Hindi Page 451

ਕਰਿ ਸੇਵਹਿ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਭੁਖ ਜਾਇ ਲਹਿ ਮੇਰੀ ॥
करि सेवहि पूरा सतिगुरू भुख जाइ लहि मेरी ॥
अपने हाथों से वे पूर्ण सच्चे गुरु की सेवा करते हैं और उनकी अहंत्व की भूख दूर हो जाती है।

ਗੁਰਸਿਖਾ ਕੀ ਭੁਖ ਸਭ ਗਈ ਤਿਨ ਪਿਛੈ ਹੋਰ ਖਾਇ ਘਨੇਰੀ ॥
गुरसिखा की भुख सभ गई तिन पिछै होर खाइ घनेरी ॥
गुरु-सिक्खों की तमाम भूख दूर हो जाती है, उनकी संगति करके बहुत सारे लोग (नाम-स्मरण की) पेट-पूजा करते हैं।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪੁੰਨੁ ਬੀਜਿਆ ਫਿਰਿ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਹਰਿ ਪੁੰਨ ਕੇਰੀ ॥੩॥
जन नानक हरि पुंनु बीजिआ फिरि तोटि न आवै हरि पुंन केरी ॥३॥
नानक ने हरि के नाम का पुण्य बोया है और दोबारा हरि के नाम के पुण्य-फल में कमी नहीं आती ॥ ३॥

ਗੁਰਸਿਖਾ ਮਨਿ ਵਾਧਾਈਆ ਜਿਨ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਡਿਠਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
गुरसिखा मनि वाधाईआ जिन मेरा सतिगुरू डिठा राम राजे ॥
हे प्रभु ! गुरु के सिक्खों के मन में शुभकामनाएँ हैं, जिन्होंने मेरे सच्चे गुरु के दर्शन प्राप्त किए हैं।

ਕੋਈ ਕਰਿ ਗਲ ਸੁਣਾਵੈ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕੀ ਸੋ ਲਗੈ ਗੁਰਸਿਖਾ ਮਨਿ ਮਿਠਾ ॥
कोई करि गल सुणावै हरि नाम की सो लगै गुरसिखा मनि मिठा ॥
यदि कोई उन्हें हरि-नाम की कथा सुनाए तो वह गुरु के सिक्खों के मन को मीठा लगता है।

ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਗੁਰਸਿਖ ਪੈਨਾਈਅਹਿ ਜਿਨੑਾ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤੁਠਾ ॥
हरि दरगह गुरसिख पैनाईअहि जिन्हा मेरा सतिगुरु तुठा ॥
गुरु के सिक्ख जिन पर मेरा सच्चा गुरु सुप्रसन्न है, प्रभु के दरबार में उन्हें सम्मान की पोशाक पहनाई जाती है।

ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹੋਇਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ॥੪॥੧੨॥੧੯॥
जन नानकु हरि हरि होइआ हरि हरि मनि वुठा ॥४॥१२॥१९॥
नानक खुद भी हरि का रूप बन गया है, चूंकि उसके मन में हरि बस गया है ॥४॥१२॥१९॥

ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसा महला ४ ॥
आसा महला ४ ॥

ਜਿਨੑਾ ਭੇਟਿਆ ਮੇਰਾ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਤਿਨ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਵੈ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिन्हा भेटिआ मेरा पूरा सतिगुरू तिन हरि नामु द्रिड़ावै राम राजे ॥
जिन्होंने मेरे पूर्ण सतिगुरु से भेंट की है, गुरु उनके मन में हरि का नाम दृढ़ कर देता है।

ਤਿਸ ਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਉਤਰੈ ਜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
तिस की त्रिसना भुख सभ उतरै जो हरि नामु धिआवै ॥
जो लोग हरि-नाम का ध्यान करते हैं, उनकी तृष्णा एवं माया की तमाम भूख दूर हो जाती है।

ਜੋ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦੇ ਤਿਨੑ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
जो हरि हरि नामु धिआइदे तिन्ह जमु नेड़ि न आवै ॥
जो पुरुष हरि-नाम को याद करते हैं, उनके समीप यमदूत भी नहीं आता।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਨਿਤ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਤਰਾਵੈ ॥੧॥
जन नानक कउ हरि क्रिपा करि नित जपै हरि नामु हरि नामि तरावै ॥१॥
हे भगवान ! नानक पर कृपा करो, ताकि वह नित्य हरि नाम का जाप करता रहे और हरि नाम ही उसका उद्धार करता है॥ १ ॥

ਜਿਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨਾ ਫਿਰਿ ਬਿਘਨੁ ਨ ਹੋਈ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ तिना फिरि बिघनु न होई राम राजे ॥
जो मनुष्य गुरुमुख बनकर नाम का ध्यान करते हैं, उन्हें दोबारा जीवन मार्ग में कभी विघ्न नहीं आता।

ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਮਨਾਇਆ ਤਿਨ ਪੂਜੇ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
जिनी सतिगुरु पुरखु मनाइआ तिन पूजे सभु कोई ॥
जिन्होंने महापुरुष सच्चे गुरु को प्रसन्न कर लिया है, उनकी सारी दुनिया पूजा करती है।

ਜਿਨੑੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਿਆਰਾ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨੑਾ ਸੁਖੁ ਸਦ ਹੋਈ ॥
जिन्ही सतिगुरु पिआरा सेविआ तिन्हा सुखु सद होई ॥
जिन्होंने अपने प्यारे सतिगुरु की सेवा की है, वे सदा सुखी रहते हैं।

ਜਿਨੑਾ ਨਾਨਕੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਤਿਨੑਾ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਸੋਈ ॥੨॥
जिन्हा नानकु सतिगुरु भेटिआ तिन्हा मिलिआ हरि सोई ॥२॥
हे नानक ! जिन्हें सच्या गुरु मिल गया है, उन्हें ही भगवान मिला है॥ २॥

ਜਿਨੑਾ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹੈ ਤਿਨੑ ਹਰਿ ਰਖਣਹਾਰਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
जिन्हा अंतरि गुरमुखि प्रीति है तिन्ह हरि रखणहारा राम राजे ॥
जिन गुरुमुखों के ह्रदय में भगवान का प्रेम है, परमात्मा खुद ही उनका रखवाला है।

ਤਿਨੑ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਕੋਈ ਕਿਆ ਕਰੇ ਜਿਨੑ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
तिन्ह की निंदा कोई किआ करे जिन्ह हरि नामु पिआरा ॥
कोई मनुष्य उनकी कैसे निन्दा कर सकता है, जिन्हें प्रभु का नाम प्यारा लगता है।

ਜਿਨ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਸਭ ਦੁਸਟ ਝਖ ਮਾਰਾ ॥
जिन हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा ॥
जिनका मन प्रभु के साथ रम जाता है, दुष्ट लोग उनकी निन्दा चारों ओर करने के लिए टक्करें मारते रहते हैं।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਹਰਿ ਰਖਣਹਾਰਾ ॥੩॥
जन नानक नामु धिआइआ हरि रखणहारा ॥३॥
नानक ने नाम का ध्यान किया है, भगवान खुद उसका रखवाला है॥ ३॥

ਹਰਿ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਭਗਤ ਉਪਾਇਆ ਪੈਜ ਰਖਦਾ ਆਇਆ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥
हरि जुगु जुगु भगत उपाइआ पैज रखदा आइआ राम राजे ॥
ईश्वर ने प्रत्येक युग में अपने भक्त उत्पन्न किए हैं और संकट के समय उनकी रक्षा करता आ रहा है।

ਹਰਣਾਖਸੁ ਦੁਸਟੁ ਹਰਿ ਮਾਰਿਆ ਪ੍ਰਹਲਾਦੁ ਤਰਾਇਆ ॥
हरणाखसु दुसटु हरि मारिआ प्रहलादु तराइआ ॥
दुष्ट हिरण्यकशिपु का हरि ने संहार कर दिया और अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की।

ਅਹੰਕਾਰੀਆ ਨਿੰਦਕਾ ਪਿਠਿ ਦੇਇ ਨਾਮਦੇਉ ਮੁਖਿ ਲਾਇਆ ॥
अहंकारीआ निंदका पिठि देइ नामदेउ मुखि लाइआ ॥
अहंकारी एवं निन्दकों को प्रभु ने पीठ देकर अपने भक्त नामदेव को दर्शन दिए।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਐਸਾ ਹਰਿ ਸੇਵਿਆ ਅੰਤਿ ਲਏ ਛਡਾਇਆ ॥੪॥੧੩॥੨੦॥
जन नानक ऐसा हरि सेविआ अंति लए छडाइआ ॥४॥१३॥२०॥
नानक ने भी ऐसे अपने भगवान की भक्ति की है कि अंतकाल वह उसे भी बचा लेगा ॥ ४ ॥ १३ ॥ २० ॥

ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ਛੰਤ ਘਰੁ ੫
आसा महला ४ छंत घरु ५
आसा महला ४ छंत घरु ५

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਮੇਰੇ ਮਨ ਪਰਦੇਸੀ ਵੇ ਪਿਆਰੇ ਆਉ ਘਰੇ ॥
मेरे मन परदेसी वे पिआरे आउ घरे ॥
हे मेरे प्यारे परदेसी मन ! तू अपने घर में लौट आ।

ਹਰਿ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਵਹੁ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਘਰਿ ਵਸੈ ਹਰੇ ॥
हरि गुरू मिलावहु मेरे पिआरे घरि वसै हरे ॥
हे मेरे प्यारे ! हरि रूपी गुरु से मिल चूंकि प्रभु तेरे चित्त में बस जाए।

ਰੰਗਿ ਰਲੀਆ ਮਾਣਹੁ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ॥
रंगि रलीआ माणहु मेरे पिआरे हरि किरपा करे ॥
हे मेरे प्यारे ! यदि प्रभु तुझ पर कृपा करे तो तू उसके प्रेम में मौज कर ।

ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਤੁਠਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਮੇਲੇ ਹਰੇ ॥੧॥
गुरु नानकु तुठा मेरे पिआरे मेले हरे ॥१॥
नानक का कथन है कि जब गुरु प्रसन्न हो जाता है तो वह ईश्वर से मिला देता है॥ १॥

ਮੈ ਪ੍ਰੇਮੁ ਨ ਚਾਖਿਆ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਭਾਉ ਕਰੇ ॥
मै प्रेमु न चाखिआ मेरे पिआरे भाउ करे ॥
हे मेरे प्यारे ! मैंने अपने प्रभु के प्रेम का स्वाद नहीं चखा

ਮਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨ ਬੁਝੀ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਨਿਤ ਆਸ ਕਰੇ ॥
मनि त्रिसना न बुझी मेरे पिआरे नित आस करे ॥
क्योंकि मेरे मन की तृष्णा नहीं बुझी है। हे मेरे प्रियतम ! तुझे देखने की आशा मुझे सदैव लगी रहती है।

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