Hindi Page 460

ਮਾਲੁ ਜੋਬਨੁ ਛੋਡਿ ਵੈਸੀ ਰਹਿਓ ਪੈਨਣੁ ਖਾਇਆ ॥
मालु जोबनु छोडि वैसी रहिओ पैनणु खाइआ ॥
धन-दौलत एवं यौवन को छोड़कर तुम चले जाओगे तथा तेरा खाना पहनना भी खत्म हो गया है।

ਨਾਨਕ ਕਮਾਣਾ ਸੰਗਿ ਜੁਲਿਆ ਨਹ ਜਾਇ ਕਿਰਤੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥੧॥
नानक कमाणा संगि जुलिआ नह जाइ किरतु मिटाइआ ॥१॥
नानक का कथन है कि तेरे कर्म तेरे साथ जाएँगे, कर्मो का प्रभाव मिटाया नहीं जा सकता॥ १॥

ਫਾਥੋਹੁ ਮਿਰਗ ਜਿਵੈ ਪੇਖਿ ਰੈਣਿ ਚੰਦ੍ਰਾਇਣੁ ॥
फाथोहु मिरग जिवै पेखि रैणि चंद्राइणु ॥
हे जीव ! जिस तरह हिरण रात्रि में शिकारी द्वारा किए गए चंद्रायण जैसे प्रकाश को देखकर उसके जाल में फंस जाता है, वैसे ही तू झूठी माया के मोह में फँसा हुआ है।

ਸੂਖਹੁ ਦੂਖ ਭਏ ਨਿਤ ਪਾਪ ਕਮਾਇਣੁ ॥
सूखहु दूख भए नित पाप कमाइणु ॥
पाप करने से सुख से हटकर नित्य दु:ख उत्पन्न होते हैं।

ਪਾਪਾ ਕਮਾਣੇ ਛਡਹਿ ਨਾਹੀ ਲੈ ਚਲੇ ਘਤਿ ਗਲਾਵਿਆ ॥
पापा कमाणे छडहि नाही लै चले घति गलाविआ ॥
तेरे किए हुए पाप तेरा पीछा नहीं छोड़ेंगे, यमदूत तेरे गले में फँदा डालकर तुझे आगे ले चले हैं।

ਹਰਿਚੰਦਉਰੀ ਦੇਖਿ ਮੂਠਾ ਕੂੜੁ ਸੇਜਾ ਰਾਵਿਆ ॥
हरिचंदउरी देखि मूठा कूड़ु सेजा राविआ ॥
राजा हरिचंद की नगरी जैसी झूठी माया को देखकर तू धोखा खा रहा है और अपनी सेज पर तू मोहिनी रूपी झूठी नारी से भोग कर रहा है।

ਲਬਿ ਲੋਭਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਮਾਤਾ ਗਰਬਿ ਭਇਆ ਸਮਾਇਣੁ ॥
लबि लोभि अहंकारि माता गरबि भइआ समाइणु ॥
लोभ, लालच एवं अहंकार से तुम मस्त हो गए हो और अभिमान से भर गए हो।

ਨਾਨਕ ਮ੍ਰਿਗ ਅਗਿਆਨਿ ਬਿਨਸੇ ਨਹ ਮਿਟੈ ਆਵਣੁ ਜਾਇਣੁ ॥੨॥
नानक म्रिग अगिआनि बिनसे नह मिटै आवणु जाइणु ॥२॥
हे नानक ! जिस तरह मृग अज्ञानता में फँस कर नष्ट हो रहा है वैसे ही तेरा भी जन्म-मरण का चक्र नहीं मिटता॥ २ ॥

ਮਿਠੈ ਮਖੁ ਮੁਆ ਕਿਉ ਲਏ ਓਡਾਰੀ ॥
मिठै मखु मुआ किउ लए ओडारी ॥
मक्खी मीठे में फँसकर ही मर जाती है और उड़ नहीं पाती।

ਹਸਤੀ ਗਰਤਿ ਪਇਆ ਕਿਉ ਤਰੀਐ ਤਾਰੀ ॥
हसती गरति पइआ किउ तरीऐ तारी ॥
हाथी गड्ढे में गिर जाए तो तैर कर निकल नहीं सकता।

ਤਰਣੁ ਦੁਹੇਲਾ ਭਇਆ ਖਿਨ ਮਹਿ ਖਸਮੁ ਚਿਤਿ ਨ ਆਇਓ ॥
तरणु दुहेला भइआ खिन महि खसमु चिति न आइओ ॥
जिस जीव-स्त्री को अपना पति-प्रभु एक क्षण भर के लिए भी याद नहीं आया, उसका संसार-सागर से पार होना कठिन हो गया।

ਦੂਖਾ ਸਜਾਈ ਗਣਤ ਨਾਹੀ ਕੀਆ ਅਪਣਾ ਪਾਇਓ ॥
दूखा सजाई गणत नाही कीआ अपणा पाइओ ॥
उसके दुःख एवं दण्ड गणना से बाहर हैं, वह अपने कर्मो का फल भोगती है।

ਗੁਝਾ ਕਮਾਣਾ ਪ੍ਰਗਟੁ ਹੋਆ ਈਤ ਉਤਹਿ ਖੁਆਰੀ ॥
गुझा कमाणा प्रगटु होआ ईत उतहि खुआरी ॥
छिपकर किए गए पाप कर्म भी प्रगट हो जाते हैं और लोक-परलोक में वह तबाह हो जाती है।

ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝੁ ਮੂਠਾ ਮਨਮੁਖੋ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥੩॥
नानक सतिगुर बाझु मूठा मनमुखो अहंकारी ॥३॥
हे नानक ! सच्चे गुरु के बिना स्वेच्छाचारिणीरी जीव-स्त्री ठगी जाती है॥ ३॥

ਹਰਿ ਕੇ ਦਾਸ ਜੀਵੇ ਲਗਿ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਚਰਣੀ ॥
हरि के दास जीवे लगि प्रभ की चरणी ॥
हरि के दास प्रभु-चरणों से लगकर आत्मिक जीवन जीते हैं।

ਕੰਠਿ ਲਗਾਇ ਲੀਏ ਤਿਸੁ ਠਾਕੁਰ ਸਰਣੀ ॥
कंठि लगाइ लीए तिसु ठाकुर सरणी ॥
जो ठाकुर जी की शरण लेते हैं, वह उन्हें अपने गले लगा लेता है।

ਬਲ ਬੁਧਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਅਪਣਾ ਆਪਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਇਆ ॥
बल बुधि गिआनु धिआनु अपणा आपि नामु जपाइआ ॥
वह उन्हें बल, बुद्धि, ज्ञान एवं ध्यान प्रदान करता है और स्वयं ही उनसे अपने नाम का जाप करवाता है।

ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਆਪਿ ਹੋਆ ਆਪਿ ਜਗਤੁ ਤਰਾਇਆ ॥
साधसंगति आपि होआ आपि जगतु तराइआ ॥
प्रभु स्वयं ही सत्संगति है और स्वयं ही संसार का उद्धार कर देता है।

ਰਾਖਿ ਲੀਏ ਰਖਣਹਾਰੈ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲ ਕਰਣੀ ॥
राखि लीए रखणहारै सदा निरमल करणी ॥
जिन मनुष्यों के कर्म सदा निर्मल होते हैं, रक्षक प्रभु उनकी रक्षा करता है।

ਨਾਨਕ ਨਰਕਿ ਨ ਜਾਹਿ ਕਬਹੂੰ ਹਰਿ ਸੰਤ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣੀ ॥੪॥੨॥੧੧॥
नानक नरकि न जाहि कबहूं हरि संत हरि की सरणी ॥४॥२॥११॥
हे नानक ! हरि के संत हरि की शरण में ही रहते हैं और कभी नरक में नहीं जाते ॥ ४ ॥ २ ॥ ११॥

ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
आसा महला ५ ॥

ਵੰਞੁ ਮੇਰੇ ਆਲਸਾ ਹਰਿ ਪਾਸਿ ਬੇਨੰਤੀ ॥
वंञु मेरे आलसा हरि पासि बेनंती ॥
हे मेरे आलस्य ! मुझसे दूर हो जा, मैंने अपने प्रभु के पास प्रार्थना करनी है।

ਰਾਵਉ ਸਹੁ ਆਪਨੜਾ ਪ੍ਰਭ ਸੰਗਿ ਸੋਹੰਤੀ ॥
रावउ सहु आपनड़ा प्रभ संगि सोहंती ॥
मैं अपने कांत-प्रभु से रमण करती हूँ और प्रभु की संगति में ही सुन्दर लगती हूँ।

ਸੰਗੇ ਸੋਹੰਤੀ ਕੰਤ ਸੁਆਮੀ ਦਿਨਸੁ ਰੈਣੀ ਰਾਵੀਐ ॥
संगे सोहंती कंत सुआमी दिनसु रैणी रावीऐ ॥
मैं अपने कांत-स्वामी की संगति में सुन्दर लगती हूँ और रात-दिन उससे रमण करती हूँ।

ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਚਿਤਾਰਿ ਜੀਵਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪੇਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੀਐ ॥
सासि सासि चितारि जीवा प्रभु पेखि हरि गुण गावीऐ ॥
मैं श्वास-श्वास से प्रभु को याद करके उसके दर्शन करके जीवित रहती हूँ, मैं हरि का गुणगान करती रहती हूँ।

ਬਿਰਹਾ ਲਜਾਇਆ ਦਰਸੁ ਪਾਇਆ ਅਮਿਉ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਿੰਚੰਤੀ ॥
बिरहा लजाइआ दरसु पाइआ अमिउ द्रिसटि सिंचंती ॥
विरहा लज्जा करता है, क्योंकि मैंने अपने पति-प्रभु के दर्शन कर लिए हैं और उसकी अमृत से भरी हुई दृष्टि मेरे स्नेह को सींचती है।

ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕੁ ਮੇਰੀ ਇਛ ਪੁੰਨੀ ਮਿਲੇ ਜਿਸੁ ਖੋਜੰਤੀ ॥੧॥
बिनवंति नानकु मेरी इछ पुंनी मिले जिसु खोजंती ॥१॥
नानक वन्दना करता है कि मेरी इच्छा पूरी हो गई है, जिस पति-प्रभु को मैं खोजता था, वह मुझे मिल गया है॥ १॥

ਨਸਿ ਵੰਞਹੁ ਕਿਲਵਿਖਹੁ ਕਰਤਾ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
नसि वंञहु किलविखहु करता घरि आइआ ॥
हे महा पापो ! यहाँ से दौड़ जाओ, क्योंकि जगत का रचयिता प्रभु मेरे हृदय-घर में आया है।

ਦੂਤਹ ਦਹਨੁ ਭਇਆ ਗੋਵਿੰਦੁ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ ॥
दूतह दहनु भइआ गोविंदु प्रगटाइआ ॥
जब गोविंद मेरे हृदय में प्रगट हुआ तो मेरे भीतर के पाँचों दूत (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) जल गए।

ਪ੍ਰਗਟੇ ਗੁਪਾਲ ਗੋਬਿੰਦ ਲਾਲਨ ਸਾਧਸੰਗਿ ਵਖਾਣਿਆ ॥
प्रगटे गुपाल गोबिंद लालन साधसंगि वखाणिआ ॥
जब मैंने साधसंगत में शामिल होकर स्तुतिगान किया तो प्यारा गोविंद गोपाल मेरे हृदय में प्रगट हो गया।

ਆਚਰਜੁ ਡੀਠਾ ਅਮਿਉ ਵੂਠਾ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦੀ ਜਾਣਿਆ ॥
आचरजु डीठा अमिउ वूठा गुर प्रसादी जाणिआ ॥
मैंने अदभुत प्रभु के दर्शन कर लिए हैं, वह मुझ पर अमृत बरसा रहा है तथा गुरु की दया से मैंने उसे जान लिया है।

ਮਨਿ ਸਾਂਤਿ ਆਈ ਵਜੀ ਵਧਾਈ ਨਹ ਅੰਤੁ ਜਾਈ ਪਾਇਆ ॥
मनि सांति आई वजी वधाई नह अंतु जाई पाइआ ॥
मेरे मन में अब शांति आई है और खुशी के वाद्य-यन्त्रों से मुझे शुभ कामनाएँ मिल रही हैं, प्रभु का अन्त पाया नहीं जा सकता।

ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਸਹਜਿ ਮੇਲਾ ਪ੍ਰਭੂ ਆਪਿ ਬਣਾਇਆ ॥੨॥
बिनवंति नानक सुख सहजि मेला प्रभू आपि बणाइआ ॥२॥
नानक वन्दना करता है कि सहज सुख का मेल प्रभु ने आप बनाया है॥ २॥

ਨਰਕ ਨ ਡੀਠੜਿਆ ਸਿਮਰਤ ਨਾਰਾਇਣ ॥
नरक न डीठड़िआ सिमरत नाराइण ॥
नारायण का सिमरन करने वाले इन्सान को कभी नरक नहीं देखना पड़ा।

ਜੈ ਜੈ ਧਰਮੁ ਕਰੇ ਦੂਤ ਭਏ ਪਲਾਇਣ ॥
जै जै धरमु करे दूत भए पलाइण ॥
धर्मराज स्वयं उसकी जय-जयकार करता है और यमदूत भाग जाते हैं।

ਧਰਮ ਧੀਰਜ ਸਹਜ ਸੁਖੀਏ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਭਜੇ ॥
धरम धीरज सहज सुखीए साधसंगति हरि भजे ॥
साधसंगति में हरि का भजन करने से मनुष्य को धर्म, धैर्य, सहज सुख प्राप्त हो जाता है।

ਕਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਰਾਖਿ ਲੀਨੇ ਮੋਹ ਮਮਤਾ ਸਭ ਤਜੇ ॥
करि अनुग्रहु राखि लीने मोह ममता सभ तजे ॥
अपनी अनुकंपा करके प्रभु ने उनका संसार-सागर से उद्धार कर दिया है, जिन्होंने मोह, ममता एवं अहंत्व को त्याग दिया है।

ਗਹਿ ਕੰਠਿ ਲਾਏ ਗੁਰਿ ਮਿਲਾਏ ਗੋਵਿੰਦ ਜਪਤ ਅਘਾਇਣ ॥
गहि कंठि लाए गुरि मिलाए गोविंद जपत अघाइण ॥
गुरु ने उनको प्रभुसे मिला दिया है और प्रभु ने उन्हें अपने गले से लगा लिया है, गोविन्द का भजन करने से वे तृप्त हो गए हैं।

ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਸਗਲ ਆਸ ਪੁਜਾਇਣ ॥੩॥
बिनवंति नानक सिमरि सुआमी सगल आस पुजाइण ॥३॥
नानक वन्दना करता है कि प्रभु की आराधना करने से समस्त आशाएँ पूरी हो जाती हैं।॥ ३॥

error: Content is protected !!