ਮਨਮੁਖ ਖੋਟੀ ਰਾਸਿ ਖੋਟਾ ਪਾਸਾਰਾ ॥
मनमुख खोटी रासि खोटा पासारा ॥
मनमुख व्यक्ति माया-धन संचित करते हैं जो खोटी पूंजी है और वह इस खोटी पूंजी का ही प्रसार करते हैं।
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਨਿ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਭਾਰਾ ॥
कूड़ु कमावनि दुखु लागै भारा ॥
वह माया धन की मिथ्या कमाई करते हैं और अत्यंत कष्ट सहन करते हैं।
ਭਰਮੇ ਭੂਲੇ ਫਿਰਨਿ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਜਨਮੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੭॥
भरमे भूले फिरनि दिन राती मरि जनमहि जनमु गवावणिआ ॥७॥
वे भृम में फँसकर दिन-रात भटकते रहते हैं और जीवन-मृत्यु के बंधन में पड़कर अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं।॥७॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮੈ ਅਤਿ ਪਿਆਰਾ ॥
सचा साहिबु मै अति पिआरा ॥
सत्यस्वरूप परमात्मा मुझे अत्यन्त प्रिय है।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਧਾਰਾ ॥
पूरे गुर कै सबदि अधारा ॥
पूर्ण गुरु का शब्द मेरा जीवन आधार है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਨਣਿਆ ॥੮॥੧੦॥੧੧॥
नानक नामि मिलै वडिआई दुखु सुखु सम करि जानणिआ ॥८॥१०॥११॥
हे नानक ! जिनको परमात्मा के नाम की शोभा प्राप्त होती है, वह दुख-सुख को एक समान जानते हैं॥८॥१०॥११॥
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
माझ महला ३ ॥
माझ महला ३ ॥
ਤੇਰੀਆ ਖਾਣੀ ਤੇਰੀਆ ਬਾਣੀ ॥
तेरीआ खाणी तेरीआ बाणी ॥
हे ठाकुर जी ! चारों ही उत्पत्ति के स्रोत तेरे हैं और चारों ही वाणी तेरी है।
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣੀ ॥
बिनु नावै सभ भरमि भुलाणी ॥
प्रभु के नाम के बिना सारी दुनिया भ्रम में भटकी हुई है।
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵਣਿਆ ॥੧॥
गुर सेवा ते हरि नामु पाइआ बिनु सतिगुर कोइ न पावणिआ ॥१॥
गुरु की सेवा करने से ईश्वर का नाम प्राप्त होता है। सतिगुरु के बिना किसी को भी ईश्वर का नाम नहीं मिल सकता ॥१॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥
हउ वारी जीउ वारी हरि सेती चितु लावणिआ ॥
मैं उन पर कुर्बान हूँ, जो ईश्वर के साथ अपना चित्त लगाते हैं।
ਹਰਿ ਸਚਾ ਗੁਰ ਭਗਤੀ ਪਾਈਐ ਸਹਜੇ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हरि सचा गुर भगती पाईऐ सहजे मंनि वसावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सत्यस्वरूप ईश्वर गुरु-भक्ति से ही प्राप्त होता है और प्रभु सहज ही मनुष्य के हृदय में निवास करता है ॥१॥ रहाउ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਤਾ ਸਭ ਕਿਛੁ ਪਾਏ ॥
सतिगुरु सेवे ता सभ किछु पाए ॥
यदि मनुष्य सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करे, तो वह सबकुछ प्राप्त कर लेता है।
ਜੇਹੀ ਮਨਸਾ ਕਰਿ ਲਾਗੈ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
जेही मनसा करि लागै तेहा फलु पाए ॥
जिस तरह की कामना हेतु वह सेवा में सक्रिय होता है, वैसा ही फल वह प्राप्त करता है।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਸਭਨਾ ਵਥੂ ਕਾ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਮਿਲਾਵਣਿਆ ॥੨॥
सतिगुरु दाता सभना वथू का पूरै भागि मिलावणिआ ॥२॥
सतिगुरु समस्त पदार्थों का दाता है। भगवान भाग्यशाली व्यक्ति को ही गुरु से मिलाता है॥२॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੈਲਾ ਇਕੁ ਨ ਧਿਆਏ ॥
इहु मनु मैला इकु न धिआए ॥
यह मलिन मन एक ईश्वर की आराधना नहीं करता।
ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਲਾਗੀ ਬਹੁ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ॥
अंतरि मैलु लागी बहु दूजै भाए ॥
मोह-माया में फँसने के कारण इसके भीतर बहुत सारी मैल लगी हुई है।
ਤਟਿ ਤੀਰਥਿ ਦਿਸੰਤਰਿ ਭਵੈ ਅਹੰਕਾਰੀ ਹੋਰੁ ਵਧੇਰੈ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਲਾਵਣਿਆ ॥੩॥
तटि तीरथि दिसंतरि भवै अहंकारी होरु वधेरै हउमै मलु लावणिआ ॥३॥
अहंकारी मनुष्य दरिया के तट, धार्मिक स्थलों व प्रदेशों में भटकता रहता है परन्तु वह अपने मन को अहंकार की अधिक मैल लगा लेता है॥३॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਤਾ ਮਲੁ ਜਾਏ ॥
सतिगुरु सेवे ता मलु जाए ॥
यदि वह सतिगुरु की सेवा करे तो उसकी मैल दूर हो जाती है।
ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
जीवतु मरै हरि सिउ चितु लाए ॥
वह अहंत्व को मारकर हरि प्रभु में अपना चित्त लगाता है।
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਸਚੁ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਸਚਿ ਲਾਗੈ ਮੈਲੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੪॥
हरि निरमलु सचु मैलु न लागै सचि लागै मैलु गवावणिआ ॥४॥
भगवान निर्मल है और उस सत्य प्रभु को अहंकार की मैल नहीं लगती। जो व्यक्ति सत्य के साथ जुड़ जाता है वह अपनी मैल गंवा देता है ॥४॥
ਬਾਝੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਅੰਧ ਗੁਬਾਰਾ ॥
बाझु गुरू है अंध गुबारा ॥
गुरु के बिना जगत् में अज्ञानता का घोर अंधकार है।
ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧਾ ਅੰਧੁ ਅੰਧਾਰਾ ॥
अगिआनी अंधा अंधु अंधारा ॥
ज्ञानहीन व्यक्ति अज्ञानता के अंधेरे में अंधा बना रहता है।
ਬਿਸਟਾ ਕੇ ਕੀੜੇ ਬਿਸਟਾ ਕਮਾਵਹਿ ਫਿਰਿ ਬਿਸਟਾ ਮਾਹਿ ਪਚਾਵਣਿਆ ॥੫॥
बिसटा के कीड़े बिसटा कमावहि फिरि बिसटा माहि पचावणिआ ॥५॥
उसका ऐसा हाल होता है जैसे विष्टा के कीड़े का होता है, जो विष्टा खाने का कार्य करता है और विष्टा में ही जलकर मर जाता है॥ ५॥
ਮੁਕਤੇ ਸੇਵੇ ਮੁਕਤਾ ਹੋਵੈ ॥
मुकते सेवे मुकता होवै ॥
जो व्यक्ति माया से मुक्त होकर गुरु की सेवा करता है, वही माया से मुक्त होता है।
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਸਬਦੇ ਖੋਵੈ ॥
हउमै ममता सबदे खोवै ॥
वह नाम द्वारा अपने अहंकार को दूर कर लेता है
ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਚਾ ਸੇਵੀ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰੁ ਪਾਵਣਿਆ ॥੬॥
अनदिनु हरि जीउ सचा सेवी पूरै भागि गुरु पावणिआ ॥६॥
और रात-दिन पूज्य परमेश्वर की भक्ति करता रहता है। उसे पूर्ण भाग्य से गुरु मिलता है॥६॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
आपे बखसे मेलि मिलाए ॥
भगवान स्वयं ही मनुष्य को क्षमा कर देता है और उसे गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लेता है।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਨਿਧਿ ਪਾਏ ॥
पूरे गुर ते नामु निधि पाए ॥
वह पूर्ण गुरु से नाम रूपी निधि प्राप्त कर लेता है।
ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਮਨੁ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸੇਵੇ ਦੁਖੁ ਗਵਾਵਣਿਆ ॥੭॥
सचै नामि सदा मनु सचा सचु सेवे दुखु गवावणिआ ॥७॥
उसका मन सदैव ही सत्य नाम द्वारा प्रभु का सिमरन करता रहता है। फिर प्रभु का सिमरन करके वह अपना दुख मिटा लेता है।॥७॥
ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ਦੂਰਿ ਨ ਜਾਣਹੁ ॥
सदा हजूरि दूरि न जाणहु ॥
भगवान स्वयं ही जीव के समीप रहता है, इसलिए उसे कहीं दूर मत समझो।
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਪਛਾਣਹੁ ॥
गुर सबदी हरि अंतरि पछाणहु ॥
गुरु के शब्द द्वारा भगवान को अपने मन में विद्यमान समझौ।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਵਣਿਆ ॥੮॥੧੧॥੧੨॥
नानक नामि मिलै वडिआई पूरे गुर ते पावणिआ ॥८॥११॥१२॥
हे नानक ! नाम से जीव को बड़ी शोभा प्राप्त होती है परन्तु नाम पूर्ण गुरु द्वारा ही मिलता है ॥८ ॥११॥१२॥
ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੩ ॥
माझ महला ३ ॥
माझ महला ३ ॥
ਐਥੈ ਸਾਚੇ ਸੁ ਆਗੈ ਸਾਚੇ ॥
ऐथै साचे सु आगै साचे ॥
जो व्यक्ति इहलोक में सत्यवादी है, वह आगे परलोक में भी सत्यवादी है।
ਮਨੁ ਸਚਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਾਚੇ ॥
मनु सचा सचै सबदि राचे ॥
वह मन सत्य है जो सत्य नाम में लीन रहता है।
ਸਚਾ ਸੇਵਹਿ ਸਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥
सचा सेवहि सचु कमावहि सचो सचु कमावणिआ ॥१॥
वह सत्यस्वरूप परमात्मा की आराधना करता है, सत्य नाम का वह जाप करता है और शुद्ध सत्य का ही वह कर्म करता है॥१॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਜੀਉ ਵਾਰੀ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਵਣਿਆ ॥
हउ वारी जीउ वारी सचा नामु मंनि वसावणिआ ॥
मेरा तन, मन सर्वस्व उन पर न्योछावर है, जो व्यक्ति सत्य-नाम को अपने हृदय में बसाते हैं।
ਸਚੇ ਸੇਵਹਿ ਸਚਿ ਸਮਾਵਹਿ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सचे सेवहि सचि समावहि सचे के गुण गावणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
वे सत्य प्रभु की सेवा करते हैं, सत्य नाम में ही लीन रहते हैं और सत्य-परमेश्वर का ही यश गायन करते हैं॥ १ ॥ रहाउ ॥
ਪੰਡਿਤ ਪੜਹਿ ਸਾਦੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ॥
पंडित पड़हि सादु न पावहि ॥
पण्डित धार्मिक ग्रंथ पढ़ते हैं परन्तु उन्हें आनंद नहीं मिलता।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਮਾਇਆ ਮਨੁ ਭਰਮਾਵਹਿ ॥
दूजै भाइ माइआ मनु भरमावहि ॥
क्योंकि द्वैत भाव के कारण उनका ह्रदय सांसारिक पदार्थों में भटकता रहता है।
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭ ਸੁਧਿ ਗਵਾਈ ਕਰਿ ਅਵਗਣ ਪਛੋਤਾਵਣਿਆ ॥੨॥
माइआ मोहि सभ सुधि गवाई करि अवगण पछोतावणिआ ॥२॥
माया-मोह की लगन ने उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है और दुष्कर्मों के कारण वे पश्चाताप करते हैं।॥२॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤਾ ਤਤੁ ਪਾਏ ॥
सतिगुरु मिलै ता ततु पाए ॥
यदि मनुष्य को सतिगुरु मिल जाए तो उसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है,
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
फिर वह भगवान के नाम को अपने हृदय में बसाता है।