ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪੇ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ॥
तनु मनु अरपे सतिगुर सरणाई ॥
वह अपना तन-मन सतिगुरु को अर्पण कर देता है और उनका आश्रय लेता है।
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
हिरदै नामु वडी वडिआई ॥
उसकी बड़ी महानता यह है कि उसके हृदय में हरि का नाम विद्यमान है।
ਸਦਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਇ ਸਖਾਈ ॥੧॥
सदा प्रीतमु प्रभु होइ सखाई ॥१॥
प्रियतम-प्रभु सदैव ही उसका सखा-सहायक बना रहता है॥ १॥
ਸੋ ਲਾਲਾ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ॥
सो लाला जीवतु मरै ॥
हे बन्धु ! केवल वही प्रभु का सेवक है जो सांसारिक कार्य करता हुआ विषय-वासनाओं से निर्लिप्त रहता है।
ਸੋਗੁ ਹਰਖੁ ਦੁਇ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਬਦਿ ਉਧਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सोगु हरखु दुइ सम करि जाणै गुर परसादी सबदि उधरै ॥१॥ रहाउ ॥
वह सुख-दुख दोनों को एक समान समझता है और गुरु की कृपा से शब्द द्वारा उसका उद्धार हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥
ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਧੁਰਹੁ ਫੁਰਮਾਈ ॥
करणी कार धुरहु फुरमाई ॥
परमात्मा ने आरम्भ से ही जीवों को शुभ कर्म करने का हुक्म किया हुआ है।
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਕੋ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥
बिनु सबदै को थाइ न पाई ॥
शब्द-साधना के बिना जीवन सफल नहीं होता।
ਕਰਣੀ ਕੀਰਤਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਈ ॥
करणी कीरति नामु वसाई ॥
प्रभु का यशोगान करने से नाम जीव के मन में बस जाता है।
ਆਪੇ ਦੇਵੈ ਢਿਲ ਨ ਪਾਈ ॥੨॥
आपे देवै ढिल न पाई ॥२॥
ईश्वर स्वयं यशोगान की देन प्रदान करता है और यह देन में देरी नहीं करता॥ २॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
मनमुखि भरमि भुलै संसारु ॥
स्वेच्छाचारी मनुष्य माया की दुविधा में फँसकर जगत में कुमार्गगामी हो जाता है।
ਬਿਨੁ ਰਾਸੀ ਕੂੜਾ ਕਰੇ ਵਾਪਾਰੁ ॥
बिनु रासी कूड़ा करे वापारु ॥
नाम-पूंजी के बिना वह झूठा व्यापार करता है।
ਵਿਣੁ ਰਾਸੀ ਵਖਰੁ ਪਲੈ ਨ ਪਾਇ ॥
विणु रासी वखरु पलै न पाइ ॥
नाम-पूंजी के बिना सौदा प्राप्त नहीं होता।
ਮਨਮੁਖਿ ਭੁਲਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥੩॥
मनमुखि भुला जनमु गवाइ ॥३॥
(माया की) दुविधा में पड़ा हुआ मनमुख व्यक्ति इस तरह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा लेता है॥ ३॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੁ ਲਾਲਾ ਹੋਇ ॥
सतिगुरु सेवे सु लाला होइ ॥
जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा करता है यहू प्रभु का सेवक होता है।
ਊਤਮ ਜਾਤੀ ਊਤਮੁ ਸੋਇ ॥
ऊतम जाती ऊतमु सोइ ॥
उसकी जाति उत्तम है एवं उसकी मान-प्रतिष्ठा भी उत्तम है।
ਗੁਰ ਪਉੜੀ ਸਭ ਦੂ ਊਚਾ ਹੋਇ ॥
गुर पउड़ी सभ दू ऊचा होइ ॥
गुरु की सीढ़ी का आश्रय लेकर वह सर्वोत्तम बन जाता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਵਡਾਈ ਹੋਇ ॥੪॥੭॥੪੬॥
नानक नामि वडाई होइ ॥४॥७॥४६॥
हे नानक ! ईश्वर के नाम-सुमिरन द्वारा प्रशंसा मिलती है॥ ४॥ ७॥ ४६॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
आसा महला ३ ॥
आसा महला ३ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਝੂਠੋ ਝੂਠੁ ਕਮਾਵੈ ॥
मनमुखि झूठो झूठु कमावै ॥
स्वेच्छाचारी जीवात्मा केवल झूठ का ही आचरण करती है
ਖਸਮੈ ਕਾ ਮਹਲੁ ਕਦੇ ਨ ਪਾਵੈ ॥
खसमै का महलु कदे न पावै ॥
इसलिए उसे परमेश्वर का महल कदापि प्राप्त नहीं होता।
ਦੂਜੈ ਲਗੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਵੈ ॥
दूजै लगी भरमि भुलावै ॥
मोह-माया में फँसी हुई वह दुविधा में भटकती रहती है।
ਮਮਤਾ ਬਾਧਾ ਆਵੈ ਜਾਵੈ ॥੧॥
ममता बाधा आवै जावै ॥१॥
मोह-ममता में फॅसी हुई वह जन्म-मरण के चक्र में पड़कर आती-जाती रहती है॥ १॥
ਦੋਹਾਗਣੀ ਕਾ ਮਨ ਦੇਖੁ ਸੀਗਾਰੁ ॥
दोहागणी का मन देखु सीगारु ॥
हे मन ! दुहागिन अर्थात् परित्यक्ता नारी का हार-शृंगार देखो।
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤਿ ਧਨਿ ਮਾਇਆ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ਝੂਠੁ ਮੋਹੁ ਪਾਖੰਡ ਵਿਕਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
पुत्र कलति धनि माइआ चितु लाए झूठु मोहु पाखंड विकारु ॥१॥ रहाउ ॥
जो पुत्र, स्त्री, एवं माया-धन में चित्त लगाता है, वह झूठ, मोह, पाखंड एवं विकारों में ही फॅसा रहता है॥ १॥ रहाउ॥
ਸਦਾ ਸੋਹਾਗਣਿ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ॥
सदा सोहागणि जो प्रभ भावै ॥
जो जीवात्मा प्रभु को अच्छी लगती है वह सदा सौभाग्यशालिनी है।
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਵੈ ॥
गुर सबदी सीगारु बणावै ॥
गुरु के शब्द को वह अपना हार-शृंगार बनाती है।
ਸੇਜ ਸੁਖਾਲੀ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਰਾਵੈ ॥
सेज सुखाली अनदिनु हरि रावै ॥
उसकी सेज सुखदायक है और रात-दिन वह अपने प्रभु-पति से रमण करती है।
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੨॥
मिलि प्रीतम सदा सुखु पावै ॥२॥
अपने प्रियतम-प्रभु से मिलकर वह सदा सुख पाती है।॥ २॥
ਸਾ ਸੋਹਾਗਣਿ ਸਾਚੀ ਜਿਸੁ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੁ ॥
सा सोहागणि साची जिसु साचि पिआरु ॥
वह सुहागिन सच्ची है जो सत्यस्वरूप प्रभु से प्रेम करती है।
ਅਪਣਾ ਪਿਰੁ ਰਾਖੈ ਸਦਾ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
अपणा पिरु राखै सदा उर धारि ॥
अपने कंत -प्रभु को वह हमेशा अपने चित्त से लगाकर रखती है।
ਨੇੜੈ ਵੇਖੈ ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ॥
नेड़ै वेखै सदा हदूरि ॥
वह उसको समीप ही नहीं अपितु सदा प्रत्यक्ष देखती है।
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸਰਬ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੩॥
मेरा प्रभु सरब रहिआ भरपूरि ॥३॥
मेरा प्रभु हर जगह मौजूद है॥ ३॥
ਆਗੈ ਜਾਤਿ ਰੂਪੁ ਨ ਜਾਇ ॥
आगै जाति रूपु न जाइ ॥
परलोक में जाति एवं सौन्दर्य मनुष्य के साथ नहीं जाते अपितु
ਤੇਹਾ ਹੋਵੈ ਜੇਹੇ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
तेहा होवै जेहे करम कमाइ ॥
जैसे कर्म मनुष्य करता है वैसा ही उसका जीवन बन जाता है।
ਸਬਦੇ ਊਚੋ ਊਚਾ ਹੋਇ ॥
सबदे ऊचो ऊचा होइ ॥
शब्द द्वारा मनुष्य ऊँचा हो जाता है।
ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ਸੋਇ ॥੪॥੮॥੪੭॥
नानक साचि समावै सोइ ॥४॥८॥४७॥
हे नानक ! वह सत्य में ही समा जाता है॥ ४॥ ८॥ ४७ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
आसा महला ३ ॥
आसा महला ३ ॥
ਭਗਤਿ ਰਤਾ ਜਨੁ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
भगति रता जनु सहजि सुभाइ ॥
जो भक्त प्रभु-भक्ति के रंग में सहज ही रंगा रहता है,”
ਗੁਰ ਕੈ ਭੈ ਸਾਚੈ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥
गुर कै भै साचै साचि समाइ ॥
वह गुरु के भय द्वारा निश्चित ही सत्य में समा जाता है।
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਇ ॥
बिनु गुर पूरे भगति न होइ ॥
पूर्ण गुरु के बिना प्रभु की भक्ति नहीं होती और
ਮਨਮੁਖ ਰੁੰਨੇ ਅਪਨੀ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥੧॥
मनमुख रुंने अपनी पति खोइ ॥१॥
स्वेच्छाचारी मनुष्य अपना मान-सम्मान गंवा कर विलाप करते रहते हैं। १॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਜਪਿ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ॥
मेरे मन हरि जपि सदा धिआइ ॥
हे मेरे मन ! हरि का जाप कर और सदा उसका ध्यान कर।
ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਹੋਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਜੋ ਇਛੈ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सदा अनंदु होवै दिनु राती जो इछै सोई फलु पाइ ॥१॥ रहाउ ॥
फिर तुझे दिन-रात सदैव ही आनंद बना रहेगा। जिस फल की इच्छा होगी, वही फल मिल जाएगा ॥ १॥ रहाउ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪੂਰਾ ਪਾਏ ॥
गुर पूरे ते पूरा पाए ॥
पूर्ण गुरु के द्वारा पूर्ण गुणदाता प्रभु प्राप्त होता है।
ਹਿਰਦੈ ਸਬਦੁ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
हिरदै सबदु सचु नामु वसाए ॥
उसके हृदय में गुरु का शब्द और सत्यनाम बस जाता है।
ਅੰਤਰੁ ਨਿਰਮਲੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਨਾਏ ॥
अंतरु निरमलु अम्रित सरि नाए ॥
जो मनुष्य अमृत सरोवर में स्नान करता है उसका हृदय पवित्र हो जाता है।
ਸਦਾ ਸੂਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਏ ॥੨॥
सदा सूचे साचि समाए ॥२॥
सदा के लिए पवित्र होने के कारण वह सत्य में लीन हो जाता है॥ २ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਵੇਖੈ ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ॥
हरि प्रभु वेखै सदा हजूरि ॥
हरि प्रभु जीवों को सदा देखता रहता है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥
गुर परसादि रहिआ भरपूरि ॥
गुरु की दया से जीव प्रभु को सर्वव्यापक पाता है।
ਜਹਾ ਜਾਉ ਤਹ ਵੇਖਾ ਸੋਇ ॥
जहा जाउ तह वेखा सोइ ॥
जहाँ कहीं भी मैं जाता हूँ, वहाँ मैं उस प्रभु को देखता हूँ।
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਦਾਤਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੩॥
गुर बिनु दाता अवरु न कोइ ॥३॥
गुरु के बिना अन्य कोई दाता नहीं ॥ ३॥
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਪੂਰਾ ਭੰਡਾਰ ॥
गुरु सागरु पूरा भंडार ॥
गुरु सागर है, उसका पूर्ण भण्डार
ਊਤਮ ਰਤਨ ਜਵਾਹਰ ਅਪਾਰ ॥
ऊतम रतन जवाहर अपार ॥
अपार एवं बहुमूल्य रत्नों एवं जवाहरों से भरपूर है।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਦੇਵਣਹਾਰੁ ॥
गुर परसादी देवणहारु ॥
प्रभु गुरु की कृपा से ही जीवों को देन देने वाला है।
ਨਾਨਕ ਬਖਸੇ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ॥੪॥੯॥੪੮॥
नानक बखसे बखसणहारु ॥४॥९॥४८॥
हे नानक ! क्षमाशील परमात्मा जीवों को क्षमा कर देता है॥ ४॥ ६॥ ४८॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
आसा महला ३ ॥
आसा महला ३ ॥
ਗੁਰੁ ਸਾਇਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥
गुरु साइरु सतिगुरु सचु सोइ ॥
गुरु ही गुणों का सागर है और वह सच्चा प्रभु स्वयं ही सतिगुरु है।
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਹੋਇ ॥
पूरै भागि गुर सेवा होइ ॥
पूर्ण भाग्य से ही गुरु की सेवा होती है।