
मेरा जीवन कैसे व्यतीत होगा,

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