ਸਕਯਥੁ ਜਨਮੁ ਕਲੵੁਚਰੈ ਗੁਰੁ ਪਰਸੵਿਉ ਅਮਰ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੮॥
सकयथु जनमु कल्युचरै गुरु परस्यिउ अमर प्रगासु ॥८॥
कवि कल्ह का कथन है कि जिन लोगों को विश्व विख्यात श्री गुरु अमरदास जी के दर्शन प्राप्त हुए, उनका जीवन सफल हो गया है।॥
ਬਾਰਿਜੁ ਕਰਿ ਦਾਹਿਣੈ ਸਿਧਿ ਸਨਮੁਖ ਮੁਖੁ ਜੋਵੈ ॥
बारिजु करि दाहिणै सिधि सनमुख मुखु जोवै ॥
गुरु अमरदास जी के दाएँ हाथ में पद्म स्थित है और सिद्धियाँ सन्मुख होकर उनका मुख निहार रहीं हैं।
ਰਿਧਿ ਬਸੈ ਬਾਂਵਾਂਗਿ ਜੁ ਤੀਨਿ ਲੋਕਾਂਤਰ ਮੋਹੈ ॥
रिधि बसै बांवांगि जु तीनि लोकांतर मोहै ॥
ऋद्धियाँ उनके बाएँ अंग पर मौजूद हैं, जो तीनों लोकों को मोहित करती हैं।
ਰਿਦੈ ਬਸੈ ਅਕਹੀਉ ਸੋਇ ਰਸੁ ਤਿਨ ਹੀ ਜਾਤਉ ॥
रिदै बसै अकहीउ सोइ रसु तिन ही जातउ ॥
उनके हृदय में अकथनीय ईश्वर अवस्थित है, जिसका आनंद उन्होंने ज्ञान लिया है।
ਮੁਖਹੁ ਭਗਤਿ ਉਚਰੈ ਅਮਰੁ ਗੁਰੁ ਇਤੁ ਰੰਗਿ ਰਾਤਉ ॥
मुखहु भगति उचरै अमरु गुरु इतु रंगि रातउ ॥
गुरु अमरदास जी मुखारबिंद से ईश्वर की भक्ति-वंदना का उच्चारण करते हैं और इस रंग में ही लीन हैं।
ਮਸਤਕਿ ਨੀਸਾਣੁ ਸਚਉ ਕਰਮੁ ਕਲੵ ਜੋੜਿ ਕਰ ਧੵਾਇਅਉ ॥
मसतकि नीसाणु सचउ करमु कल्य जोड़ि कर ध्याइअउ ॥
उनके माथे पर ईश्वर-कृपा का चिन्ह हैं, कवि कल्ह हाथ जोड़कर कहता है कि
ਪਰਸਿਅਉ ਗੁਰੂ ਸਤਿਗੁਰ ਤਿਲਕੁ ਸਰਬ ਇਛ ਤਿਨਿ ਪਾਇਅਉ ॥੯॥
परसिअउ गुरू सतिगुर तिलकु सरब इछ तिनि पाइअउ ॥९॥
जिसने सच्चे गुरु अमरदास जी का दर्शन-ध्यान किया है, उसकी सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं ॥६॥
ਚਰਣ ਤ ਪਰ ਸਕਯਥ ਚਰਣ ਗੁਰ ਅਮਰ ਪਵਲਿ ਰਯ ॥
चरण त पर सकयथ चरण गुर अमर पवलि रय ॥
वहीं चरण सफल हैं, जो गुरु (अमरदास जी) के राह पर चलते हैं।
ਹਥ ਤ ਪਰ ਸਕਯਥ ਹਥ ਲਗਹਿ ਗੁਰ ਅਮਰ ਪਯ ॥
हथ त पर सकयथ हथ लगहि गुर अमर पय ॥
वहीं हाथ सार्थक हैं, जो गुरु अमरदास जी के चरण छूते हैं।
ਜੀਹ ਤ ਪਰ ਸਕਯਥ ਜੀਹ ਗੁਰ ਅਮਰੁ ਭਣਿਜੈ ॥
जीह त पर सकयथ जीह गुर अमरु भणिजै ॥
जीभ भी असल में वही सफल है, जो गुरु अमरदास जी का यशोगान करती है।
ਨੈਣ ਤ ਪਰ ਸਕਯਥ ਨਯਣਿ ਗੁਰੁ ਅਮਰੁ ਪਿਖਿਜੈ ॥
नैण त पर सकयथ नयणि गुरु अमरु पिखिजै ॥
जो आँखें गुरु अमरदास जी के दर्शन करती हैं, असल में वहीं सार्थक हैं।
ਸ੍ਰਵਣ ਤ ਪਰ ਸਕਯਥ ਸ੍ਰਵਣਿ ਗੁਰੁ ਅਮਰੁ ਸੁਣਿਜੈ ॥
स्रवण त पर सकयथ स्रवणि गुरु अमरु सुणिजै ॥
वहीं कान पूर्ण रूप से सफल हैं, जो गुरु अमरदास जी का उपदेश सुनते हैं।
ਸਕਯਥੁ ਸੁ ਹੀਉ ਜਿਤੁ ਹੀਅ ਬਸੈ ਗੁਰ ਅਮਰਦਾਸੁ ਨਿਜ ਜਗਤ ਪਿਤ ॥
सकयथु सु हीउ जितु हीअ बसै गुर अमरदासु निज जगत पित ॥
जिस हृदय में जगत पिता गुरु अमरदास जी बसते हैं, वहीं हृदय सफल है।
ਸਕਯਥੁ ਸੁ ਸਿਰੁ ਜਾਲਪੁ ਭਣੈ ਜੁ ਸਿਰੁ ਨਿਵੈ ਗੁਰ ਅਮਰ ਨਿਤ ॥੧॥੧੦॥
सकयथु सु सिरु जालपु भणै जु सिरु निवै गुर अमर नित ॥१॥१०॥
भाट जालप का कथन है कि जो सिर नित्य गुरु अमरदास जी के सन्मुख झुकता है, असल में वही सफल होता है॥१॥१०॥
ਤਿ ਨਰ ਦੁਖ ਨਹ ਭੁਖ ਤਿ ਨਰ ਨਿਧਨ ਨਹੁ ਕਹੀਅਹਿ ॥
ति नर दुख नह भुख ति नर निधन नहु कहीअहि ॥
“(जिस पर गुरु अमरदास जी की प्रसन्नता होती है) ऐसा व्यक्ति कभी दुखी नहीं होता, वह भूख से रहित रहता है, ऐसे नर को निर्धन भी नहीं कहा जाता।
ਤਿ ਨਰ ਸੋਕੁ ਨਹੁ ਹੂਐ ਤਿ ਨਰ ਸੇ ਅੰਤੁ ਨ ਲਹੀਅਹਿ ॥
ति नर सोकु नहु हूऐ ति नर से अंतु न लहीअहि ॥
ऐसे व्यक्ति को कोई गम-शोक नहीं होता, ऐसे व्यक्ति का रहस्य भी नहीं पाया जा सकता।
ਤਿ ਨਰ ਸੇਵ ਨਹੁ ਕਰਹਿ ਤਿ ਨਰ ਸਯ ਸਹਸ ਸਮਪਹਿ ॥
ति नर सेव नहु करहि ति नर सय सहस समपहि ॥
ऐसा पुरुष न ही किसी पर निर्भर रहता है, अपितु हजारों चीजें देने में समर्थ होता है।
ਤਿ ਨਰ ਦੁਲੀਚੈ ਬਹਹਿ ਤਿ ਨਰ ਉਥਪਿ ਬਿਥਪਹਿ ॥
ति नर दुलीचै बहहि ति नर उथपि बिथपहि ॥
ऐसा मनुष्य ऐश्वर्य सुख भोगता है और बुराइयों को दूर करके अच्छाई की स्थापना करता है।
ਸੁਖ ਲਹਹਿ ਤਿ ਨਰ ਸੰਸਾਰ ਮਹਿ ਅਭੈ ਪਟੁ ਰਿਪ ਮਧਿ ਤਿਹ ॥
सुख लहहि ति नर संसार महि अभै पटु रिप मधि तिह ॥
ऐसा मनुष्य संसार में सुख ही पाता है और शत्रुओं में सज्जन भावना से रहता है।
ਸਕਯਥ ਤਿ ਨਰ ਜਾਲਪੁ ਭਣੈ ਗੁਰ ਅਮਰਦਾਸੁ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨੁ ਜਿਹ ॥੨॥੧੧॥
सकयथ ति नर जालपु भणै गुर अमरदासु सुप्रसंनु जिह ॥२॥११॥
जालप का कथन है कि उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक होता है, जिस पर गुरु अमरदास जी सुप्रसन्न होते हैं ॥ २॥ ११॥
ਤੈ ਪਢਿਅਉ ਇਕੁ ਮਨਿ ਧਰਿਅਉ ਇਕੁ ਕਰਿ ਇਕੁ ਪਛਾਣਿਓ ॥
तै पढिअउ इकु मनि धरिअउ इकु करि इकु पछाणिओ ॥
हे गुरु अमरदास ! तूने एक परमेश्वर का ही मनन किया, मन में एक ओंकार का ही चिंतन किया, केवल एक परम-परमेश्वर को ही माना है।
ਨਯਣਿ ਬਯਣਿ ਮੁਹਿ ਇਕੁ ਇਕੁ ਦੁਹੁ ਠਾਂਇ ਨ ਜਾਣਿਓ ॥
नयणि बयणि मुहि इकु इकु दुहु ठांइ न जाणिओ ॥
तेरे नयनों में, वचनों में, मुँह में केवल परब्रह्म ही बसा हुआ है और उस एक परमशक्ति के बिना किसी अन्य को नहीं माना।
ਸੁਪਨਿ ਇਕੁ ਪਰਤਖਿ ਇਕੁ ਇਕਸ ਮਹਿ ਲੀਣਉ ॥
सुपनि इकु परतखि इकु इकस महि लीणउ ॥
हे गुरु ! तेरे सपने में भी हरिनाम बसा हुआ है और प्रत्यक्ष भी ‘एक’ उसी को तू रसिया बना रहता है और तुम एक प्रभु में ही लीन रहते हो।
ਤੀਸ ਇਕੁ ਅਰੁ ਪੰਜਿ ਸਿਧੁ ਪੈਤੀਸ ਨ ਖੀਣਉ ॥
तीस इकु अरु पंजि सिधु पैतीस न खीणउ ॥
महीने के तीस दिनों में भी सर्वदा एक उसी का तू रसिया बना है और पंच तत्वों (पूरे जगत में केवल वही है और पैंतीस अक्षरों में भी ईश-वंदना ही है।
ਇਕਹੁ ਜਿ ਲਾਖੁ ਲਖਹੁ ਅਲਖੁ ਹੈ ਇਕੁ ਇਕੁ ਕਰਿ ਵਰਨਿਅਉ ॥
इकहु जि लाखु लखहु अलखु है इकु इकु करि वरनिअउ ॥
जिस एक परब्रह्म से लाखों प्राणी बने हैं, हम लाखों की समझ से परे हैं, हे गुरु अमरदास ! तुमने उस एक अलख परमेश्वर का ही वर्णन किया है।
ਗੁਰ ਅਮਰਦਾਸ ਜਾਲਪੁ ਭਣੈ ਤੂ ਇਕੁ ਲੋੜਹਿ ਇਕੁ ਮੰਨਿਅਉ ॥੩॥੧੨॥
गुर अमरदास जालपु भणै तू इकु लोड़हि इकु मंनिअउ ॥३॥१२॥
जालप भाट का कथन हैं कि हे गुरु अमरदास ! तुझे एक परमात्मा की ही अभिलाषा लगी हुई है और उस एक को ही श्रद्धापूर्वक मानते हो ।।३।।१२।।
ਜਿ ਮਤਿ ਗਹੀ ਜੈਦੇਵਿ ਜਿ ਮਤਿ ਨਾਮੈ ਸੰਮਾਣੀ ॥
जि मति गही जैदेवि जि मति नामै समाणी ॥
जो शिक्षा (नाम जपने की) जयदेव ने ग्रहण की, जो आस्था (हरिनाम में रत रहने की) नामदेव के मन में बसी थी,
ਜਿ ਮਤਿ ਤ੍ਰਿਲੋਚਨ ਚਿਤਿ ਭਗਤ ਕੰਬੀਰਹਿ ਜਾਣੀ ॥
जि मति त्रिलोचन चिति भगत क्मबीरहि जाणी ॥
जो शिक्षा (ईश्वर का संकीर्तन करने की) त्रिलोचन के दिल में दृढ़ हो गई थी,
ਰੁਕਮਾਂਗਦ ਕਰਤੂਤਿ ਰਾਮੁ ਜੰਪਹੁ ਨਿਤ ਭਾਈ ॥
रुकमांगद करतूति रामु ज्मपहु नित भाई ॥
जो सीख (हरिनाम की) भक्त्त कबीर ने समझी, इसी प्रकार राजा रुफमांगद का यही कर्म था कि वह राम नाम का नित्य जाप करता एवं करवाता था।
ਅੰਮਰੀਕਿ ਪ੍ਰਹਲਾਦਿ ਸਰਣਿ ਗੋਬਿੰਦ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥
अमरीकि प्रहलादि सरणि गोबिंद गति पाई ॥
हे भाई! नित्य राम नाम का जाप करो, इसी से राजा अंबरीष एवं भक्त प्रहलाद ने ईश्वर की शरण प्राप्त की।
ਤੈ ਲੋਭੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਤਜੀ ਸੁ ਮਤਿ ਜਲੵ ਜਾਣੀ ਜੁਗਤਿ ॥
तै लोभु क्रोधु त्रिसना तजी सु मति जल्य जाणी जुगति ॥
भाट जल्ह (जालप) का कथन है कि हे गुरु अमरदास ! तुमने सुमति एवं युक्ति को जानकर लोभ, क्रोध एवं तृष्णा को त्याग दिया है।
ਗੁਰੁ ਅਮਰਦਾਸੁ ਨਿਜ ਭਗਤੁ ਹੈ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਪਾਵਉ ਮੁਕਤਿ ॥੪॥੧੩॥
गुरु अमरदासु निज भगतु है देखि दरसु पावउ मुकति ॥४॥१३॥
गुरु अमरदास जी ईश्वर के परम भक्त हैं, उनके दर्शनों से मुक्ति प्राप्त हुई है ॥४॥१३॥
ਗੁਰੁ ਅਮਰਦਾਸੁ ਪਰਸੀਐ ਪੁਹਮਿ ਪਾਤਿਕ ਬਿਨਾਸਹਿ ॥
गुरु अमरदासु परसीऐ पुहमि पातिक बिनासहि ॥
गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श से पृथ्वी के पापों का नाश हो जाता है।
ਗੁਰੁ ਅਮਰਦਾਸੁ ਪਰਸੀਐ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਆਸਾਸਹਿ ॥
गुरु अमरदासु परसीऐ सिध साधिक आसासहि ॥
गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श की बड़े-बड़े सिद्ध-साधक भी आकांक्षा करते हैं।
ਗੁਰੁ ਅਮਰਦਾਸੁ ਪਰਸੀਐ ਧਿਆਨੁ ਲਹੀਐ ਪਉ ਮੁਕਿਹਿ ॥
गुरु अमरदासु परसीऐ धिआनु लहीऐ पउ मुकिहि ॥
गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श से ईश्वर में ध्यान लगता है और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।
ਗੁਰੁ ਅਮਰਦਾਸੁ ਪਰਸੀਐ ਅਭਉ ਲਭੈ ਗਉ ਚੁਕਿਹਿ ॥
गुरु अमरदासु परसीऐ अभउ लभै गउ चुकिहि ॥
गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श से अभय प्रभु प्राप्त होता है और आवागमन दूर हो जाता है।